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अब रूबरू अपने मुझे पाओगे नहीं तुम

अब रूबरू अपने मुझे पाओगे नहीं तुम
जब तक के मोहब्बत से बुलाओगे नहीं तुम

हाँ इसलिए भी तुमसे कभी रूठा नहीं हँ
मैं जानता हँ मुझको मनाओगे नहीं तुम

बस वस्ल के आदाब ही गिनवाते रहोगे
पर दरमियां की दूरी मिटाओगे नहीं तुम

लो तुम को बता देता हँ मैं बस हँ तुम्हारा
यह बात मगर सबको बताओगे नहीं तुम

क्या रश्क नहीं होगा मुझे अपनी नजर पे
क्या रुख़ से कभी पर्दा हटाओगे नहीं तुम

आंखें तो बहुत नम थी मगर ददल नहीं था नम
जाहिर हुआ फिर लौट के आओगे नहीं तुम

जेहमत है शिकायत है तग़ाफ़ुल है के जीद है
मिसरा कोई सबक़त का उठाओगे नहीं तुम

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