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प्रकृति – अंत भी मैं हँ आगाज भी मैं सृष्टी के तख्तो-ताज भी मैं।

अंत भी मैं हँ आगाज भी मैं
सृष्टी के तख्तो-ताज भी मैं।
संगीत भी मैं हँ और साज भी मैं
जीवन जीने का अंदाज भी मैं।
कण कण  में मेरा है वास
मुझसे चलें प्राणी के श्वास।
टकरा कर मुझसे तू क्या पाएगा
प्रलय को दावत ही देता जाएगा।
ऐ मानब मुझे तू क्यों छेड़ रहा
मुझे मेरे ही घर से ही खदेड़ रहा।
यह धरा रहेगी सदा ऋणी मेरी
सींचा है इसे, हो जैसे भगिनी मेरी।
अपनी उन्नति पर तू जो इतना इतरा रहा
ख़ौफ तुझे अपने काल का भी न रहा।
न बन तू आतंकी, न बन दुराचारी
मेरी संतानों के लिए न बन अत्याचारी।
वक़्त रहते ही संभल जा वरना तू पछताएगा
छूट जाएगा समय, तू हाथ मलता रह जाएगा।

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