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दिल परिंदा

दिल परिंदा

दिल तो एक परिंदा है
कभी इस डाल तो कभी उस डाल
कभी बचपन में गुड्डे गुड़ियों से खेल आता है
और
कभी जवानी के अपने महबूब के गले लग जाता है
और
कभी बुढ़ापे से पहले ही बुढ़ापे को छू आता है
कभी पहाड़ी की चोटी पर
कभी नदियां किनारे
और
कभी चांदनी रात में ठंडी बालू रेत पर
अरे दिल के क्या कहने किस किस से यह कभी भी मिल आता है
तुम बैठे रहो बंद कमरे में और देखो,
तुम्हरा दिल तुम्हरा परिंदा वो गया वो गया
कभी कभी अपना ही यह प्यारा दिल पराया सा लगने लगता है
ऐ दिल तु कितना खुशनसीब है,
कभी तु मुझे भी साथ ले चल
मैं भी बिन कुछ बताएं
बिन कुछ कहे
सारा जग घूम लूं।
Shobha Sangwan
I am a poet, writer, artist, educationist, entrepreneur, social worker

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