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मृगनयनी सी तुम

 

तुम्हारी चपलता भरी आँखों में,
मैं अपना दिल कहीं,
अटका हुआ सा पाता हूँ …
ये तुम्हारी ग़ुस्ताख़ आँखों
का ही क़ुसूर है जो इनमें
मैं सदा डूब जाता हूँ !

तुम्हारे नैनों ने ही गढ़ी है
प्रेम की भाषा नई…
जैसे हो सिंदूरी सी भोर
या सुरमई सी साँझ कोई !

पर मैं इस भाषा के मर्म को
पूरा कहाँ समझ पाता हूँ
तुम्हारे रूप और देह के
झीने से आवरण में बस,
उलझ कर रह जाता हूँ !

तुम्हारी आँखें करती हैं मुझसे,
अक्सर मीठी बतियाँ….
पर उन बातों की मधुरता से
मैं जाने क्यूँ घबराता हूँ !
तुम्हारी आँखों में छलकते
प्रेम के सागर की गहराई
मैं मापने से कतराता हूँ !

पुरुष हूँ मैं,
नारी सी गहराई कहाँ से लाऊँ मैं ?
तुम्हारे मन की अव्यक्त भावनाएँ
तुम्हारी आँखों से कैसे समझूँ मैं ?
नारी मन की व्यथाओं से
कैसे द्रवित होऊँ मैं ?

पुरुष हूँ मैं…
इसलिए पिघलना मेरा अधिकार नहीं…
भावनाओं में बहना मुझे स्वीकार नहीं…
जानता हूँ कि तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं…
पर तुम्हारी आँखों की बेचैनियाँ मुझे बर्दाश्त नहीं !

मुझे तुमसे शिकायत है…
क्यों नहीं कहतीं तुम कुछ मुझसे ?
जब क्रोध के लाल डोरे…
मेरी आँखों में उभरते हैं ,
तुम्हारी हिरणी सी सहमी आँखों में,
अपना अक्स ढूँढ नहीं पाता हूँ !

मुझे तुमसे शिकायत है…
तुम्हारी चंचल चपल आँखें जब
बदलती हैं सूनी सी आँखों में,
तुम्हारी ख़ामोश आँखों की ज़ुबान सुनने को तरस जाता हूँ !
तुम्हारी पनीली आँखें देख तो मैं
अक्सर टूट ही जाता हूँ !

मैं तुम्हें भीतर तक समझना चाहता हूँ,
तुम्हारा प्रेम तुम्हें लौटाना चाहता हूँ !
इसलिए तुम्हारी आँखें पढ़ना आरंभ किया है मैंने …
तुम्हारी मूक भाषा को समझना
अब आरम्भ किया है मैंने…

तुम भी मेरी आँखों में केवल
प्रेम पढ़ने की कोशिश करना,
अपनी आँखों की ठिठोलियाों से
मुझमें प्राण भरती रहना…
इन आँखों के संगम से मुझे
नई कहानियाँ बुनने देना !
अपनी मृगनयनी सी आँखों में
मुझे सदा डूबने देना !

अंशु श्री सक्सेना

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