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PiHu

सागर किनारे, दिल ये पुकारे

तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं है

हो ओ ओ…… सागर किनारे

ये गीत दिल में कई जज़्बात जगा देता है, है ना? या फिर उस एक जज़्बात को, जिसके कई नाम हैं, पर परिभाषा कोई नहीं. कोई किसी से प्यार करने लगता है, किसी को किसी से इश्क़ हो जाता है या फिर कोई किसी की मोहब्बत बन जाता है. ये सारी बातें हैं एक सी ही, पर इन बातों के मायने अलग अलग हैं.

समझ नहीं आया? चलिए, एक कहानी के ज़रिये मैं अपनी बात रखता हूँ!

 

इस कहानी में सिर्फ़ दो क़िरदार हैं, एक लड़का और एक लड़की. ये कहानी दो दोस्तों की है.

 

M.Tech में अव्वल आने की वजह से हुमा को दिल्ली में नौकरी मिली थी. लखनऊ छोड़ने का ज़रा दुःख था उसे पर एक नए शहर जा कर एक नयी ज़िन्दगी शुरू करने का रोमांच, उफ़्फ़!! पापा ने पहले ही जाकर उसके रहने के लिए PG और चूँकि ऑफिस ज़्यादा दूर न था, तो अपनी लाडो बिटिया के लिए स्कूटी का बंदोबस्त कर दिया। हुमा दिल्ली पहुँची, और अपनी नयी ज़िन्दगी को अपने बल बुते जीना शुरू किया. नए शहर के तौर तरीके और चाल ढाल अपनाने में आदतन कुछ वक़्त तो लगता ही है. हुमा भी धीरे धीरे दिल्लीवाली बन रही थी, पर अपनी तहज़ीब से कभी फासला न रखा. उसके दफ़्तर के रास्ते में, एक बस स्टॉप पढ़ता था, जहाँ से वो अपनी दोस्त पारुल को रोज़ाना पिक करती थी. पारुल उसी के डिपार्टमेंट में काम करती थी और चूँकि उसका घर भी रास्ते में पड़ता था, दोनों साथ ही आते-जाते थे. आज पारुल को आने में थोड़ी देर थी, तो स्कूटी को साइड करके हुमा उसका इंतज़ार कर रही थी. तभी वहाँ एक बस आयी, जिसमें से एक लड़का उतरा. उस आदमी के उतरते ही उसकी नज़र हुमा पर पड़ी और वहीँ ठहर गयी. हुमा भी उसे एकटक देखे जा रही थी.

जज़्बात की आंधी? नाम अलग अलग……… बात एक ही. ……. मायने। ……

हुमा – “तुम? यहाँ? कैसे हो?”

आप को मेरे तआरुफ़ की ज़रूरत क्या है , मैं वही हूँ कि जिसे आप ने चाहा था कभी

हुमा – “पर तुम तो अचानक”……. हुमा के आँखों में आँसूं थे….

वो शख्स हुमा के पास आकर बैठ गया और इस क़दर उसे देखा जैसे जनवरी की बर्फ़ीली ठंड में, सुबह के 6 बजे, किसी फूलों के बगीचे में, एक गुलाब के पंखुड़ी से लिपटी ओस की बूँद को देख रहा हो.

उसने अपना हाथ बढ़ाया ताकि हुमा का हाथ पकडे, पर हुमा ने अपना हाथ हटा लिया.

“नहीं, अब नहीं. इतने साल ना कोई कॉल, ना तुम ख़ुद वापस आये। …….. हुमा की आँखों से अब लगातार आँसू बह रहे थे.

वो शख़्स सिर्फ़ मुस्कुराया और बोला –

“रोने वाले तुझे रोने का सलीक़ा ही नहीं

अश्क पीने के लिए हैं कि बहाने के लिए”

हुमा ने आंसू पोछते और मुस्कुराते हुए कहा – आज भी दूसरों के लिखे शेर पढ़ते हो?

“मिरे शेर आँसू, मिरे शेर आहें ,

मिरी शाएरी दिल-फ़िगारों की दुनिया”

हुमा – दिल फ़िगार? और तुम? हाहाःहाह। जनाब लिबास की तरह फ़िरदौस बदलीं हैं आपने. जैसे लोग शहर बदलते हैं ना? वैसे ही?

“शहर-ब-शहर कर सफ़र ज़ाद-ए-सफ़र लिए बग़ैर

कोई असर किए बग़ैर, कोई असर लिए बग़ैर”

हाँ हाँ तुम्हें तो बस औरतों को…….. मैं भी बस…….

वो शख़्स फिर मुस्कुराया –

हुमा – ये लॉकेट याद है? तुमने दिया था! आज तक इसे सीने से लगा रखा है, की कभी तो तुम वापस…. और तुम? तुम तो अचानक गायब हो गए, तुम्हारे जाने के बाद दोस्तों से तुम्हारे इश्क़ के चर्चे भी सुने, पर दिल को कभी यकीन न आया!

उस शख़्स ने वो लॉकेट ध्यान से देखा, आधे दिल की डिज़ाइन और उसमें एक अक्षर लिखा था “पी”

हुमा – तुम्हीं ने दिया था तक़रीबन ५ साल पहले। …….

5 साल, 3 महीने, 16 दिन

हुमा चौंक गयी.

हुमा – पीयूष!

हुमा के मुंह से अपना नाम सुन कर पीयूष ने अपनी आँखें बंद की, और एक लम्हें में ही उसकी पूरी ज़िन्दगी उसके सामने आ गयी.

पीयूष बत्रा – लखनऊ यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग कॉलेज का सबसे मेधावी छात्र, जिसके सवालों से ख़ुद professors भागते थे. जो हर स्पोर्ट्स में अव्वल था, जिसकी दीवानी यूनिवर्सिटी की हर लड़की थी. अपनी माँ का बेटा था वो, और हो भी क्यों ना! उसकी माँ ने अकेले ही उसे अच्छी तालीम और परवरिश दी थी. दोनों की ज़िंदगी में एक दूसरे के अलावा कोई न था की तभी कॉलेज के फ्रेशर्स पार्टी में पीयूष की नज़र पड़ी हुमा पर, और दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया. कुछ ही दिन बाद, पीयूष ने उसे अपनी माँ से भी मिलवाया. माँ को अपने बेटे की पसंद पर नाज़ था. हुमा थी ही इतनी प्यारी. उसके जन्मदिन पर माँ ने पीयूष को दो लॉकेट दिए जिसमें से एक में लिखा था “पी” और दूसरे में “हु”, दोनों लॉकेट हाफ हार्ट के डिज़ाइन वाले थे, जैसे की एक दूसरे को पूर्ण करते हों.

“माँ, क्या है ये सब?”

“चुप कर, और संभाल के रखना इसे.” माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.

“पीयूष!”

पीयूष ने एकदम से आँखें खोली।

हुमा – “क्या हुआ? क्या सोच रहे थे?”

पीयूष सिर्फ़ उसे देख कर मुस्कुराया।

“माँ कैसी है?”

हुमा के सवाल ने उसे थोड़ा uneasy किया.

“तो क्या अब आप भी यहीं डेरा जमाने वाली हैं?

“वाली हैं नहीं, जमा चुकी. मुझे तो कई महीने हो गए यहां।

“अच्छा, तो बताइये ज़रा यहाँ चोर बाज़ार किस मेट्रो स्टेशन के बगल में है?

“म…. म… मैं क्यों जाउंगी चोर बाज़ार? मुझे क्या किसी चीज़ की कमी है?”

“अरे बिलकुल नहीं. आपके यहाँ तो कारूँ का ख़ज़ाना खुला पड़ा है! वैसे डोसा खा लेने के बाद extra चटनी माँग के कटोरी चाटना बंद किया या…… ”

“आई विल किल यू” कह कर हुमा उसे मारने के लिए हाथ ऊपर की, तो पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया और दोनों हंसने लगे. फिर कुछ और पुरानी बातें निकली, उनकी आदतें,साथ बिताये पल, अपनी पूरी ज़िन्दगी को उन्होंने फिर से जिया।

“इतनी याद हूँ मैं? तो छोड़ के क्यों गए थे मुझे?

“इश्क़ उस दर्द का नहीं क़ाइल

जो मुसीबत की इंतिहा न हुआ”

हुमा – बक़वास! तुम मुझे माँ के पास चलो. मैं उनसे पूछूँगी। क्यों तुम लोगों ने अचानक ऐसे शहर छोड़ दिया? कम से कम मुझे तो बता के जाते? क्या उनकी तबियत पहले जैसी ही ख़राब रहती है? मुझे याद है तुम्हारा आख़िरी semester M.Tech का, माँ को दूसरी बार हार्ट अटैक आया था….. मेरी भी B.Tech की परीक्षा थी.

पीयूष – तुम्हारी बकबक करने की आदत नहीं गयी ना?

हुमा – और ना तुम्हारी बातें घुमाने की! बताओ ना, कैसी हैं माँ अब?

“एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’

मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है”

हुमा –  तो क्या, वो अब भी तकलीफ़ में हैं?

“बीमार तिरे जी से गुज़र जाएँ तो अच्छा

जीते हैं न मरते हैं ये मर जाएँ तो अच्छा”

हुमा सकते में आ जाती है, उसके पैरों से ज़मीन ख़िसक है – “तो क्या? कब? कैसे? और तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”……. “पीयूष! उफ़्फ़….. ”

हुमा बिना पीयूष के बोले समझ गयी, कि माँ अब…… “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं पीयूष? क्यों अकेले ये दर्द सहते रहे?” हुमा फिर से रो रही थी.

“अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए

आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए

ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप

इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए

हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें

रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए”

हुमा – “चुप करो! प्लीज़! तुम मेरे साथ चलो. मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगी। हम फिर से साथ रहेंगे। पहले की तरह!

पीयूष ज़ोर से हँस पड़ा, और उसके ठहाके हुमा के दिल में नश्तर बन कर उतर गए.

“अब मिरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो

मैं ने माना कि तुम इक पैकर-ए-रानाई हो”

“पीयूष बकवास बंद करो. देखो ख़ुद को, अपनी हालत पर कुछ तो तरस खाओ. ज़िन्दगी बहुत बड़ी है, इसे अकेले तो नहीं गुज़ारा जा सकता? वो भी इतने दर्द में?” हुमा ने गुस्से में कहा.

“ग़म के साँचे में ढल सको तो चलो

तुम मिरे साथ चल सको तो चलो

दूर तक तीरगी में चलना है

सूरत-ए-शम्अ जल सको तो चलो”

“मैं चलूँगी तुम्हारे साथ पीयूष. मैं आज भी सिर्फ़ तुमसे प्यार करता हूँ.”

पीयूष फिर से ठहाके मार के हँस पड़ा! और उसके ठहाके हुमा को चुभ गए.

“इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया”

“पीयूष ये आवारापन तुम्हें ले डूबेगा। तुम मेरे साथ चलो. हम दोनों मिलकर एक नयी शुरुवात करेंगे। मैं तुमसे प्यार करती हूँ पीयूष, नहीं रह सकती तुम्हारे बिना। ”

“हालत-ए-हिज्र में जो रक़्स नहीं कर सकता

उस के हक़ में यही बेहतर है कि पागल हो जाए”

“एनफ ऑफ़ दिस ओके? मैं तुम्हें क्या बोल रही हूँ और तुम क्या पहेलियों में बातें कर रहे हो? चलो मेरे साथ!”

पीयूष – “नहीं”

हुमा – “क्यों? क्या प्रॉब्लम है? मैं तुम्हें अब पसंद नहीं? या फिर तुम्हारे वो इश्क़ के चर्चे सही थे?”

पीयूष – हम्म! तो इतने सालों के बाद आपको अक़्ल आ ही गयी मोहतरमा!

हुमा – “पीयूष….. ” पर इससे पहले की वो उससे कुछ कह पाती, एक आवाज़ ने उसका नाम लिया – “हुमा! जल्दी चलो, हम लेट हो गए हैं.” उसने पलट कर देखा तो पारुल थोड़ी देर उसकी स्कूटी के पास खड़ी थी.

हुमा – उफ़्फ़ इसे भी अभी आना था. पीयूष अपना नंबर दो मुझे, मैं तुम्हें कॉल करुँगी.

पीयूष – “मेरे पास फ़ोन नहीं है.”

हुमा – “उफ़्फ़ आज भी बहाने….. ये लो मेरा कार्ड, इसमें मेरा नंबर है, मैं तुम्हारे कॉल का इंतज़ार करुँगी.” कह कर वो उससे विदा लेती है और स्कूटी में बैठ कर निकल जाती है.

उसके जाते ही पीयूष वो कार्ड फाड़ने लगता है.

“उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना

ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे”

वो अपनी शर्ट का बटन खोलता है और 1 लॉकेट निकालता है. वही, बाकी का बचा हुआ दिल और उसमें गुथा हुआ वो अक्षर “हु”. उसने अपने हाथ में रखी फ़ाइल खोला जिसमे लिखा था – Medical Loan – Rs. 10 lakhs. उसने आसमान की तरफ़ देखा और निग़ाहों के कोने से आँसू बाहर निकल पड़े. उसने ज़ोर की एक आह भरी और कहा –

“माँ, आपने अपने बेटे को परवरिश बहुत अच्छी दी है.”

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Baasab Chandana
"The Kahaani Wala" Dwelling into real life emotions, one person to another, walking into different shoes all the time, it's sur-real!

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