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नींद

गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थी और सतीश का जन्मदिन भी आने वाला था. १ जून की सुबह जब वो सो कर उठा तो पापा मम्मी को अपने सामने खड़ा पाया. पापा पापा, मेरा तोहफ़ा कहाँ है?
ड्राइंग रूम में, पापा ने गले लगाते हुए कहा. सतीश भाग कर ड्राइंग रूम की तरफ जाता है और देखता है, एक बड़ा सा गोल्डन रिट्रीवर जिसके गले में हैप्पी बर्थडे का टैग लगा हुआ है, ड्राइंग रूम के ठीक बीच में बैठा हुआ है. वो दौड़ कर उसकी तरफ जाता है और उसको गले लगा कर प्यार करने लगता है.
सतीश को कुत्तों से बेहद लगाव था. इस बार उसकी ज़िद थी की उसके जन्मदिन पर उसे एक कुत्ता चाहिए। पर जब सतीश के पिताजी कुत्ता लेने केनेल पहुंचे तो वहाँ कोई भी छोटा बच्चा नहीं मिला. केनेल के मालिक ने बताया की अभी कुछ दिनों पहले ही एक गोल्डन रिट्रीवर उनके पास आया है, वैसे तो एक साल का है पर बेहद समझदार है. आपको बिलकुल भी परेशानी नहीं होगी। पिताजी ने भी सोचा, चलो ठीक भी है, कोई बच्चा होता तो उसे शुरू से खाना पॉटी सब सीखाना पड़ता, ये सीखा सिखाया मिल रहा यही, बस फिर क्या था, वो उसे अपने घर ले आये.
सतीश ने कहा – पापा, हम इसका नाम सिम्बा रखेंगे।
और बस, ड्राइंग रूम के एक साइड में ही सिम्बा के लिए एक छोटा सा घर बनाया गया. वहाँ उसके ज़रूरत का हर सामान, कटोरी, बिस्तर सब रख दिए गए. सतीश उसके आने पर बहुत खुश था, पुरे घर में वो अकेला बोर हो जाता था, अब सिम्बा के आ जाने से उसकी छुटियाँ ख़राब नहीं होंगी, वहीँ सिम्बा भी अपने नए मालिक से बहुत खुश था और अच्छे से घूल मिल भी गया था. उसका बिस्तर कुछ इस तरह लगाया गया था जिससे की पिताजी और सतीश, दोनों कमरों का दरवाज़ा उसके सामने था.
रात को सोते वक़्त सतीश ने सिम्बा का माथा चूमा, और उसे गुड नाईट कह कर जैसे ही जाने लगा, सिम्बा अचानक कूँ कूँ करने लगा. सतीश को कुछ समझ नहीं आया, उसे लगा शायद दिन भर साथ रहने के बाद वो अकेला नहीं रहना चाहता। पापा से पूछ कर उसने सिम्बा का बिस्तर अपने बिस्तर के ठीक नीचे लगाया और बोला – सिम्बा, अब तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं, तुम मेरे साथ आराम से सो जाओ।
ये बोल कर, सतीश अपने बिस्तर पर चला गया और थोड़ी देर बाद सो गया. रात को जब अचानक उसकी नींद खुली तो उसे एहसास हुआ की शायद उसके पैरों के पास कोई है. वो हड़बड़ाहट में उठ बैठा तो देखा की सिम्बा ठीक इसके पैरों के पास बिस्तर पे अपने आगे वाले दो हाथ टिका कर उसे देख रहा है।
“उफ़्फ़ सिम्बा, तुमने तो मुझे डरा ही दिया था. तुम सो क्यों नहीं रहे हो?”
सिम्बा को सतीश का रात में बात करना बहुत अच्छा लगा । वो ज़ोर ज़ोर से अपनी पूँछ हिलाने लगा जैसे की अचानक ही बहुत खुश हो गया हो। सतीश की कुछ समझ नहीं आया, इसको क्या हो गया? कुत्ते रात भर तो नहीं जागते?
उसे लगा, सिम्बा नयी जगह होने की वजह से अनकम्फर्टेबल फील कर रहा है। ज़्यादातर कुत्तों को लॉन में अपने घरों में ही रहते देखा था उसने। खैर, वो रात कटी, सुबह उठ कर उसने पापा से कहा – पापा कल रात सिम्बा बिलकुल नहीं सोया. जब रात को मैं अचानक उठा तो देखा, वो मुझे घूर रहा था।
पापा ने कहा – शायद कमरे में अंदर रहना उसकी आदत ना हो. मैं लॉन के एक कोने में उसके लिए एक घर बनवा देता हूँ।”
सतीश ने कहा – हाँ पापा, मुझे भी ऐसा ही लगता है ।
उस दिन लॉन में सिम्बा के लिए घर बन गया। रात को जब उसे उसके घर में डाल कर, गेट बंद किया गया, तो वो गेट पे चढ़ के कूँ कूँ करने लगा. पिताजी को बहुत आश्चर्य हुआ, कुत्ते रात को नियमित ही सोते हैं, ये क्यों नहीं सो रहा ! दिन भर तो बिलकुल साधारण कुत्तों जैसा व्यवहार करता है, रात में इसे क्या हो जाता है? ऐसा भी नहीं, की दिन में सोता हो?
रात भर सिम्बा उसी अवस्था में गेट को पकडे खड़ा रहा और अंदर दरवाज़े की तरफ झांकता रहा. तीसरे दिन सुबह उठ कर जब सब नाश्ता करने लगे कर सिम्बा भी साइड में अपना भोजन कर रहा था, पिताजी ने कहा – सतीश आज सिम्बा के साथ थोड़ा अधिक खेलो, बहार जाकर. हो सकता है, पुराने घर में इसके खेलने के कई साथी हो, जिनकी वजह से ये थक जाता हो, और रात में इसे अच्छी नींद आती हो। सतीश समझ गया था, उसने कहा – ठीक है पापा, शाम को मैं उसे पार्क में ले जाऊंगा, वहाँ मेरे दोस्तों के साथ भी खेलेगा। पिताजी दफ्तर चले जाते हैं, वो शाम होने पर, सिम्बा को पार्क लेकर जाता है, वहाँ सभी बच्चे उसे देख कर बहुत उत्साहित होते हैं,वो सब के साथ खेलता हैं।
रात को खाना खाते वक़्त सतीश बोलता है – “पापा, आज तो सिम्बा की बहुत एक्सरसाइज हो गयी , पार्क में सब उसके साथ खेल रहे थे, आज तो बहुत दौड़ भाग हो गयी उसकी।
“हम्म, चलो अच्छी बात है, आज तसल्ली से सो जायेगा। “
पर रात को जब पिताजी सोने जा रहे थे, उन्होंने सोचा – एक बार देख लेते हैं, की सिम्बा सो गया या नहीं। जब वो खिड़की से झाँकने लगे तो दंग रह गए, सिम्बा आज भी रोज़ की तरह अपने गेट पर चढ़ कर, घर के भीतर झाँक रहा था। तभी सतीश वहाँ आया, “क्या हुआ पापा, आप अभी तक सोये नहीं?”
उन्होंने सिम्बा की तरफ इशारा करते हुए कहा – “ये तो अब भी नहीं सो रहा। “
उस रात दोनों बाप बेटे सिम्बा के साथ लॉन में ही बैठे रहे. सुबह जैसे ही हुई, पिताजी ने कहा – चलो सतीश, इसे डॉक्टर के पास ले चलें. ३ दिन हो गए, आखिर पता तो चले की इसे बिमारी क्या है?
पर डॉक्टर के पास ले जाने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. उसने कहा – मैंने उसे अच्छी तरह से चेक किया है, उसे फिजिकली तो कोई प्रॉब्लम नहीं है. आप एक काम करिये, जहां से ये कुत्ता लेकर आये हैं, वहाँ पता करिये।
पिताजी और सतीश दोनों को उसकी बात सही लगी. वो सिम्बा को लेकर सीधे उस केनेल में गए जहां से सिम्बा को लेकर आये थे.
वहाँ पहुँच कर उन्होंने सीधे मैनेजर को पकड़ कर पूछा ,”क्यों जी? ये कैसा कुत्ता दिया है तुमने? क्या बीमारी है इसे?”
मैनेजर ने डरते हुए कहा ,”सर, जब तक यहाँ रहा, तब तक तो ये बिलकुल ठीक था। “
“अच्छा, तो तुम ये कहना चाहते हो की इसे हमने बीमार बना दिया है?” पिताजी ने उधड़ते हुए कहा.
“सर, आप मुझे तसल्ली से बताइये की मसला क्या है? शायद मैं कुछ कर पाऊं।” जवाब में सतीश ने मैनेजर को पूरी कहानी सुना दी।
“ओह्ह ! तो ये मसला अभी तक ठीक नहीं हुआ!”
“मतलब, तुम्हें पता था की ये रातों में जागता है, तो ये बात तुमने हमे बताई क्यों नहीं?”
“नहीं सर, ऐसा नहीं है, ये सिर्फ तब तक रातों को जागा जब तक इसके दिल से ये डर नहीं चला गया की हम इसे छोड़ देंगे.”
सतीश ने हैरान हो कर पूछा – मतलब?
“जब आप इसे लेने आये थे, मैंने आपको बताया था की ये कुत्ता कुछ दिन पहले ही हमारे यहां आया है, दरअसल ये आया नहीं, लाया गया था. इसका मालिक ही इसे यहां लेकर आया था, उसको अभी अभी बच्चा हुआ है एक और वो कुत्ते की ठीक तरह से देखभाल नहीं कर सकता था. इसीलिए उसने सोचा की इसे यहां छोड़ जायेगा. पर उसे पता था की जब तक ये जगा रहेगा तब तक वो यहाँ से अकेले नहीं निकल सकता. इसीलिए उसने तब तक इंतज़ार किया जब तक ये कुत्ता सो  नहीं गया.”
“दूसरे दिन ये जब उठा था सर तो खूब रोया. बहुत दिनों तक कुछ नहीं खाया. शायद खुद को कोस रहा था की क्यों सोया। अगर नहीं सोता तो उसके मालिक उसे छोड़ कर नहीं जाते. अपने सोने को अपने अंदर की कमी मानता है सर ! इसीलिए जब आप इसे ले गए, तो सुबह से शाम तक ये खेला कूदा , सब नार्मल था सर। पर रात में जब आप लोग सो गए, ये फिर भी नहीं सोया। की कहीं इसके सोने की वजह से आप भी इसे कही छोड़ के ना चले जाएं.”
मैनेजर सतीश की तरफ मुड़ा। वो मासूम बच्चा बेतहाशा रोये जा रहा था. उसने उसके कंधे पर हाथ रखा, और कहा, “कुत्तों का दिल बहुत नाज़ुक होता है बेटा। इंसानों की तरह मैला नहीं होता।मन मुटाव नहीं होता। ये बैर नहीं रखते। इन्हें सिर्फ थोड़ा सा प्यार चाहिए होता है. अपने मालिक की ख़ुशी के लिए ये अपने सुकून को भी अपनी गलती मान लेते हैं। “
सतीश दौड़ कर सिम्बा के पास गया और उसे गले लगा कर रोने लगा. कभी कभी सिर्फ अच्छा होना ही काफी नहीं होता. कभी कभी शायद उससे ज़्यादा भी सोच लेना चाहिए, कर देना चाहिए।
उस रात सिम्बा का बिस्तर सतीश के बिस्तर ठीक बगल में लगा था. जब सतीश कमरे में आया तो उसके हाथ में एक बड़ी सी रस्सी थी. उसने रस्सी का एक सिरा अपने पैर पर बाँधा और दूसरा सिम्बा के. लाइट ऑफ करने के पहले उसने सिम्बा को प्यार से गले लगाया और कहा – दोस्त, आराम से सो जाओ. अब मैं तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगा।
इस घटना को पुरे १० साल हो चुके हैं, पर उस रात के बाद सिम्बा कभी भी किसी भी रात नहीं जागा।
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Baasab Chandana
"The Kahaani Wala" Dwelling into real life emotions, one person to another, walking into different shoes all the time, it's sur-real!

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