Phone No.: +917905624735,+919794717099

Email: support@kalamanthan.in

Home Poetries एक वायरस

एक वायरस

देखो कैसा दौर है आया
एक वायरस ने है उत्पात मचाया

जिस युग से हम लजाते थे
आज उसी युग ने हमें
देखो अपना महत्व समझाया
जिन पंछियों को भूल गए थे
आज उन्हीं ने अपना कलरव सुना
कैसे हमारा जी बहलाया

देखो कैसा दौर है आया
एक वायरस ने है उत्पात मचाया

गाड़ियों का शोर बहुत था
पक्षियों का ना था कोई ठिकाना
पेड़ों पर सरसराहट भी न थी
कहीं मर गई थी ऐसी चाहत भी
पर आज वो ही अच्छे लगे
जिनसे कभी हमने पीछा छुड़ाया

देखो कैसा दौर है आया
एक वायरस ने है उत्पात मचाया

आधुनिकता की दौड़ में
अपनों के लिए वक़्त न था
कुछ कह सकें कुछ सुन सकें
अपनों पे बचा इतना हक़ ना था
अब समय जब साथ बिताया तब जाना
हममें और उसमें इतना फ़र्क़ न था

देखो कैसा दौर है आया
एक वायरस ने है उत्पात मचाया

अब जब बाहर ना जा सकते हैं
तो स्वयं से मिलना अच्छा लगा
ख़ुद को ही अपना साथी बनाया
रिश्ता ये ही सबसे सच्चा लगा
दुनिया की इस दौड़ में
जो यूँ ही खो दिए थे
हर वो रिश्ता हर वो शख्स
यहाँ अपने ही जैसा लगा

देखो कैसा दौर है आया
एक वायरस ने है उत्पात मचाया।
©️डॉ.मनीषा

Manisha Yadava
Dr.Manisha Yadava is an Author/poet/reiki healer/Dowser/angels card reader/Motivational speaker/Meditater/Art of living volunteer and Member of Indian Literature society. She has done Phd in economics.She has been writing poetry since class 9th. As an Author she has written two poetry books “Mere Khayal and “Driya-E-Ehsaas” and CO-Author of four anthologies. This year she is releasing her third book in five different languages She was on 9th May 1973 in Meerut (up) in a well educated family.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

आंखो की नमी से बहता काजल

आंखो की नमी से, बहता काजल देखा है कभी ,दर्द का बादल !! काजल के बहने से, होती वो हल चल सासो के सिसकियां में , बदल...

चिड़िया

  मत कैद करों चिड़ियों को जाने दो जहाँ जाना है ! उड़ने दो इस आसमान मे उनको भी पंख पसारना है!!१!! उनको इस आसमान में अपनी पहचान बनाना है...

इंग्लिश वाली पर्ची

"अरे सुधा कहाँ हो ,जरा एक कप चाय पिला दो" राकेश जी ने अपनी पत्नी को आवाज दी..सुधा जी उम्र करीब 45 साल,केवल 8वीं तक...

राधे तेरी बन्सी और बृज की छाँव

राधे ,कहाँ गयी तेरी बन्सी और बृज की वो छाँव न रहा वो मिट्टी का अपनापन और गऊओं से लगाव अब नहीं आऊगा तेरे  गॉंव वो पुष्पों...

Recent Comments