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मीठे दरिया की मछली

 

उसने जब इस संसार में अपना पहला नन्हा सा क़दम लिया तो दादी ने उसकी झील सी गहरी और मछली जैसी बड़ी, सुन्दर आँखें देखकर बड़े प्यार से उसका नाम मीनाक्षी रखा, अर्थात मछली जैसी आँखों वाली । पूरे घर की लाडली मीनाक्षी जैसे जैसे बड़ी होने लगी, लोगों की स्वयं के ऊपर टिकती, ठहरती निगाहों से उसे यह अहसास हो गया कि वह बला की सुन्दर है ।चम्पई रंग, तीखे नैन नक़्श, साँचे में ढली काया और कमर तक झूलते काले घने लहराते बाल । रोमांटिक उपन्यास पढ़कर युवा होती मीनाक्षी के सपने देखती कि किसी दिन कोई सजीला राजकुमार आकर उसे ब्याह ले जाएगा और उसे रानी बनाकर रखेगा । 

मीनाक्षी के सपने पूरे हुए जब आई.ए.एस. अधिकारी सूरज से उसका विवाह हुआ ।धूमधाम से विवाह सम्पन्न होने के पश्चात मीनाक्षी ने बड़े अरमानों से सूरज की कोठी में क़दम रखा ।सपनों की दुनिया में विचरती मीनाक्षी, उस समय कठोर धरातल पर आ गिरी जब उसे पता चला कि सूरज में बड़े भ्रष्ट अधिकारियों जैसे कई दुर्गुण हैं । वह सिगरेट,शराब और शबाब का शौक़ीन है ।

पहली रात ही सूरज ने शराब के नशे में धुत्त हो, मीनाक्षी का घूँघट उठाते हुए कहा था “ तुम बहुत सुन्दर हो मीनाक्षी…बिलकुल किसी अप्सरा की तरह…तुम्हारी यह ख़ूबसूरती मेरे बहुत काम आएगी, मुझे बड़े अफ़सरों और नेताओं से अपना काम निकलवाने में आसानी होगी…तुम्हें भी मेरी हाई सोसाइटी में मूव करने के लिये सिगरेट और शराब की आदत डालनी होगी “

“यह आप क्या कह रहे हैं ? पत्नी हूँ मैं आपकी….मेरा सम्मान की रक्षा करना आपका दायित्व है…..और आप स्वयं ही…मुझसे यह नहीं हो पायेगा” मीनाक्षी की रुलाई फूट पड़ी ।

उसके इन्कार के बदले में सूरज ने अपनी जलती हुई सिगरेट से मीनाक्षी की देह पर अनगिनत निशान बना दिये और क्रूरता से हँस कर बोला  “जब भी मेरी बात नहीं मानोगी, यही पुरस्कार तुम्हें मिलेगा…मछली को जल में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं पालना चाहिये “

अब मीनाक्षी की स्थिति उस मछली की तरह थी, जो एक दुर्गन्धयुक्त तालाब में रहने को मजबूर थी । वह अपनी परेशानियाँ, अपनी पीड़ा अपने माता पिता से भी नहीं सकती थी क्योंकि वह यह जानती थी उसके हृदयरोगी पिता यह आघात नहीं सहन कर पायेंगे । 

कुछ महीनों बाद सूरज का स्थानान्तरण दूसरे शहर में हो गया था । नये शहर में “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” के अवसर पर आयोजित समारोह में सूरज मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान था । शहर के सभी छोटे बड़े पत्रकार समारोह में उपस्थित थे । मीनाक्षी सदा की तरह अपनी साड़ी का आँचल अपने इर्द गिर्द लपेटे, चुपचाप स्टेज पर बैठी थी । सूरज को मालाएँ पहनाई जा रहीं थीं और उसकी कर्मठता के क़िस्से हवाओं में गूँज रहे थे ।तभी अचानक एक महिला पत्रकार ने प्रश्न उछाला

“ मैं महिला दिवस के अवसर पर मैडम के विचार जानना चाहती हूँ….”

सूरज कुछ बोल पाता या मीनाक्षी को रोक पाता, उससे पहले ही मीनाक्षी ने माइक हाथ में लेकर बोलना आरम्भ किया 

“ आप देख रहे हैं कि मैंने साड़ी का आँचल अपने चारों ओर लपेट रखा है, ऐसा करना शालीनता की निशानी नहीं मेरी मजबूरी है….मेरा भी मन करता है कि मेरा आँचल खुली हवा में लहराए…परन्तु मैं ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करने से आपको मेरे शरीर पर पड़े वे अनगिनत घाव और निशान दिख जाएँगे जो मेरे कलेक्टर पति की देन हैं….पर आज “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” के अवसर पर मैं स्वयं से यह वादा करती हूँ कि अब अपने अस्तित्व और अपनी गरिमा से समझौता नहीं करूँगी…अब मेरा भी आँचल हवा से बातें करेगा “ कहकर उसने अपनी मुट्ठी में कसकर जकड़ा आँचल का दूसरा सिरा छोड़ दिया । 

एक पल के लिये हॉल में सन्नाटा छा गया, परन्तु दूसरे ही पल सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा ।आज मीनाक्षी ने वह दुर्गन्धयुक्त तालाब सदा के लिये छोड़ दिया है और एक जानी मानी पत्रकार के रूप में, ताज़े मीठे दरिया की मछली की तरह उन्मुक्त तैर रही है । 

 

*Pic credit - Anubhav Chaturvedi

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