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चलते चलते

शाम रात ढलते ढलते

तुम्हारी बात चलते चलते

न जाने क्यों ठहर जाती है

खामोशियाँ जुबान बनते बनते|

 

पत्ते शज़र से झरते झरते

तितली भंवर सब बन संवरते

न जाने क्यों ठहर जाती है

पतझड़ बहार बनते बनते|

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियोंऔरकविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं।लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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