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पढ़ो, पढ़ो और खूब पढ़ो

 

राइटिंग या लेखन के बारे में आपने बहुत सी बातें सुनी होंगी, जिनमें से सबसे ज्यादा रिपीट हुई होगी “खूब पढ़ो, खूब पढ़ो और खूब पढ़ो”| पर यकीन मानिये, आज के दौर में अगर हम सबसे ज्यादा किसी चीज की अनदेखी कर रहे हैं, तो वो है पढ़ने की आदत|

जब आप नियमित रूप से कुछ पढ़ रहे होते हैं, तो आपके अंदर एक आलोचक, संपादक या प्रूफरीडर जन्म लेता है

प्रकाशन के क्षेत्र में इतने वर्ष गुजारने के बाद मैं आपको एक बात आत्मीयता से कह सकती हूँ कि पढ़ना सिर्फ लेखन के लिए ही जरूरी नहीं होता, बल्कि वो आपको सोचने के लिए मजबूर करता है| घंटों फोन स्क्रोल करने या वेब पर बिंज वाच करने से जहां आपका दिमाग सुन्न होने लगता है, वहीँ रोज एकाध घंटा पढ़ने से दिमाग एक बात से दूसरी पर जम्प लगाने लगता है| पढ़ने से ऐसा नहीं है कि आपको कुछ ऐसी चीज पता चलेगी, जो आप नहीं जानते हो| जानकारियों के लिए तो वैसे भी सोशल मीडिया हर समय उपलब्ध है| लेकिन सिर्फ देखने भर से हम उस जानकारी का सही इस्तेमाल या यूं कहें कि उस जानकारी का इस्तेमाल अपनी कहानी में सही ढंग से कर पाने में असमर्थ रहते हैं| पढ़ने की आदत से आपको पता चलता है कि एक सामान्य सी सुबह की चाय को भी कितनी ख़ूबसूरती और कितनी विविधता से पटकथा में इस्तेमाल किया जा सकता है| वेब सीरिज या कोई फिल्म देखते हुए एक साथ हमारे दिल में बहुत सी भावनाएं आती हैं, जिन्हें सही शब्दों और सही फॉर्मेट में बाहर निकालने के लिए हमारे पास पठन का आधार होना चाहिए|

और पठन से जुड़ी एक सबसे बड़ी बात, जब आप नियमित रूप से कुछ पढ़ रहे होते हैं, तो आपके अंदर एक आलोचक, संपादक या प्रूफरीडर जन्म लेता है, जो आपकी खुद की मेहनत से तैयार की हुई स्क्रिप्ट की जबरदस्त कटाई-छटाई कर सकता है| यकीन मानिए प्रकाशन संस्थानों में बैठे संपादकों के पास इतना समय और धैर्य नहीं होता कि वो आपकी अपरिपक्व पांडुलिपि से माथा-पच्ची कर सकें| अगर आप उन्हें कड़क स्क्रिप्ट भेजने में कामयाब होते हैं, तो आप अपने लिए एक अतिरिक्त बढ़त बना लेते हैं|

लिखने से पहले आप एक पाठक की तरह सोचिये कि आप बुकस्टोर से किस तरह की किताब उठाना पसंद करेंगे?

ये तो बात हुई पढ़ने की अब आते हैं आपके लेखन पर| लिखने से पहले आप एक पाठक की तरह सोचिये कि आप बुकस्टोर से किस तरह की किताब उठाना पसंद करेंगे? या इन दिनों बेस्टसेलर में आने वाली किताबों में क्या लिखा जा रहा है? या जो साहित्य या कला क्षेत्र में आपके वरिष्ठ हैं, वो ऐसा क्या लिख गए कि पचास, सौ और हजारों साल पुरानी लिखी हुई उनकी बातें आज भी अनेकों शोधों का आधार बनती हैं| इसे कहते हैं किताबों की शेल्फ लाइफ| लेखन में जितना अधिक धैर्य का पुट होता है, उतना ही अधिक किताब का जीवन आता है| ज़रा सोचिये कि पिछले पांच सालों में आई नए लेखकों की किताबों में से कौन सी किताब ये स्थान प्राप्त कर पायेगी|

 

कई प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों और राइटिंग प्लेटफार्म की ज्यूरी से जुड़े रहने के कारण मुझे किस्मत से अनेकों पांडुलिपियों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ| उभरते लेखकों की अक्सर शिकायत रहती है कि उनको अपनी किताब के लिए प्रकाशक नहीं मिल पाते| इस बात में आंशिक सचाई ही है| प्रकाशन क्षेत्र में हम लोग कहते हैं कि अब लोग लिखते तो बहुत हैं, लेकिन किसी ढंग की स्क्रिप्ट को पढ़ने के लिए अक्सर हमारी आंखें तरस जाती है|

बात दरअसल ये है कि प्रकाशकों या ज्यूरी के पास अधिकतर अपरिपक्व पांडुलिपि पहुँचती है| राइटिंग एंट्री के नाम पर सत्तर से अस्सी प्रतिशत तो कवितायेँ आती हैं और बाकी बचे प्रतिशत में जो गद्य आता है, वो पढ़ने में ‘निबंध’ का अहसास कराता है| कुछ जगह जबरन भारी-भरकम शब्दों को घुसाकर पांडित्य प्रदर्शन का प्रयास भी देखा जाता है| आपको इस सबसे बचने की कोशिश करनी होगी| कवितायेँ जहाँ अभिव्यक्ति का सहज माध्यम हैं, वहीँ वो बहुत जटिल, असाध्य और निजी भी होती हैं| हम जिन भावनाओं में बहकर उन्हें लिख गए, जरूरी तो नहीं कि पढ़ने वाला भी उन सुकोमल भावनाओं तक पहुँच सके| इसलिए कवितायेँ को जहाँ अभिव्यक्ति की शुरुआत माना जाता है, वहीं उन्हें लगातार पकने देना चाहिए|

कविता का स्वाद पुराने चावल या पुरानी शराब सरीखा होना चाहिए|पूरे दिल से लिखते रहिये , लेकिन इंस्टेंट कविता के नाम पर उसके छपने की उम्मीद मत रखिये |

 

स्वानंद किरकिरे जैसे महान व्यक्तित्व की कविताओं का पहला संग्रह “आप कमाई” के नाम से अभी दो साल पहले ही प्रकाशित हुआ है| जबकि इससे पहले वो गायन, गीत लेखन, अदाकारी और निर्देशन में अपनी साख जमा चुके थे| ये बताकर मैं आपका हौंसला तोड़ना नहीं, बल्कि ये समझाना चाहती हूं कि अगर आप कविता लिखते हैं, तो पूरे दिल से लिखते रहिये| लेकिन इंस्टेंट कविता के नाम पर उसके छपने की उम्मीद मत रखिये| कविता का स्वाद पुराने चावल या पुरानी शराब सरीखा होना चाहिए|

टारगेट रीडरशिप

गद्य वालों को और भी जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी पांडुलिपि की टारगेट रीडरशिप दिमाग में रखनी चाहिए| उन्हें समझना होगा कि उनकी किताब में ऐसा क्या है, जो सौ या हजारों किताबों की भीड़ में अपनी विशेष जगह बना सके| इसी में एक और बात जोड़ते हुए मैं कहना चाहूंगी कि हिंदी में खेल, विज्ञान, इतिहास जैसे विषयों पर मौलिक लेखन बहुत कम होता है| अक्सर ऐसे विषयों के लिए हमें अनूदित किताबों पर निर्भर होना पड़ता है| मशहूर व्यक्तियों की जीवनी भी पहले अंग्रेजी या इतर भाषा में आती है, फिर उसका हिंदी में अनुवाद होता है| क्यों नहीं हम अपनी मौलिक भाषा में इन विषयों पर विस्तृत लेखन करें| इन विषयों पर सोचना शुरू करें| इन पर कुछ जानकारीपूर्ण लेख लिखें| वैसे लेखन का विषय अपनी रुचि के अनुरूप ही चुनना चाहिए, मैं बस एक तथ्यात्मक बात की ओर ध्यान दिला रही थी|

एक बार इन बातों को समझने के बाद जब आप अपनी पांडुलिपि देखेंगे, तो यकीन मानिये आप खुद उसके साथ न्याय कर पाएंगे| आपकी पांडुलिपि पूरी तरह सही है, बस इन सुझावों और आलोचकीय दृष्टी से आप उसे और निखार सकते हैं|

 

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