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अंकुश

“विद्या चाची, चाचाजी कहां है?,” सुप्रिया ने चाची को आवाज दी।”अरे बेटा, वो तो स्कूल के लिए निकल गये।”

“इतनी जल्दी! ”

“हां… आज उनके स्कूल में कोई पदाधिकारी आने वाले थे इसलिए जल्दी निकल गए।”
“ओह! अब मैं, ये गणित का सवाल कैसे हल करूंगी? आज तो क्लास में पक्का डांट पड़ेगी मुझे।”, सुप्रिया बड़बड़ाने लगी।
“देखूं तो कौन सा सवाल मेरी बिटिया से हल नहीं हो रहा,” इतना कहकर चाची ने सुप्रिया के हाथ से काॅपी ले ली।
“चाची आप देखकर क्या करेंगी? मुझे दिजिए मैं किसी और से पूछ लूंगी।”
“रूको तो, हम्ममम ये रहा सवाल का जवाब। इतना भी कठिन नहीं था, बस तुम्हें ये मेथड लगाना चाहिए था।,” चाची ने सुप्रिया को काॅपी पकड़ाते हुए कहा।
सुप्रिया कभी काॅपी पर किए गए सवाल का हल देखती और कभी चाची की तरफ।
“क्या हुआ?”, चाची ने कहा।
“आप तो पढ़ी लिखी नहीं है फिर आपने इस सवाल को हल कैसे किया? वो भी नौवीं कक्षा के गणित का सवाल,” सुप्रिया ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा।
“तुम्हें तुम्हारे चाचा ने बताया होगा कि मैं पढ़ी – लिखी नहीं हूं लेकिन मैं ग्रेजुएट हूँ,” चाची ने कहा।
“क्या कह रही है आप, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा! इसका मतलब आप चाचाजी से भी ज्यादा पढ़ी – लिखी है। घर में आजतक किसी ने नहीं बताया कि आप पढ़ी – लिखी है।,” सुप्रिया ने चौंकते हुए कहा।
“हां, क्योंकि तेरी दादी को ऐसा लगता था कि पढ़ी लिखी लड़कियां घर नहीं संभाल सकती वो सिर्फ ज़बान लड़ाती है और विनय को इस बात का डर था कि कहीं किसी को उनके मुझसे कम पढ़ें – लिखे होने का पता न चल जाए इसलिए मेरी सारी डिग्रियां विनय ने जला डाली।” , चाची ने रूंधे हुए गले से कहा।
ओह! आपने इतना कुछ सहा है फिर भी चुप है। मैं चाचाजी से इस विषय में बात करूंगी।, सुप्रिया ने गुस्से से कहा।
“नहीं.. नहीं तू ऐसा कुछ नहीं करेगी। न जाने वो तेरी पढ़ाई भी..,” कहते – कहते रूक गई।
“तू चाची को खुश देखना चाहती है तो एक काम कर मेरे लिए अपनी लाइब्रेरी से किताबें ले आना। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है।, विद्या ने उत्सुकतावश कहा।
“इतनी सी बात चाची, मैं रोज आपकी पसंद की किताबें ले आऊंगी लेकिन एक शर्त पर”, सुप्रिया ने  हँसते हुए कहा।
“कैसी शर्त?”
“आज से आप मुझे पढ़ाएंगी,”।
“जरूर पढ़ाऊंगी,” इतना कह  विद्या ने सुप्रिया को गले से लगा लिया।

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