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जनानखाना , बचपन और फेमिनिज़्म

आज कल का वक़्त हर कोई अलग अलग तरह से गुज़ारने की कोशिश में हैं। साडी से ले कर खाने का चैलेंज चला और लॉकडाऊन को गुजरने के कई नुस्खे दिए गए। लॉकडाऊन 2 तक कितने ही बीस बरस पीछे पहुंच गए और यादें ताज़ी हो गयी।
अपनी कहूं तो कुछ किताब में गुज़री और कुछ किताबों के किरदारों में और कुछ लफ्ज़ यकाएक २० नहीं यही कोई ३५-४० बरस पीछे ले गए !
हाल ही में दोबारा सुना – जनानखाना !
याद है किसी को या सुना है ये लफ्ज़?

जनानखाना – बचपन के गांव में गुज़रे दिनों का खूबसूरत हिस्सा – मां के आँचल सा ठंडा , दादी के दुलार से भीगा ,चाची काकी बुआ भतीजी के हंसी ठठोली से महकता।

जनानखाना यानि की घर का वो हिस्सा जहां पुरुषों का प्रवेश बंद हो या कहें की मर्यादित या रिस्ट्रिक्टेड हो।
ज़रा खराश कर या फिर खड़ाऊं की आवाज़ से, अपने आने की आहट दे देते थे घर के मर्द, ताकी नई बहुएं या भावज ज़रा पल्लू संभाल लें।

जनानखाना या जनाना या जनानी ड्योढ़ी सब एक से बिलकुल जैसे नारी ,औरत ,अबला पर्यायवाची है। बस बोली भाषा में अलग लेकिन रहने वालीयों की ज़िंदगी एक सी।

जनानी ड्योढ़ी की तासीर कुछ कुछ अधपके आम सी थी। जहां एक ओर सास बहू ,नंद भावज देवरानी जेठानी की नोंक झोक या उठा पटक चलती थी वहीं एक दूसरे के दुःख सुख में सर पर हाथ भी फेर लेती थी।
जनानी ड्योढ़ी के बाहरी सीमा जिसे ओसारा कहते थे वहां पर हमारी दादी का तख्त लगता था। दोपहर में ,जो की सुबह ११ बजे से शाम ४ बजे तक का समय था ! इस समय में उस तख्त पर वो बैठा करती और एक तरफ जनाना पर नज़र रहती दूसरी ओर बाहर के बैठक में आये गए लोगों की खबर रहती। मुझे ये किसी मिडिल लेवल मैनेजर की पोस्ट के प्रेशर सा लगता बॉस ,एम्प्लोयी सब पर नज़र रखना !
वहां होता पानदान ,पानी का लोटा, फूल का। फूल यानि एक तरह का धातु जो की पीतल और ताम्बे से मिल कर बना होता और चमक चांदी सी होती। इन सबके साथ रहता “बेना “यानि कि हाथ से डुलने वाला पंखा। अब हम बच्चों की होड़ पान या पानी की नहीं थी बल्कि बेने की थी। दोपहर भर कोई बेने से हवा कर दे तो और क्या चहिये और साथ ही बोनस में मिलती कुछ कहानियां। इब्नबतूता , राम सीता बियाह ,कंस वध और ध्रुव तारा ये कुछ उन्ही से सुनी। मज़ेदार बात ये की इब्नबतूता का इस्तेमाल वो हम बच्चों को डराने में करती मानो विदेशी इब्नबतूता अपनी कहानियों के किरदार समझ हमे ले जायेगा। शायद पश्चिमी समाज की आहट और समाज की सीमाओं से अवगत करने का उनका तरीका था।
ड्योढ़ी की ज़रूरत पर उस वक़्त भी हम सवाल उठाते। बचपन से ही हमारे सवाल उन्हें हमारे विद्रोही होने का एहसास कराते थे और वो बहुत से सवालों पर “अइसन नहीं होत बिटिया ” कह देती और कहीं न कहीं उनकी प्यार भरी पर मज़बूत रखवाली हमे पीछे खींच लेती। अक्सर लगता की पितृसत्ता की दिवार के दरवाज़े पर वो रखवाली कर रहीं है और उस पार किसी बेटी बहू को जाने की इज़ाज़त नहीं मिलेगी।
जनानखाने की दुनिया अलग थी। बिलकुल डेमोक्रेटिक और संगठित।
चूल्हा चौका को कहांर आते थे। जी कहांर और कहांइन – एक घर में पानी भरने और बाहर बैठक की देखभाल करते और और कहांइन चाची चौका लीपती, बर्तन धुलती और शाम के चूल्हे की लकड़ी और उपले का इंतज़ाम करती। इन सबमे ये न भूलियेगा की इन्हे काका काकी ही कहा जाता और ये घर का हिस्सा हो होते थे। संगठन का सबसे निचला और मज़बूत हिस्सा जैसा की आज के घरों में हेल्पर हैं जो हमारी आज की ज़िंदगी को जीने में मदद करते हैं। पर क्या वो घर का हिस्सा बन पाते हैं ? ऐसा नहीं की इंसानियत में कमी है या आपके देने की नियत में खोट है पर कितना ही समय व्यतीत कर लेंगे आप अपने हेल्पर के. साथ? बच्चे उनके काका काकी तो नहीं कहेंगे और न हम उनके घर होली का गुलगुला भेजेंगे।
अब गुलगुला क्या होता है वो बाद में।
बात ये की वो संगठन को संबल देते थे और संगठन इनको। उसके ऊपर होती थी घर की छोटी बहू जो अक्सर रोज़मर्रा की दाल तरकारी , चाय नाश्ता की ज़िम्मेदार होती। बच्चों की भी फेवरट क्योंकि दाल के कटोरे में जयादा घी और दूध के कोसे में ऊपर से मलाई यही देती थी। सुबह के नाश्ते का भी इंतेजाम करने में इनका हाथ होता था और रात को नींद में बोझिल आँखों को भी कहानी सुना कर खाना खिलाना इनकी ज़िम्मेदारी।
उसके ऊपर बड़ी और मझली होती जो चौके से ज़रा बाहर देखती। इनके पास और काम होते। डेहरी भरी या खली है , चक्की पीसी जानी है या ढेंका चलना हैं।ओह चक्की तो जानते हैं आप ढेंका कहे तो चवल कूटने का यंत्र और डेहरी मिटटी के बड़े बड़े कनस्तर नुमा अनाज रखने के लिए बनाये जाते ।
घर की औरतें गाती बजाती जेठ की लम्बी दुपरहरिया इसी में काट देती थी। हाट से क्या आना है और बाग़ से क्या तोडा जाना है ये लिस्ट इनकी ज़िम्मेदारी होती। हाँ लिस्ट भर ही क्योंकि बाकि तो ओसारे में बैठी थी “दादी ” जनानी ड्योढ़ी की बॉस !
तो अब कुछ कुछ अंदाज़ा हो गया होगा आपकी जनानखाने की हाइरार्की का। हर किसी का अपना ओहदा होता और अपनी सीमा।

यही थी औरतों की दुनिया की हद। सोचने समझने के लिए भी हद बनी हुई थी। आज जनानी ड्योढ़ी नहीं रही पर दुनिया हद वही रखना चाहती है ।और इसी हद को तोड़ने की सारी मशक्क्त है|

यहां पर दुनिया बड़ी अलग थी। बाहर की दुनिया से अलग यह दुनिया बनी ही औरतों के लिए।

पूरी तरह से फेमिनिस्ट और खुले विचारों वाली।
अब फेमिनिस्ट को आजआप क्या समझते है वो आप जाने लेकिन फेमिनिस्ट से मेरा मतलब हर किसी की बराबर अहमियत से था।
रात को सभी औरतें घर के मर्दों के बाद मिल जुल कर खाना खाती।

घर के मर्द पहले क्यों खाएंगे ये सवाल तब भी था और आज भी है और जवाब … हो तो बताईयेगा।

अगर सब्ज़ी कम पड जाये जो बची सब्जी में से सबको बाँट दिया जाता |और साथ बन जाता सिरके वाला प्याज़ या कोसे का दूध ,अगर गाय लगती हो तो।
मोल दूध औरतें नहीं पीती थी।
ये किसी पिछड़े घरों की बात नहीं कर रही बल्कि, आम से भरे पूरे घर जो खेती बाड़ी में बड़े आदमियों की फेहरिस्त में आते थे।
ये ओसारा और बैठक से जनानी ड्योढ़ी के भीतर जो खबर पहुँचती वो बड़ी छनी हुई होती और इसीलिए जनानी ड्योढ़ी से बाहर भी छन कर ही पहुँचता जो भी होता!

जी हाँ , सेक्सुअलिटी से ले कर इक्वलिटी तक सब कुछ डिसकस होता बस बाहर नहीं आता था।

कोफ़्त उन्हें भी होती थी और कई बार बंद कमरे में शायद चिखना चिल्लाना भी हुआ हो लेकिन पता नहीं। ये हम बस कयास लगा रहे हैं क्योंकि कुछ सुबहें भारी होती थी। जब खाने में स्वाद कम होता और ड्योढ़ी में सन्नाटा ज़्यादा।
और इन दिनों में कहांइन चाची आती हुई कहती “इ जिया का भइल ?आज दुल्हिन लोगों के हंसी ठठ्ठा नाई सुनाई पड़त है ? कोनो बेराम है का ?”
और इस वक़्त दादी की बात “अरे अब हर दिन एक जइसन नहीं होत। कब्बो नम भी होये। मेहरारू के बहुत कुछ सहे पड़ा ला। चला तू आपन काम करा।”
ओसारे पर बैठी दादी उस वक़्त जनानखाने का संबल होती थी। मज़बूत और समझती हुई की उस पार जाने की कोशिश अभी बेकार है।
बाकि रोज़मर्रा के “ऑफिशियल इश्यूज ” को अक्सर आपस में सुलझा लिया जाता। चार बर्तन खटकते ही हैं ये कह कर कभी छोटी, कभी मंझली, कभी बड़ी सबको समेट लेती। दादी तक तो बात न ही पहुंचती।
उन तक पहुंचते थे बस हम। मतलब हम बच्चे कभी इब्नबतूता की कहानियों की फरमाइश और कभी दोपहर में पों पों वाली साइकल पर बिकने वाली बर्फ को खरीदने की ज़िद्द के साथ।
पैसे नहीं दिए जाते उसको बस दिया जाता गेहूं चावल या कोई अनाज ।
वो पैसे से नहीं आती थी। उसको मोल जननी ड्योढ़ी से मलाई का स्वाद चख कर लगाया जाता था।
अब वो जनानखाने वाला रिवाज़ नहीं रहा।
फेमिनिज्म के मायने बदल गए।
बचपन है पर बचपना नहीं रहा |
नए ज़माने ने हदें बरकरार रखने की पूरी कोशिश की लेकिन पकड़ ढीली पड रही है।
मशक्क्त जारी लेकिन एक दूसरे का संबल बन पाने की आदत कम हो रही है। ऐसे में जनानखाने की ज़रूरत आज भी महसूस होती है।
नारी ,औरत ,अबला जो भी कह लो जनानी ड्योढ़ी में बेपर्दा हो कर सुख भी कहती और दुःख भी।
हौसला भी मिलता और गुर भी।
ज़िंदगी के हथकंडे भी सिखाये जाते और रिश्ते संभालने का हुनर भी।
उस पार जाने की कोशिश को संबल भी मिलता और पहरेदारी भी ।

 

:) गुलगुला - आटे में चीनी दूध दाल कर मीठी पकोड़ी सी तल ले। लो एफर्ट ,हाई कैल गुलगुला 
           और बिलकुल इररेसिस्टिबले!!

 

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nirjhra
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9 COMMENTS

  1. वाह ! कितनी अच्छे तरीके से आपने जनानखाना, बचपन और फेमिनिज्म की बारिकियां दिखा दी। समय बदल गया पर कुछ सवाल अब भी वही है। उम्दा लेखन

  2. बहुत सुंदर !!आपने तो गाँव की यादें ताज़ा कर दीं !!

  3. बहुत बढ़िया …जीवंत ..लिखा है….लिखा नही है …स्मृतियों को साझा किया है और एक समाज ,एक पूरा ज़माना उतार दिया …औरत को अबला न दिखा…आत्मसंतुष्ट और सशक्त,ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने वाली दिखाया है …और यह हकीकत थी जिसे अबला बना कर जिन्होंने पेश किया उसके पीछे शायद उनकी खुद की संकीर्ण व नकारात्मक सोच होगी।
    बहुत बढ़िया हार्दिक बधाई

  4. Beautiful writeup…
    I have similar memories of my family back in Kashmir during my childhood.. thank you for reviving those..
    Stay safe and keep writing….

  5. Kya baat hai aaj to purani yaad taza ho gai bahut hi bareeki se bayan kia janankhana umda lekhan ,sach aaj bhi swal wahi hai ,soch bhi wahi hai bas najariya badal gai hai very good sarita

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