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नए भारत की तस्वीर- प्रगति पथ

नमस्कार!

हमारे देश में कई सेलेब्रिटीज़ हैं, फ़िल्मस्टार्स से लेकर स्पोर्ट्स के धुरंधर तक, जिन्होंने अपनी मेहनत से सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में नाम कमाया है। आज इन्हें हर कोई जानता है, इनके सोशल स्टेटस की वजह से, इनके नाम की वजह से. ये चाहे कोई नए कपडे पहने या फिर कोई नया मोबाइल लें, फैंस के ऊपर उन्हीं चीज़ों का भूत सवार हो जाता है। पर जहाँ अपने देश में ऐसे लोग हैं, वहीँ कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें फेमस होने का कोई ख़ास शौक नहीं है। जिनके बारे में हम और आप ज़्यादा नहीं जानते, पर उन्होंने अपने तरीके से, अपनी समझ के अनुरूप, अपने आस पास के लोगों के लिए, समाज के लिए, इस देश के लिए बहुत कुछ किया. हमारी ये सीरीज़ कुछ ऐसे ही लोगों के ऊपर आधारित है, जो अपने निरंतर प्रयासों से ना सिर्फ़ अपने जीवन बल्कि दूसरों के जीवन में भी कोई बदलाव, कोई सहारा, कोई सुक़ून लाने का काम करते हैं।

 

आज एक ऐसे ही शख़्स से बातचीत की और उसकी कहानी आप तक ले आया| एक ऐसे ही शख़्स  जो ना सिर्फ़ कठोर संघर्ष कर के ख़ुद अपने पैरों पर खड़े हुए, बल्कि आज दूसरों को भी उचित मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं, आई.आई.टी में कार्यरत श्री आशीष शर्मा जी की। आशीष उन्नाव ज़िले में बदरका गाँव (चंद्रशेखर आज़ाद की जन्मस्थली) के पास जगजीवनपुर गाँव के रहने वाले  हैं और उनका संपूर्ण परिवार गाँव में ही रहता है।

“मेरे पिता ‘श्री राम सागर शर्मा’ का जीवन कठोर तप में गुज़रा, मेरी माँ ‘श्रीमती सुषमा शर्मा’ के साथ उन्होंने हर कष्ट का सामना किया और मेरे और मेरे भाई ऋषि शर्मा की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। मुझे याद है जब कॉलेज के दिनों में हमे प्रोजेक्ट्स बनाने को मिलता था तो मैं और मेरे दोस्त बस पकड़ के लखनऊ जाते थे, और वहाँ से अपने प्रोजेक्ट का सारा सामान सस्ते दामों में ले आते थे, क्योंकि कानपुर एक छोटा सा शहर है और यहाँ पर ज़्यादा साधन उपलब्ध नहीं हैं, और जो इक्के दुक्के स्टोर्स हैं, वो बहुत महंगे हैं।”

 

कभी कभी किसी के बात करने भर से उसके जीवन के श्रम और व्यक्तित्व के बारे में आप सब कुछ जान लेते हैं। आशीष पर पिताजी के संघर्ष पूर्ण जीवन और कठिन परिश्रम की छवि, उन के सहज और सरल व्यक्तित्व में पूर्णतः झलकती है।

जब आशीष अपने कॉलेज के आख़िरी सेमिस्टर में थे और इंटर्नशिप करने की बारी आई, तो सौभाग्यवश आई.आई.टी कानपुर के लिए ही काम कर रही एक इन्क्यूबेटेड कंपनी ने उन्हें ऑफर किया।

“मैं सुबह से दोपहर तक कॉलेज में पढ़ाई करता था, और फिर बस पकड़ के आई आई टी कानपुर जाकर शाम को देर तक इंटर्नशिप करता था. जीवन के वो ६ महीने मुझे आज तक याद हैं।”

पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, ये तो बस शुरुवात है। इंटर्नशिप के तुरंत बाद उसी कंपनी में उन्हें नौकरी मिल गयी और आशीष को लगा अब जीवन ने उन्हें रास्ता दिखा दिया है, पर २ साल के बाद ही वो कंपनी बंद हो गयी और काम ढूंढने के लिए उन्हें शहर से बाहर जाना पढ़ा। कुछ महीने बेंगलुरु की एक कंपनी में काम करने के बाद उसी कंपनी के एक प्रोजेक्ट के लिए वो वापस लखनऊ आये और वहाँ के कॉलेज में कार्यरत हुए, पर अभी संघर्ष बाकी था शायद। वो कंपनी भी बंद हो गयी और फिर से आशीष को अपने जीवन यापन के लिए मुश्किलें उठानी पड़ी. पर इस बार समय बदला। और आई.आई.टी ने अपने द्वार वापस खोले, एक कंपनी जो की वहीँ कार्यरत थी, उसने जॉब ऑफर की और फिर से आशीष की गाडी पटरी पर आ गयी. धीरे धीरे समय बदला और २०१९ में आई आई टी ने अपने पदों के लिए ऑफर्स निकाले. आशीष तो जैसे सिर्फ इसी दिन की चाह में जी रहे थे, उन्होंने जल्द अपना एप्लीकेशन सबमिट किया और अब आशीष पूर्ण रूप से आई.आई.टी कानपुर का एक अहम् हिस्सा हैं।

आज के दौर में जब लोग इंजीनियरिंग करने के बाद, एम बी ए करके किसी और सेक्टर में नौकरी करते हैं, ऐसे में वो क्या चीज़ थी जो आशीष को इतने संघर्षों के बाद भी अपने पथ से डिगा ना सकी?

“मेरा मानना है की मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो उसे करना अच्छा लगता हो। ऐसे में वो अपना १०० प्रतिशत देगा और उस काम को करने का उसे लाभ भी ज़्यादा मिलेगा।”

इतने संघर्ष के बाद भी, इतनी रुकावटों के बाद भी इंजीनियरिंग में क्यों रहे ?

“सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही है की लोगों को पता ही नहीं है की वो इंजीनियरिंग क्यों कर रहे हैं या इंजीनियरिंग के बाद एम बी ए क्यों करेंगे! सिर्फ़ दूसरों की  बातों और बहकावे में आकर लोग शुरुवात कर देते हैं। मेरे जीवन का सिद्धांत ही यही रहा है की जीवन में वही करना चाहिए, जिसे करके ख़ुशी मिले। मेरे इंजीनियरिंग के दिनों में भी लैब जाता था, रोबोट्स वगैरह बनाता था, कुछ भी काम करता था तो मन में संतुष्टि मिलती थी। मैंने २००९ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, २०१० में मेरे पिताजी ने मुझे एक अध्यापन का कोर्स करने के लिए कहा ताकि मेरी किसी स्कूल में मेरी सरकारी नौकरी लग जाए। उन्होंने मेरा फॉर्म भी ख़ुद ही और इसे नसीब ही कहेंगे की मुझे उसके लिए चुन भी लिया गया था। अब  जाकर सिर्फ़ ट्रेनिंग करनी थी और २ वर्ष के बाद मेरी नौकरी लग जाती। और उनकी तनख्वाह भी बहुत अच्छी होती है ५०,०००-६०,००० मिलते हैं हर महीने। तो पिताजी ने बुलाया घर और बोले, तुम्हारा दाखिला हो गया है वहाँ पर, तुम अब ये सब छोडो और वहाँ की तैयारी करो। उस वक़्त मेरी पिताजी से बहस हो गयी और मैंने उन्हें पूछा कि आपने मुझे इंजीनियरिंग क्यों करवाई फिर? तो फिर मैंने अपनी नौकरी ही की।

मेरा प्यार इंजीनियरिंग ही है,मशीने हैं, मुझे उसी से ख़ुशी मिलती है, तो तो कुछ और करने का या सोचने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।”

 

इंजीनियर और स्टैंड अप कॉमेडी का रिश्ता

इंजीनियरिंग अपने आप में बहुत ही दिलचस्प और कठिन है। १ सेमिस्टर में ५ विषय पढ़ने होते हैं, साल के २ सेमिस्टर के हिसाब से पुरे कोर्स में ४० विषय। इनमे से ३० में प्रैक्टिकल होते हैं। फिर तीसरे साल एक इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग होती है और चौथे साल में ख़ुद का प्रोजेक्ट बनाना पड़ता है। इसके साथ साथ बहुत सारे सेमिनार्स आपको अटेंड भी करने होते हैं और करवाने भी पड़ते हैं, कॉलेज कलचरल फेस्ट, पार्टिसिपेशन बहुत सारी चीज़ें हैं। तो इन सबसे जूझ कर एक इंजीनियर निकलता है, सुबह नहाने की लाइन की मारामारी से लेकर टूथपेस्ट के खोये ढक्कन की लड़ाई तक या फिर समय पर प्रोजेक्ट ना सबमिट कर पाने के बहाने, ऐसे ही ये प्रतिभा आ जाती है।”

क्या इंजीनियरिंग की पढ़ाई में कुछ बदलाव आने की ज़रूरत है?

दो प्रमुख बदलाव जो की जल्द से जल्द आने चाहिए :-

(१) पहला जो रिसोर्सेज आई.आई.टी के बच्चों को मुहैया होती हैं, वैसी ही नॉन-आई.आई.टी कॉलेज में भी होना चाहिए। १ आई आई टी के छात्र को २४ घंटे लैब और लाइब्रेरी की सुविधा मिलती है पर दूसरे कॉलेज ५ बजे सब बंद कर देते हैं। तो ये एक बहुत बड़ा कारण है की आई आई टी से ही ज़्यादातर होनहार नौजवान निकलते हैं और जब वो अपना प्रोजेक्ट लेकर प्रोजेक्ट लेकर सरकार के पास फंडिंग के लिए भी जाते हैं तो उन्हें ज़्यादा तवज्जो दी जाती है।

(२) दूसरा सिलेबस में बदलाव होने चाहिए। आई आई टी का सिलेबस पूर्ण रूप से प्रैक्टिकल एप्रोच रखता है और नवीनतम बदलावों का अनुसरण पाठ्यक्रम में बदलाव करता है। पर नॉन-आई.आई.टी कॉलेजेस में ऐसा नहीं है. वो वही २० वर्ष पुराने पाठ्यक्रम के हिसाब से चल रहे हैं जिसकी इंडस्ट्री में कोई वैल्यू नहीं रह गयी। अगर पाठ्यक्रम में सुधार नहीं भी हो पाए तो कम से कम तीसरे और चौथे वर्ष के बच्चों का इंडस्ट्रियल कनेक्ट प्रोग्राम बहुत ही बढ़िया होना चाहिए और थ्योरी हटा दी जानी चाहिए ताकि बच्चा अपना ज़्यादा समय इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों का अनुसरण और अनुपालन करने में लगाए।

इसके दो फ़ायदे हैं, पहला तो ये की बच्चा असली दुनिया में जाकर प्रैक्टिकली चीज़ों को समझता है और दूसरा इंडस्ट्री में जो मैनपॉवर की कमी है, उसे भी पूरा करता है.

एक और बात है की १०वीं और १२वीं के छात्रों को भी उन बदलावों की जानकारी दी जानी चाहिए जो हमारे इंडस्ट्री में आये दिन होते रहते हैं। अगर प्रैक्टिकली संभव ना हो तो थ्योरी और वीडियोस के माध्यम से, पर बच्चों को ये पता होना चाहिए की राकेट की दिशा सीधी ही क्यों जाती है, टेढ़ी क्यों नहीं जाती। या फिर अग्नि-१ PSLV से अग्नि-५ तक क्या क्या बदलाव हुए।

 

सोशल डिस्टेंसिंग पर बनाया गया आपका डिवाइज़

Device name – Wearable Sensing Social Distancing Alarm Device (DAD version 1.0)

फिर आया कोरोना और समाज के प्रति अपने दायित्व बोध के चलते आशीष ने सोशल डिस्टेंसिंग पर ये डिवाइस बनाया जो की डिस्टेंस मेज़र करता है २ लोगों के बीच। ऐसे आप सरकार की बनायीं हुई १ मीटर की दुरी का पालन कर सकते हैं।

“ऐसा १ सेसंर मार्केट मेँ मिलता है पर उसे ले कर, उसका पूरा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाना पड़ता है, उसकी प्रोग्रामिंग करनी पड़ेगी, उसका पॉवरबैंक डिज़ाइन करना पड़ेगा। तो जब मैंने ये सब देखा तो मुझे लगा की किफायती दाम पर और रेडीमेड युज़ेबल एक डिवाइज़ बनाना चाहिए को हर आम आदमी खरीद भी सके, और उसे पहन कर अपनी सुरक्षा भी कर सके।”

यूट्यूब चैनल के ज़रिये ज़्यादा बच्चों तक पहुंचने की कोशिश  

आशीष ने गाँव में और छोटे शहर में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यूट्यूब चैनल बनाया और उसमे सरल रूप से हिंदी भाषा में वीडियोज़ डालने शुरू किये।

बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए लगातार कार्यरत आशीष चाहते हैं की १०वीं के छात्रों का मार्गदर्शन बेहतर तरीके से होना चाहिए ताकि उन्हें पता हो की उन्हें इंजीनियरिंग करनी है तो किस क्षेत्र में, उसके लिए विभिन्न प्रकार के वर्कशॉप्स और अपने यूट्यूब वीडियोज़ की मदद से वो अधिक से अधिक बच्चों तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं।

उनके वीडियोज़ में होममेड शूटिंग गन, स्पाइडर मैन वेब भी शामिल हैं।

आशीष उन लोगो में से हैं जो हिन्दुस्तान में बदलाव लेन की बात ही नहीं करते बल्कि उसे धरातल पर उतर सजीव बनाने का प्रयास भी करते हैं। इनके जज़्बे को हमारा सलाम और शुभकामनाएं।

 

 

 

 

 

 

 

 

Baasab Chandana
"The Kahaani Wala" Dwelling into real life emotions, one person to another, walking into different shoes all the time, it's sur-real!

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