Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Writing Contest Hindi Story रिक्तता

रिक्तता

 

“हे भगवान, एक तो लड़के की जगह लड़की पैदा कर दी, ऊपर से काली – कलूटी!  न जाने कैसे इसका ब्याह होगा । मेरी तो किस्मत ही खराब है,” सर पर हाथ रखते हुए दादी वही नीचे बैठ, मां के ऊपर गालियों की बौछार करने लगी।
दादी के इतना कहते ही मां की पीड़ा और बढ़ गई और अपने कमजोर और बेजान शरीर पर बल लगाते हुए उठकर मुझे देखने की कोशिश करने लगी लेकिन मेरी छवि उसे धुंधली सी दिखी तो उसने अपनी आंखों को हाथों से दो बार रगड़ते हुए मुझे देखने की कोशिश की लेकिन आंखों के सामने गहरा अंधेरा छा गया। वही गिरकर उसने अपने प्राण त्याग दिए।, ऐसा दादी ने मुझे बताया था।

काली नाम था मेरा, रंग के अनुरूप।

बचपन और जवानी लोगों के ताने, अपमानित होते हुए, हीन भावना से ग्रस्त और गालियां खाकर गुजरी। मेरे साथ कोई अच्छा पल, खुशी का पल गुजरा हो, ये तो याद ही नहीं। बापू  दारू पीकर पड़ा रहता। घर की सारी जिम्मेदारी मुझ पर और दादी पर थी। स्कूल का मुंह कभी देखा नहीं लेकिन जीवन के कड़वे अनुभवों ने जिंदगी से जंग लड़ने के काबिल बना दिया था। मैं और दादी दूसरे के खेतों में बुवाई और कटाई का काम करते थे। वहां से फुर्सत मिलती तो मैं मोहल्ले की औरतों के लिए सिलाई का काम करती थी। जिससे खाने – पीने को मिल जाता था। इतने लोगों के लिए कपड़े सिलती लेकिन कभी खुद के तन पर नया कपड़ा नसीब नहीं हुआ।
दो दिन से दादी मुझे लेकर बहुत चिंतित थी क्योंकि खेत में काम करते हुए मालिक का लड़का मुझे घूर रहा था। दादी ने मुझे सख्त हिदायत दी,” देख काली, घर से बाहर न निकलिहे, घर से बाहर निकलिहे तो टांग तोड़कर हाथ मा दई दिहे।” आज मुझे समझ आया कि काली और गोरे रंग से कुछ नहीं होता, लड़कों के लिए लड़की होना ही मायने रखता है।
दूसरे दिन घर में  रमिला बुआ आई और किसी लड़के के बारे में दादी को बताया। खाते – पीते घर का लड़का था दादी को बस इसी बात से मतलब था। लड़के का रंग मुझसे भी गहरा था इसलिए शादी तय होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। दादी ने मेरा ब्याह अशोक से कर दिया लेकिन ना जाने विदाई के समय बहुत ज्यादा रोई। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। जो मुझे दिन – रात कोसती रहती थी, आज वो मेरे लिए विलख – विलख कर रो रही थी।
ससुराल में सास-ससुर और ननद थे। अब सारा समय रसोई घर में ही गुजरता। अगर रात में कुछ समय बचता तो कुछ सिलाई कर देती। दो पैसे मिल जाते थे। ननद को भी सिलाई सिखा दिया। दो साल ऐसे ही गुजर गए लेकिन न जाने कौन सा रोग था कि मां बनने के सुख से वंचित रही। सास ने पहले झाड़ – फूक, साधु बाबा की चमत्कारी पुड़िया खिलाकर देख लिए लेकिन कुछ न हुआ फिर हारकर बेटे को शहर भेजकर मुझे डाॅक्टर से दिखलवाया। वहां पता चला मैं कभी मां नहीं बन सकती।
अब फिर मेरे पुराने दिन लौट आए, अब हर बात पर ताने और गालियां मिलने लगी और अब मेरा नाम रधिया से बांझ रख दिया गया। एक दिन परिवार के सभी लोग कमरा बंद करके न जाने क्या बतिया रहे थे। कमरे से सभी बाहर निकले और मेरी सास ने मुझे प्यार से बुलाया, “सुना हो दुल्हिन.. इहा आव”। लगा कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है मेरे साथ, फिर भी डरते हुए, उनके पास गई।
“का है अम्मा?”, धीरे से बोली।
“अरे.. इहां बइठ, तुझसे कुछ जुरूरी बात करेके है।”
बिना सवाल किए मैं, अम्मा के बगल में बैठ गई।
“देख काली, तू तो जानत हो कि बच्चन बिना बंश आगे नाही बढ़ सकत है। बंश बढ़ावे के खातिर बच्चा चाही। आ तोहर जिंदगी भी कैसे गुजरी। सच कहत है कि ना! बोल कछु गलत कहत हो तो”, अम्मा बोली।
“मैंने’ हां’ में सर हिलाया।” बात तो सौ आने सही कह रही थी अम्मा।
“सुन बिटिया,तू चाहत है कि इ कलंक लेके तू जीवन भर इ बोझ के तले जिए और लोग तुझे बांझ बुलाए। नाहीं ना? तो ऐही के खातिर अशोक का दूजा ब्याह करावे के पड़ी।”

“इ का कह रही हो अम्मा”, मैं चौंकते हुए बोली। अम्मा की बात सुनकर दिल में टीस उठ गई। ऐसा लगा जैसे दिल आग की ज्वाला धधक उठी।

“देख काली, हमका इ घर का कुलदीपक चाही, जौन हमका के दादी कहे। हर मां के मूल से जियादा सूद प्यारा होइहे। अपन पोता के गोद में खिला लियहे तो सरग मिल जहिऐ। बोल का गलत कहत है। सोच उ तोहे भी तो अम्मा कहिए, तोहरे भी कलेजा में ठंडक मिलिहे।  सोच काली तोहके आग देवे खातिर कोई त चाही ना त आत्मा तरपत रह जहिऐ। दुई दिन का समय ले अउर सोच के बतइहे,”अम्मा रोते हुए बोली।
अम्मा की बात सुनकर मैं बुत बन गई। अपने हाथों अपने पति को त्यागने का फैसला लेना, अपनी आत्महत्या करने से कम नहीं था। दो दिन बिलकुल खामोश रही, कभी ननद तो कभी ससुर आकर इस बाबत कुछ कह जाते लेकिन जब अशोक ने मुझे समझाते हुए कहा तो समझ गई कि अशोक भी यही चाहते हैं।
दूसरे दिन मैंने अम्मा को अपना फैसला सुना दिया। सभी घर में खुश हो गए, अकेली मैं ही बिछोह की ज्वाला में धधक रही थी। कुछ दिन बाद अशोक का ब्याह मालती संग हो गया। अशोक, नई बहूरिया के साथ नये जीवन का आरंभ कर रहे थे इधर मैं अधूरेपन की आग में रात भर जली। धीरे-धीरे मेरे सारे अधिकार मालती को सौंप दिए गए। मैं बस रसोई के काम और सिलाई करने तक ही सीमित रह गई। कुछ दिन बाद मालती पेट से हो गई। अम्मा तो खुशी के मारे पागल हो गई। सारे गांव में मिठाई बंटवाई।

नौ महीने मैंने मालती का पूरा ध्यान रखा शायद उसके सगे भी इतना ध्यान न रखते। ऐसा लगा कि मेरा ही अंश उसके पेट में पल रहा था।  नौ महीने बाद घर में बच्चे की किलकारी गूंज उठी।

आज लगा कि मेरे जीवन की रिक्तता भर गई। मनु के खाने – पीने से लेकर सोने तक मैं ही उसके साथ मां बनकर रहती। अम्मा और बापू पोते का सुख लेकर स्वर्ग सिधार गए। बचे मैं, अशोक और मालती। अशोक का मन कामकाज में कम और मालती में ज्यादा रहता, रूपवान जो थी।
अब जैसे – तैसे गुजारा हो रहा था। अब घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर थी। सिलाई से घर नहीं चल पा रहा था। मनुआ के, पांच साल का होते ही मालती ने अपने और पराये का फर्क सिखला दिया। कुछ दिन बाद मालती के भाई ने अशोक को शहर बुला लिया और उसे अपने किराने के दुकान पर काम के लिए रख दिया। अब मैं, मालती और मनु बच गए।
मनुआ अब मेरे पास नहीं आता, फिर भी उसे आस – पास देखकर संतोष मिल जाता था लेकिन शायद मेरी खुशी भगवान से भी नहीं देखी गई। अशोक,  मालती और मनु को लेकर शहर चले गए। अब मैं अकेली रह गई,  जिस रिक्तता को भरने के लिए मैंने इतना बड़ा त्याग किया वो रिक्तता आजीवन बनी रही और मेरे साथ ही गई……………।

 

 

To Read More from the Author

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियोंऔरकविताओंकोएकखूबसूरतमंचदेताहैं।लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

How to Teach Writing Skill to Toddlers?

Being into Early childhood education and parenting, I was always asked varied questions by young, anxious mothers. Apart from the initial hiccups of toilet training...

अंतर्द्वन्द

आज 'निशा 'का दिल जोर जोर से धड़क रहा था। न जाने कितना अंतर्द्वन्द मन में था ।"क्या मैं ग़लत तो नहीं कर रही ।"...

विश्व हृदय दिवस पर..❤️

"पिछले दिनों घर में पुताई के बाद परदे लगे तो एक खिड़की के परदे बहस का मुद्दा बन गए . हुआ ये कि उस...

Torchbearer

I could hear my phone ringing in the bedroom. I rushed to pick it up. It was Radha. Congratulations! You've been selected in UPSC! I was...

Recent Comments