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लॉक डाउन और अध्यापक

अध्यापक ऐसा जीव है जिसे कभी मैनेजमेंट कसौटी पर पकाती है,कभी प्रिंसिपल ढोकता पीटता है और आजकल तो शैक्षिक प्रभारी,सलाहकार जिसका बस चलता है सब दो- दो हाथ कर ही लेते हैं ।

उस पर विद्यार्थी कहता है,”यार! वह फलां अध्यापक पकाता बहुत है।”

खैर, विद्वान कह गए हैं “सहज पके सो मीठा होय” सो हम भी सहज पकने से इनकार नहीं करते पर मियां ! सरकार ने तो हद ही कर रखी है , राशन बंटवाना है तो अध्यापक को बुलाओ,घुसपैठियों की गिनती करवानी है तो अध्यापक !

और इस पर भी मन नहीं भरा तो घर बैठे वीडियो,अभ्यास पत्र बनाओ!

ज़ूम या गूगल क्लास रूम से बच्चों को पढ़ाओ, काम मेल करो|

अटेंडेंस लगाओ वार्ना अपनी CL कटवाओ…!!

जो बच्चे क्लास में नहीं दिखते उन्हें फोन कर के समझाओ …उनका काम whatsapp या mail करवाओ|

उसकी जाँच कर टिप्पणी दो ,सुधार करवाओ …तुम देश के कर्णधार हो भावी नागरिकों की ज़िम्मेदारी तुम्हारे ही कंधों पर तो है !

एक हाथ में झाड़ू ,एक में करछी,एक में लैपटॉप,एक में पुस्तक इस दैवीय मुद्रा में मजाल है कोरोना तुम्हें छू भी जाये !

और हाँ, बच्चों के माता- पिता और बच्चों पर कोरोना का बहुत स्ट्रेस है ,उनका स्ट्रेस और मत बढ़ाओ |

उन्हें मुस्कुरा कर समझाओ “यह वक्त भी बीत जाएगा।” तुम्हीं तो आखिर”अंधेरे में रोशनी की किरण हो” …तुमसे पढ़कर विद्यार्थी जब डॉक्टर या पुलिस विभाग में सरकार के ऊँचे ओहदों पर जाता है तो तुम ही सीना चौड़ा कर कहते हो , “देखो! यह वही है जिसे मैंने पकाया ..नहीं पढ़ाया था।”

ये हास्य में लिपटी अध्यापकों की व्यथा आप बीती भले न हो किन्तु सभी अध्यापकों को समर्पित ज़रूर है।

 

 

 

 

 

Image Credit Boredteachers.com

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं।लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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