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चौकीदारी

वो एक ट्रंक लिए ट्रेन की निचली बर्थ पर बैठा अकेले ही मुस्कुरा रहा है।
कल सुबह पहुँचने पर क्या क्या करना है, किस किस से मिलना हैं सब प्लानिंग दिमाग में कर लेना चाहता है।
जाहिद चाचा भी पिछली बार मिल नहीं पाए थे,बुआ जी बड़ी नाराज़ है,छोटी बहन का ससुराल भी पास ही है…
इस बार बड़े लम्बे समय बाद 15 दिन की छुट्टियां मिली है, इन 15 दिनों में 15 महीने की जिंदगी जीना चाहता है वो..
माँ के हाथों से मालिश करवानी है रात को उनके पैर दबा कर सोना है।
हम्म।। थोड़ा रूटीन बिगड़ जाएगा..इतने टाइम तक आर्मी में रहने का यही नुकसान है, थोड़ा सी दिनचर्या गड़बड़ हो जाए तो तनाव हो जाता है।
पर गड़बड़ तो होगी ही आखिर अपनी नई नवेली से इतने समय बाद मिलूंगा तो राते घड़ी देखकर थोड़े ना बीतेंगी..
लगता है अभी सही से देख भी ना पाया हूं उसे।
सब कहते है सत्ते की घरवाली बड़ी सुंदर है, मैंने तो बस हाथ देखे है अच्छे से मानो मैदा को गूँथकर हाथों का आकार दे दिया हो।
सुनील कहता है तेरी फ़ौज की नौकरी ने दिलवा दी इतनी सुंदर बहू तुझे..
वो तो साला मुझसे शुरू से ही जलता था,जब फ़ौज में सिलेक्शन हुआ तब भी हफ़्तों मुँह लटका रहा उसका..
खेतो का भी जाने क्या हाल हो,रघुवर सही से देखभाल करता भी होगा कि नहीं।
कहता था अफसर साहब आपके खेतो को अपने खेतों की तरह जोतुंगा,पागल आदमी अफसर समझता है मुझे..
वो ही क्या गांव में फ़ौज की नोकरी मतलब अफसर !
वो क्या जाने वहाँ पानी के लिए भी साथ के साथ बर्फ पिघला कर काम चलाना पड़ता है।
पैर की उंगलियां गलने को तैयार रहती है,सांस के लिए भी प्रकृति से भीख सी मांगनी पड़ती है।
सांस का ध्यान आते ही फिर ध्यान नई नवेली पर चला गया,उसके सांसों की महक हफ़्तों दिल दिमाग से
नहीं निकली थी।
जाने कैसी होगी अब,खूब साज श्रृंगार किये होगी मेरे पहुँचने से पहले..
धत्त!! लाल चूड़ियां भी लेना भूल गया, अगले स्टेशन पर देखता हूं शायद मिल जाए..
बड़े सुंदर लगते है उसके हाथ लाल रंग की चूड़ियों में..हाथों से याद आया माँ के एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया था।
डॉक्टर बोले कोई नस की दिक्कत है..फिजियोथेरेपी करवाओ..वहाँ गांव में कहाँ ढूंढता फिजियोथेरपी..
चिट्ठी में बताया कोई हड्डियों का पहलवान है,मालिश से ठीक कर देता है हड्डी और नसों के बड़े बड़े रोग।
ठीक हो गई होगी माँ अब तक..काफी दिन हो गए।
बार बार घड़ी देखता है जबकि जानता है कि मुलाकात कल ही हो पाएगी..
थोड़ा सचेत हुआ तो देखा सामने वाले बर्थ पर कुछ हलचल है।
कोई लड़की शायद अकेली निकली है..3-4 शोहदे घेर कर बैठे है उसे।
पर वहाँ पर तो और भी सवारियां थी..शायद झंझट में ना पड़े इसलिए निकल गई होंगी..
उनमे से एक ने पानी की बोतल खोल अपने ही सर पर डाल ली।
वो बैचैन हो गया..वहाँ एक एक बूंद को तरसते है हम और ये देखो..अगस्त के मौसम में इतनी भी गर्मी नही है।
तभी दूसरे ने मुँह के तम्बाकू से ट्रेन के फर्श पर चित्रकारी कर दी।
उफ्फ ये लोग कोई जिम्मेदारी ही नहीं ..देश को साफ सुंदर रखने में दिक्कत क्या है इनको?
तभी एक ने लड़की की जांघ पर हाथ रख अश्लील अट्टहास के साथ कहा “कहो तो ज़रा ,मजा आया?”
लडक़ी की आँख में आंसू छलछला आए,अजीब सा भय दिखा उसकी आँखों में।
ये तो हद से बाहर की बात है अब,वो अपनी सीट से उठा और ठीक उनके सामने तन कर खड़ा था।
मानो दुश्मन की ललकार के सामने सीना ताने बॉर्डर पर खड़ा हो।
“क्यू भाईलोगों , क्या दिक्कत है तुम्हारी?”
“हमे तो कोई दिक्कत ना है पर तू बीच में बोला तो तुझे जरूर हो जाएगी”
“अच्छा, फौजी हूं मैं फौजी..क्यों परेशान कर रहे हो लड़की को”
“परेशान?? हम तो मनोरंजन कर रहे है इनका”
“तो ये मनोरंजन अपने घर की बहन बेटियों का भी करते हो या सिर्फ समाज सेवा ही करते हो??”
“ऐ फौजी जबान सम्भाल अपनी..”
“और तुम अपने हाथ पैर सम्भालो,वरना किसी दिन बिना हाथ पैरों के घर जाओगे”
“बहुत बोल रहा है साले..तेरा काम बॉर्डर की चौकीदारी करना है वही कर..नेतागिरी मत दिखा”
“मेरा काम देश की चौकीदारी है और तुम्हारा काम देश की बहू बेटियों को डर के साए में रखना?”
“……”
“अरे हम वहां अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं..बॉर्डर पर सुरक्षित माहौल देते है..तुम देश की बेटियों को तो सुरक्षित माहौल दो कम से कम..देश अपनी आजादी की वर्षगांठ मनाने जा रहा है और तुम..ये मायने है तुम्हारे लिए आजादी के?
उनमे से एक बोला “अबे यार इसका लेक्चर बन्द करो..मूड़ खराब कर दिया”
दूसरे ने उठ कर उसकी छाती पर हाथ रख पीछे धक्का दिया..
उसे लगा मानो सरहद पर उसकी जमीन से उसे धकेला जा रहा हो..
नहीं .. नहीं .ये मेरे देश की धरती है किसी और को माँ की छाती पर कदम कैसे रखने दू।
जाने क्या सोच एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस धक्का देने वाले के गाल पर मार दिया..
कुछ सेकण्ड्स में खून का फव्वारा छूट गया,लड़की चीख कर बेहोश हो गई थी..
ट्रैन के उस कोच में शोर शराबा मच गया..भीड़ को देख लड़के वहाँ से भाग निकले..
वो घर पहुँचा, बड़ा शांत है सब कुछ..सब लोग कहाँ है घर के?
तभी पहले माँ दिखी..उसे कुछ देर हैरानी से देखती रही फिर अचानक गश खाकर गिर पड़ी।
ये माँ भी ना,दुख हो या खुशी इससे बर्दाश्त ही नहीं होती..बात बात पे बेहोश हो जाती है..
उसे हँसी आई,पर वो हँसा नही..ये नई नवेली कहाँ पर है?
नई नवेली उम्मीद के मुताबिक ऊपर से नीचे तक लाल रंग में ढकी थी|
वाह ! गजब की सुंदरता,काश अभी सबके सामने गले से लगा पाता |
अरे ये दहाड़े मार चूड़ियां क्यों तोड़ रही है? ओहहो! लाल चूड़ियां ! उस पंगे के चक्कर मे फिर भूल गया |
कमाल है आज तो साला ये जलकुकडु सुनील भी सैल्यूट कर रहा है!
पर हुआ क्या है? कुछ ध्यान नही…बस उस लड़के को थप्पड़ मारा तब कुछ निकाला था उसने अपनी शर्ट से..
हाँ..याद आया फिर कुछ सेकण्ड में लगा कुछ गर्म सा जैसे छाती में घोप दिया हो..
माँ ,नई नवेली,मेरे खेत,बुआ जी,जाहिद चाचा सब वहीं दिख गए थे कोच में उसी एक पल में..
आज पूरा गाँव इक्कठा है..मेरी तारीफों के पुल बंध रहे है..मैंने बटालियन में अपने दोस्त रवि से डांस सीखा था..ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानो का..
बहुत बढ़िया डांस आता है मुझे इस गाने पर..सोचा था गांव के स्कूल में जब झंडा फहराया जाएगा उसके बाद सबको चौका दूंगा डांस दिखाकर..
नई नवेली तो दाँतो तले उंगली दबा लेती.. कहती थी “शादी में एको ठुमका भी ना लगा सके।”
पर अब जो गाना चल रहा है ना उसके आगे तो सब फेल है!
कहते है सावधान मुद्रा में रहना चाहिए इस समय..
मैं सावधान की मुद्रा में तो हूं पर खड़ा नही हो सकता.. लेटा हुआ हूं |
आप तो खड़े हो सकते है..तो हो जाइए और गाइए..
जन..गन..मन..अधिनायक जय हे..भारत भाग्य विधाता…
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