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पहली मुलाक़ात

 

दरवाज़ा खुलते ही सूरज की किरणे उसके चेहरे पर पड़ी।सुनहरी किरणे और सुनहरा रूप।
रुम नंबर 244 की पेशंट-राधिका
“मैं तुम्हारा ही इंतेज़ार कर रही थी”,वो बोली
,”दरवाज़ा खुलने से पहले ही, कैसे पता चला की मैं हूँ”?, गहरी भारी प्यार दुलार में छनकती आवाज़,जिसे सुन कर उसका चेहर सूरज की किरणों से भी ज्यादा चमक उठा।
“बस पता चल गया”, राधिका ने मुस्कराते हुए कहा। बहुत कुछ कहने की चाहत बस इतने में सिमट गई।
“हम्म” ये थे डॉक्टर पार्थ मित्रा
“मैं अपने पेशंट के साथ लंच डेट नहीं कर सकता। तो तुम्हारे साथ लंच करने के लिए,सारे काम निबटाये है एंड नाउ आईएम रिपोर्टिंग यू।” आवाज़ में एक शरारत थी।
दोनों ही खिलखिला कर हंस पड़े।
मोहब्बत छोड़ो,हॉस्पिटल में तो दोस्ती भी बमुश्किल होती है,पर चमत्कार हर जगह होते है,या यूँ कहें की क्यूपिड कैन स्ट्राइक एनीवेयर!
डॉक्टर पार्थ अगर डॉक्टर न होते तो फेमस मॉडल ज़रूर होते। 5 फ़ीट 10 इंच का लम्बा,एथेलीट जैसी गठन उन्हें भीड़ में अलग खड़ा करती थी।एक अलग ही आकर्षण,आत्मविश्वास और हर एक के प्रति उनका सम्मान उन्हें एक चुम्बकीय व्यक्तित्व बनाता था। चश्मे के पीछे से भी गहरी भूरी आंखें, दिल को भेद जाने का माद्दा रखती थीं।
लोगो की मदद करने का जज़्बा उन्हें मेडिकल के क्षेत्र में ले आया और यही जुनून इतने कम वक़्त में इतने सफल सर्जन होने का राज़ था। अपना वलिनीक और शहर के बड़े बड़े हॉस्पिटल में कन्सल्टनट होने की वजह से ज़िन्दगी इतनी मसरूफ़ थी की किसी खास की जगह ही नहीं थी ।
और रूम नम्बर 244 की पेशंट राधिका…
एक उभरती हुई इन्तरिप्रेनेउर, जो कला और कलाकारों को दुनिया के सामने लाने का जुनून रखती थी।
मिस राधिका शर्मा,आकर्षक व्यतित्व, गेहुंआ रंग और हर समय कुछ बिखरे से बाल। हरे झील सी उसकी आंखों में लोग अक्सर शांत समंदर देखते लेकिन राधिका,की सोच और ज़हन तूफान से लबरेज़ था। समाज के हर गलत रवैये पर खुल कर बात कहना उसके व्यक्तित्व का हिस्सा था। वो खूबसूरत से ज़्यादा निडर और बहादुर कहलाना पसन्द करती थी।
“तो आज हम क्या खाने वाले हैं”? राधिका ने पूछा
“जो तुम कहो। मैन ड्राइवर से कहा है जो कहोगी वो ले आएगा”।प्राइवेट रूम में रखे सोफे पर बैठते हुए पार्थ ने जवाब दिया।
“क्या बात है डॉक मुझे तो लगा हॉस्पिटल का बोरिंग खाना ही खिलाओगे। नॉट बैड।” ये कहते हुए राधिका शरारत से मुस्करा दी।
“मिस राधिका, इतने दिनों में तुम इतना तो जान गयी हो की मेरी चोइस अच्छी है।”, ये कहते हुए पार्थ ने राधिका की ओर हाथ बढाया जो हॉस्पिटल के बेड से उतरने की कोशिश में थी।
पार्थ आज के इस लंच को राधिका के लिए यादगार बनाना चाहता था। उसका हाथ थाम कर खिड़की के पास रखे सोफे पर आराम से बिठा दिया। पीठ टिकाने को कुछ और कुशन रखते हुए उसका बड़े ध्यान से राधिका के कंधो को छू कर आगे करना,राधिका के लिए जैसे ठंडे पानी की फुहार से था।
उसे आराम से बिठाते हुए, पार्थ ने उसके सामने फूलों का एक गुच्छा पेश किया जिसे महसूस करते ही राधिका के चेहरे पर ढेरों रंगों की छटा समेटे मुस्कान खेल गयी।
तकरीबन एक साल पहले राधिका और डॉक्टर पार्थ एक दूसरे के सम्पर्क में आये। हमउम्र होने के नाते, इलाज के दौरान दोस्ती होने लगी।पहले पहल इस दोस्ती को राधिका ने काम और इलाज का हिस्सा समझ,सहानुभूति का जामा पहनाया लेकिन कहते हैं न इश्क़ और मुश्क छुपाये नही छुपते।
हॉस्पिटल में इलाज के दौरान कई दिनों तक रहना और वहां अक्सर आने जाने से मुलाक़ात बढ़ती गयी। धीरे धीरे पार्थ के निश्छल स्वभाव और एक अच्छे दोस्त की सारी खूबियों से राधिका वाकिफ हो गयी।उसने पार्थ की दोस्ती कुबूल की थी,जो की अब दोस्ती से मुड कर एक अलग सफर पर चलने लगी थी। इस मोड़ और नए सफर का एहसास राधिका और पार्थ दोनों को था किन्तु जाने क्या था जो दोनों को रोके हुए था।
फूलों की मीठी सी खुशबू को महसूस करते हुए राधिका ने कहा” थैंक यू डॉक लेकिन इसकी ज़रूरत नही थी। आपने मेरे ज़िन्दगी के बड़े दिन से पहले मेरे लिए वक़्त निकाला,वही बहुत है।”
“मुझे रंग पसन्द हैं राधिका। इसीलिए लाया तुम्हारे लिए।”पार्थ के इस जवाब से राधिका के भीतर कुछ नम हो गया।
फोन पर राधिका के पसन्द के खाने का ऑर्डर दे कर पार्थ राधिका के सामने बैठ गया।
“तो मिस राधिका, शुरू करे वो डिस्कशन जो हमने उस दिन अधूरा छोडा।”
“आप रहने दें डॉक्टर पार्थ डिस्कशन नहीं होता वो। मैं बोलती हूँ और आप हम्म करते है”। हंसते हुए शिकायती लहज़े मे राधिका ने कहा।
पार्थ ज़ोर से हंसा और हंसते हुए बोला” ऐसी बात है? चलो आज में सब कह दूंगा।”
राधिका भी हंसी में शामिल हो गयी और हंसते हुए सवाल-किया “बताइये आपका पसन्दीदा रंग कौन सा है?”
“सफेद”, ये कहते हुए पार्थ के चेहरे पर हंसी थी,जैसे वो जानते हो की राधिका का पसन्दीदा रंग भी वही है।
“सच! मेरा भी।”
“और पसन्दीदा खाना?”
“कुछ भी, मां के हाथ का।मुझे दूध की मिठाईयां बहोत पसन्द है।” पार्थ की नज़र राधिका के चेहरे पर टिकी थी। खिड़की से छनती धूप और बालों में हवा की अठखेली।पार्थ चाह कर भी राधिका से नज़र नहीं हटा पा रहा था।
“मां के हाथ का! सो क्यूट।लेकिन…। इससे पहले राधिका कुछ कहती पार्थ ने उसकी बात काट दी
“लेकिन तुम्हे दूध नहीं पसन्द ,है न?”
कमरे में फिर एक बार दोनों की हंसी की खिखिलाहट थी।
आज की दोपहर किसी खुशनुमा शाम सी थी।हंसते हुए पार्थ ने राधिका को देखा और कहा की “अब मेरी बारी।तुम मुझे अपनी हॉबीज़ बताओ”।
“मेरी?? ह्म्म्म मुझे पेंटिंग,पसन्द है। लिखना पसन्द है, घूमना,मूवी देखना,दोस्तों से ढेरों बातें करना और हर वो चीज़ जो अच्छी और खुशनुमा है। एंड आई एम मिसिंग ऑल दिस…”,ये कहते हुए राधिका कहीं और खो गयी।
कमरे में खामोशी थी। एक भारी सी खामोशी।
“राधिका, मैं तुमसे सिर्फ़ ये कहना चाहता हूँ की कल से कुछ भी नहीं बदलेगा ।मैं तुम्हारे साथ हूँ और आगे भी रहूँगा।”ये कहते हुए पार्थ ने कमरे की खामोशी तोड़ी।
“ह्म्म्म”
“राधिका इस तरह के हालात के साथ लड़ने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए,जो तुमने दिखाई। ईश्वर ने भी तुम्हारी हिम्मत को सलाम किया ,और तुम्हारे आंखों के लिए डोनर भी मिल गया।”
“………..”
“तुम बहादुर हो राधिका। बहुत स्ट्रांग,लाइक अ रॉक”।
“………………………..”
“एंड आई फेल इन लव विद योर स्ट्रेंथ।तुम्हारी हिम्मत,तुम्हारी ज़िन्दगी जीने के जज़्बे और ज़िन्दगी की मोहब्बत से,मुझे भी तुमसे मोहब्बत हो गयी।”
कमरे में अजब सी खामोशी थी। जैसे किसी शोर ओ गुल के दौरान किसी ने सुकून के दो पल चुरा लिए हो। राधिका के चेहरे पर ढेरों भाव थे।
“…………………………”
“कल जब तुम्हारी आंखे खुलेंगी तब तुम सबसे पहले किसे देखना चाहोगी ?” पार्थ ने पूछा
“……………………….”
“राधिका, कुछ पूछा मैने”।
“………………..”
“मुझे आईना देखना है पार्थ। खुद को देखना है। कल एसिड अटैक के बाद मेरी खुद से पहली मुलाक़ात होगी”।
एक बार फिर कमरे में खामोशी थी। दो दिलों की धड़कने एक ही गति से चल रही थीं।एक रिश्ते के डोर में बंधे दो दिल, रिश्ता दर्द का,उम्मीद का और प्यार का।
राधिका ने अपने हाथों में एक और हाथ महसूस किया,और दो हाथो की उंगलियों ने एक दूसरे में उलझ कर हर उलझन को सुलझा दिया।
खुद से पहली मुलाक़ात को तैयार राधिका कुछ और मज़बूत हो गयी।

 

 

 

 

 

 

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Sarita Nirjhra
A sapiosexual, who loves to dwell deep into human emotions! A writer and poet by passion and an entrepreneur by choice!

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