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शर्म आई

उफ्फ ! कितनी ठंड है..अभी नहा कर निकली हूँ…दो दो मोज़े पहने है।
ये कामवाली भी पता नहीं कब आएगी? कल भी छुट्टी पर थी।।सारे कपड़े पड़े है धुलने को ..मेरे बाक़ी मोज़े भी,और लाने पड़ेंगे कामवाली के भरोसे तो नंगे पैर रहना पड़ेगा।
स्वेटर भी लाने है दो मैचिंग कुर्तियों के साथ..पर इतनी ठंड में बाजार कौन जाए और ऑनलाइन मुझे भरोसा नहीं।
ये सोंचते हुए चाय लेकर बालकनी में आई ।नीचे देखा एक औरत 5 साल के बच्चे के साथ कहीं जा रही है।।वच्चे ने बहुत बड़े साइज की चप्पल पहनी है..शायद माँ ने अपनी चप्पल दे दी है क्योंकि वो इस सर्दी में भी नंगे पैर है।एक गर्म ब्लाउज,साप्ताहिक बाजार वाला सस्ता शॉल,बच्चा पूरा पैक है कपडो से,शायद पैसे ही उतने होंगे।
ये देखकर शर्म आयी अपनी सोच पर।
चाय का पहला घूंट लेते ही मूड खराब,अरे यार ! बिना अदरक की चाय..सत्यानाश।।लग रहा है बस मीठा दूध पी रही हूँ।
सामने मकान बनने का काम चल रहा है।।ठेकेदार ने मजदूरों के लिए चाय बनवाई है।।इतने छोटे कप की दो घूंट में में खत्म ही जाए..शक्ल से ही लग रहा है कि चाय कैसी बनी है।।ये क्या? एक चाय कम पड़ गयी शायद..दो मजदूरों ने एक कप से एक एक घूंट पी ली है।ये तो मुहँ में ही रह गयी होगी।।
ये देख शर्म आयी अपनी सोच पर।
पति ऑफिस और दोनों बच्चे स्कूल,कल से खैर विंटर वेकेशन है..थोड़ा आराम हो जाएगा सुबह की ठंड से।
कमरे में जाकर रजाई ली और बिस्तर में घुस गई..हीटर चलाया,स्पार्क हुआ..हीटर बन्द।।बेड़ा गर्क..दिन कैसे कटेगा कम्पनी वालो को जी भर कोसा.. कवर में हीटर रखा नीचे आयी।
मोहल्ले के किनारे पर एक प्रेस वाले की दुकान पर एक 16 साल का लड़का बैठता है..पूरे मोहल्ले के पास प्रेस वाले का फोन नम्बर है।किसी को कुछ मंगवाना हो,कही भिजवाना हो,फोन करने से वह उस लड़के को भेज देता है।।
फोन किये आधा घण्टा हो गया..अभी तक वो लड़का नहीं आया..अब दिखाई दिया साईकल पर..देखते ही भड़क गई मैं।
“कहाँ था अब तक ठंड से जान निकल रही है,जा ये हीटर रिपेयर करवा ला।।एक घन्टे भी रुकना पड़े तो रुक जाना पर  हीटर लेकर आना.चाहे तो तू पैसे ज्यादा ले लेना..वरना रात जहन्नम हो जाएगी”।
“जी दीदी,ले आऊंगा..असल मे बड़े पार्क से लकड़ियां चुग कर लाया हूं।। इसलिए देर हो गयी..रात को तसले में जलाकर रखेगे तब थोड़ा आँख लग पाएगी..वरना एक कम्बल में 2 लोगों का सोना बड़ा मुश्किल हो जाता है।”
ये सुन कर शर्म आयी अपनी सोच पर।
वापस कमरे में आई रजाई ली, एक कम्बल डाला उसके ऊपर..रजाई गर्म ही हुई थी कि बेल बजी..इतना गुस्सा आया कि पूछिये मत।
दरवाजा खोला..कामवाली सपना।
“अब आयी है तू,जल्दी आकर काम निपटा लेती तो एक नींद ले लेती अब तक मैं,”देख आज आँगन भी धो देना नीचे का ठीक है।”
“जी दीदी.. सुबह बहुत ठंड थी,कोहरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।ऊपर से जूते रात बाहर रह गए..ओस में भीग गए सुबह अंगीठी से सुखा कर पहने है इसलिए देर हो गयी।
ये सुन शर्म आयी अपनी सोच पर..मैं बोली
“सुन,आँगन रहने दे धोने को जब धूप हो तब धोना..पहले एक कप चाय बना कर पी ले..थोड़ी ज्यादा बनाना..वो प्रेस वाला लड़का भी आता होगा।
“अब  मुझे भी ठंड कम लग रही है ..फिर मैं सर्दी को एक तरफ कर आज आलमारी और बक्से खोलूँगी ओर निकालूंगी कुछ कपड़े,जूते और मोज़े.. और निकलूंगी इस ठंड में बाहर कुछ लोगो को सर्दी से थोड़ी राहत देने।
अब …शर्म नहीं आई अपनी सोच पर।

 

 

 

 

 

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