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शिकायत

अब तो साँसे भी मेरी मुझसे , शिकायत कर चली है ,
लगता हैं अब वो भी मुझसे , किनारा कर चली है ;
हिदायत क्या दूँ अब किसी और को मैं
के जिस्म मेरा ज़िंदा रह कर , मेरी रूह मर चली है।
जिस दौर से गुजरी थी कभी एक दफा,
वापस उस दौर में आ कर ठहर गयी हूँ मैं ;
जहाँ से समेट कर लाई थी खुद को बाहर,
वापस वही आ कर तिल तिल बिखर गयी हूँ मैं;
शिकवा उससे क्या करूँ जिसे खुदा का दर्जा मैंने ही दिया
लगता है शायद सजदों में कमी मेरे ही हो चली है ;
अब तो साँसे भी मेरी मुझसे शिकायत कर चली है।
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Aashika Shresth
" Mere alfaz kuchh, mujh jaise hi adhure hai, Kabhi fursat se padhna, hote tumse hi pure hai" ❤

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