Phone No.: +917905624735,+919794717099

Email: support@kalamanthan.in

घूंघट

 

माँ..अब और सहन नहीं होता,आप लोग कुछ करते क्यों नहीं”,
मीनाक्षी ने सुबकते हुए अपनी माँ से फोन पर कहा. “चुप हो जा बिटिया… देख ये तेरे और तेरे पति की बीच की बात है,हम कैसे बीच में बोल सकते हैं”,माँ ने समझाते हुए कहा
“लेकिन माँ …आप नहीं तो फिर कौन करेगा…बेटी हूँ मैंं आपकी…रोज मारते हैं मुझे बिना ग़लती के..रात को तो जैसे कोई हैवान हो जाते है…माँ ऐसे में तो मैं मर जाऊंगी” मीनाक्षी किसी निरीह बकरी की तरह अपनी ही माँ से दया की भीख माँग रही थी “देख मीनू अभी तीन महीने ही तो हुए हैं,तेरे ब्याह को,थोड़ा वक्त तो दे अपने रिश्ते को,बन सवर के रहा कर,थोड़ा प्यार से बात कर,और खबरदार जो उल्टा सीधा करनें की सोची भी ,तेरे पीछे तेरी दो बहनें और है ,जरा उनके बारे में भी सोच।अच्छा ये बता तेरी सास को पता है ये सब”,मीनाक्षी की माँ ने पूछा
“नहीं माँ,ये धमकाते हैं,कहते हैं खबरदार जो आवाज़ कमरे से बाहर गई तो,और वैसे भी,माँजी नें तो जैसे दुनिया से सन्यास ले लिया है ,बस वो और उनके कान्हा जी , दिन रात उन्हीं की सेवा में लगी रहती हैं,ज्यादा किसी से बोलती नहीं “मीनाक्षी नें रुआँसे स्वर में कहा
“चल अच्छा है,सास का कोई झमेला नहीं.. देख तू थोड़ा संयम से काम ले और दामाद जी को प्यार से अपने वश में करने की कोशिश कर,देख बिटिया थोड़ा बहुत तो सभी पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं,और तू तो अपनें पापा को जानती है,उनके लिए उनकी इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं।अभी मैं रखती हूँ “।कहते हुए मीनाक्षी की माँ नें फोन रख दिया।
मीनाक्षी काफी देर तक रोती रही,पति का व्यवहार उसकी समझ के परे था,अगर कोई भी काम उनकी मर्जी के विरुद्ध हुआ तो वो मीनाक्षी को बुरी तरह पीटते थे,आज भी उनकी पसंदीदा कमीज मे लगा दाग धोने के बाद भी नहीं छूटा,तो मीनाक्षी को इतनी जोर से मारा कि गाल पर उंगलियों के निशान रह गए।कुछ देर बाद खुद को संयत कर चेहरे पर घूंघट ड़ाला ताकि चेहरे के निशान कोई देख न पाए।सासूमांं की चाय का वक्त हो चला था,और पति के घर आनें का भी।पति के बारे में सोचकर एक बार फिर उसकी रुह काँप गई।
चाय का कप लेकर सासूमां के कमरे में गई,वे तुलसी माला लिए कृष्ण जाप में लीन थी,मीनाक्षी चाय का कप रख कर पलट ही रही थी ,कि पलंग में फंसकर पल्लू सर से खिसक गया।उसनें झट से पलटकर फंसा हुला पल्लू पलंग से निकाला ,तबतक सासूमां की नज़र उसके चेहरे पर पड़़ गई थी।मीनाक्षी पल्लू ठीक कर जाने को मुुडी हि थी कि ,सासूमां ने उसका हाथ पकड़ लिया।तुलसी माला को आँँखो से लगाकर बाजू में रखा,और पूछा”क्या हुआ चेहरे में”
“कुछ नहीं माँजी ..वो अलमारी का पल्ला लग गया था”मीनाक्षी नें लड़खड़ाती हुई आवाज़ मे उत्तर दिया
“चोट और मार के निशान में अंतर मैं खूब समझती हूँ मैं,कब से चल रहा है ये सब”अम्मा नें कड़कती हुई आवाज़ में पूछा तभी उनके बेटे और मीनाक्षी के पति आकाश के आने की आहट हुई “आकाश..आकाश”आशा जी नें कड़क स्वर में अपनें बेटे को आवाज़ लगाई कि एक पल को आकाश भी ठिठक गया बरसों बाद उसनें अपनी माँ की कड़कती आवाज़ सुनी थी।
“नहींं माँँजी इनसे कुछ ना कहिए..वरना ये मुझे…”मीनाक्षी नेंं लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा तबतक आकाश भी आशा जी के कमरे में आ गया था, आशा जी ने मीनाक्षी का चेहरा आकाश की ओर करते हुए गुस्से से पूछा”क्या है ये सब” आकाश एक पल को घबरा गया फिर गुस्से से मीनाक्षी की ओर देखते हुए कहा”माँ इससे एक काम ठीक से नहीं होता,एक बार बतानें पर कुछ समझती ही नहीं है,इसे ठीक करनें का बस यही एक तरीका है”
चटाक जक जोरदार थप्पड़ आकाश के गालों पर पड़ता है..एक पल को मीनाक्षी भी सिहर जाती है”वाह बेटा यही संस्कार दिए हैं मैंने तुझे” आकाश को मीनाक्षी के सामने हुई बेइज्जती बर्दाश्त नहीं होती, गुस्से से अपना गाल सहलाते हुए कहता है”माँ…आप..इसके लिऐ मुझे…और इसमें ग़लत क्या है..बाबा भी तो आप पर…”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया,आशा जी वहीं पलंग पर धम्म से बैठ गईंं,फिर कुछ देर बाद अपना गला साफ करते हुए कहा है “तू जब बारह साल का था जब तेरे बाबा गुजर गए..तेरे बाबा तुझे कंधो पर बिठाकर घुमाते थे,तेरी हर फरमाइश पूरी करते थे,मेरे लिए बाजार से कभी चूड़ी तो कभी गजरा लाते थे..तुझे उनकी इतनी सारी अच्छी यादोंं को छोडकर बस उनका मुझपर हाँथ उठाना याद रहा..क्यो?”
“क्योकि अच्छी बाते सब भूल जाते हैं..याद रहती है बुरी बातें..तो तू भी यही चहता है कि तेरे बच्चे भी तुझे तेरे इस रूप के लिए याद रखे।अरे तेरे बाबा तो अनपढ़ थे,और तुझे मैनें इसलिए पढ़ाया लिखाया कि तू सही गलत को समझे,और तू ये कर रहा है..पगले औरत केवल प्यार और सम्मान चाहती है,और बदले मेंं वो अपना तन मन धन सबकुछ न्योछावर कर देती है..आइंदा अगर मैंने बहू को इस हाल में देखा तो समझ ले मुझसे बुरा कोई ना होगा”
आकाश सर झुकाए सुनता रहा |अपनी माँ की बहुत इज्जत करता था वो..आखिर उन्होंने अकेले ही पाल पोसकर बड़ा किया था उसे| मीनाक्षी भी अवाक सी खड़ी थी..सासूमाँ के इस रूप की कल्पना भी नहीं की थी उसनें,आँखो से अविरल आँसू बह रहे थे,कहनें को शब्द नहीं मिल रहे थे|
घूंघट ठीक करते हुए आदर पूर्वक सास के पैर पकड़ लिए, मानों कह रही हो कि धन्यवाद बिना कहे मेरी पीड़ा समझनें के लिए..तो आशा जी ने उसके सर से घूंघट हटाते हुए कहा “कोई जरूरत ना है घूंघट करने  की ,घूंघट बड़ों को इज्जत देनें के लिए लिया जाता है,मार के निशान छुपाने के लिए नहीं, तुम्हारी आँखों में इज्ज़त हो वही काफी है”|
कहते हुए आशा जी फिर कृष्ण ध्यान में लीन हो गई।

 

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं।अगर आप भी लिखने या पढ़ने के शौकीन हैं तो हमारे मंच का हिस्सा बनिये Log in to http://www.kalamanthan.in
लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

Pic credit - The crimson Bride

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

आंखो की नमी से बहता काजल

आंखो की नमी से, बहता काजल देखा है कभी ,दर्द का बादल !! काजल के बहने से, होती वो हल चल सासो के सिसकियां में , बदल...

चिड़िया

  मत कैद करों चिड़ियों को जाने दो जहाँ जाना है ! उड़ने दो इस आसमान मे उनको भी पंख पसारना है!!१!! उनको इस आसमान में अपनी पहचान बनाना है...

इंग्लिश वाली पर्ची

"अरे सुधा कहाँ हो ,जरा एक कप चाय पिला दो" राकेश जी ने अपनी पत्नी को आवाज दी..सुधा जी उम्र करीब 45 साल,केवल 8वीं तक...

राधे तेरी बन्सी और बृज की छाँव

राधे ,कहाँ गयी तेरी बन्सी और बृज की वो छाँव न रहा वो मिट्टी का अपनापन और गऊओं से लगाव अब नहीं आऊगा तेरे  गॉंव वो पुष्पों...

Recent Comments