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तुलसी का चौरा

 

अपना मकान बनते हुए देखना एक अलग सुकून देता है। ऐसा सुकून जिसमे आने वाले कल के ढेरों सपने होते हैं और बीते कल में की गयी मशक्क्त का निचोड़ भी।
मेरा घर सोसाइटी में बन रहा था। बिल्डर की ज़िम्मेदारी थी और रो हाउस होने की वजह से अपने माले के शुरू होने का इंतज़ार नहीं था। हम बड़ी उत्सुकता से हर महीने के बिल्डर लेटर का इंतज़ार करते। धीरे धीरे घर का ढांचा बनने लगा था और उत्सुकता भी बढ़ रही थी।
आख़िरकार एक रविवार को जा कर घर देखने की ठानी। सुबह सवेरे उत्साहित से हम निकले। सोसाइटी के तमाम घर। कुछ तो बन भी गए थे। बडे सुंदर एक जैसे । घरो के सामने एक तरफ पोर्टिको और सामने गार्डन की जगह।
सच कहूं तो ये ही खास वजह थी इस सोसाइटी को चुनने की। शहर में घरों के आगे गार्डन नहीं होते। इस घर में गार्डन पोर्टिको और छत के साथ थे। सुबह सवेरे घास चलने का सुख…. आह ! हम इस मोह को छोड़ नहीं पाए।
गाड़ी रुकी और हम भी अपने घर के सामने थे।
ईंट , गारा ,सीमेंट के ढेर और चारो तरफ धूल धक्कड़। अभी दरवाज़े खिड़की नहीं लगे थे बस चौखट बनी थी। एक खिड़की से चूल्हे का धुंआ निकलता नज़र आया। अचरज हुआ की “मेरे मकान ” में किसका चूल्हा ?
मेरा मकान, पर शायद ये फ़िलहाल किसी का “घर ” था।
अंदर घुसते ही देखा की आम का छोटा सा पेड़ है और उसी के पास ईंट जोड़ कर तुलसी का चौरा। सुंदर सा चूने से लीपा हुआ।दो पथ्तर रख कर शालिग्राम भी रखे थे जिन पर कुछ अक्षत पड़ी थी और अढ़ौल के फूल भी थे।
ये सब देखत हुए हम भीतर गए।
घर में ज़मीन अभी पक्की नहीं हुई थी। थोड़ी उबड़ खाबड़ सी थी। तीन कमरों का घर और हॉल।
हॉल में मसहरी सी पड़ी थी। मसहरी ‘सी’ इसलिए क्योंकि कुछ टूटी थी पर उस पर करीने से एक पुरानी सी चादर बिछी थी।
मैं उसे देखते हुए पीछे के आंगन में चली गयी।
हमारा आंगन को लेकर कुछ प्लान था। एक खूबसूरत सा मंदिर और चारो तरफ से ढंक कर एक बैठक बनाने का इरादा था। लाइब्रेरी और ढेर से पौधे ! होता है न घर का कोई कोना अपना सा।
वो भी यूँ तो कच्चा ही था पर उस कच्ची ज़मीन पर एक कोने में टमाटर और पालक की क्यारी थी कुछ गेंदे के फूल भी। ये आंगन और तुलसी का चौरा बता रहा था की घर की मालकिन का हाथ कितना सुघड़ है !
वापस मुड़ते हुए हॉल के बगल के कमरे में नज़र पड़ी जहां से चूल्हे का धुआं निकल रहा था।आटा गूंधती हुई एक स्त्री।
उम्र कम ही रही होगी। हाथों में कोमलता का एहसास हो रहा था। कांच की चूड़ियां और सर पर पल्ला। लाल साडी हरे किनारी वाली।
पीतल का छोटा सा परात और ईंट का चूल्हा। जिस पर बटुले में कुछ पक रहा था।
जो भी था उसकी खुशबू में स्वाद था। कुछ कुछ गांव की मिटटी का स्वाद।
हमे अपनी तरफ आता देख वो थोड़ा हड़बड़ाई।
मेरे मुहं से कुछ निकला नहीं बस इतना ही कह पायी “नहीं नहीं आप करो ,देख लिया यहीं से। अंदर नहीं आना है। ”
वो रसोई थी किसी की और यूँ बेहिचक घुसना ठीक न लगा और वैसे भी अभी मकान पूरा कहाँ हुआ था।
तभी कमरे से एक नौजवान निकला।
उम्र यही कोई 25 -26 की रही होगी।
धोती और आधा कुरता और गमछे को कंधे पर टाँगे।
शायद “घर” का मालिक था। “मकान” के मालिक हम थे।
हमारे साथ तब तक मिश्रा जी भी आ गए थे। मिश्रा जी ब्लॉक के ठेकदार थे। बिल्डर ने पूरी सोसाइटी को खंड में बाँट कर ठेकेदारों और मैनेजरों में बाँट दिया था।
मिश्रा जी को साथ देख कर नौजवान हाथ जोड़ कर नमस्ते करता हुआ बोला ,”आवा जाये मालिक ,आपही के घर होये।”, ये कहते हुए उसने वहां मौजूद स्त्री को ज़रा हटने का इशारा किया जो मेरी नज़रों में आ गया।
“रहने दो एक जैसे कमरे हैं सब। इसे अंदर से नहीं देखना। “ये बोलते हुए हम बाहर को निकल आये।
घर के बाहर जो आम का छोटा सा पेड़ था वो बस मेरे कद से ज़रा ऊँचा था। शायद पहली बौर आ रही थी
“ये कैसे लग गया” ?
मिश्रा जी ने गुटखा गटकते हुए कहा,”अरे मैडम , ये मज़दूर लोग लगा देते हैं। सोसाइटी के बनते वक़्त दे दिया जाता है मकान तो बस अपना बना कर रहने लगते हैं। आप चिंता न करे आपके मकान की फिनिशिंग के समय सब सफा चट्ट मिलेगा। बिलकुल टिंच कर के देंगे आपको घर।”
मेरा ध्यान उस पेड़ पर कम और घर के भीतर के दो सायों पर जयादा था।
आँचल से निकल कर एक हाथ किसी की थाली परोस रहे थे। और दूसरा हाथ उसी समय एक ग्रास दूसरे के मुहं में डाल रहा था।
अहा ,बरबस ही मुस्कान तैर गयी चेहरे पर।
“आपको जो भी चेंज चाइये डिज़ाइनर को बता दीजिये।वो आपसे व्हाट्सप्प पर सम्पर्क करेगा। ” ये मिश्रा जी की आवाज थी जो मुझे यथार्थ में खींच लायी।
“उम्म। हाँ ठीक है। मैं देख लूंगी पर ऊपर छत पर बार्बेक्यू के लिए एक कोना और…. “हम अपने मकान की डिज़ाइन में मशगूल हो गए।
कुछ महीने बीते।
मकान में अब लकड़ी का काम चल रहा था। हम डिज़ाइनर और टेक्नोलॉजी पर भरोसा कर के नए घर की शॉपिंग में लगे थे। मिश्रा जी को बोल दिया था की फ़िलहाल गार्डन में कुछ न कराये वो मैं अपनी निगरानी में कराउंगी।
आखिर कार ग्रहप्रवेश का दिन भी आ गया और हम पूजा पाठ की तैयारी के साथ अपने नए घर में गए।
अब वो मकान भी हमारा था और घर भी। पहले के घर के मालिक जा चुके थे। सब कुछ समेट कर।
पीछे के आंगन में हमारा मंदिर और बैठक थी जो हमारी किताबो के लिए खासतौर पर बनवायी थी हमने। वही बैठ कर लिखा करेंगे। चाय का प्याला किताब और ईश्वर का सानिंध्य।
लेकिन बाहर आम का पेड़ और तुलसी का चौरा वही था। शालिग्राम जी नहीं थे। हमने भी पूजा के बाद जल वही डाला।
पूजा हो गयी और अब हम घर के बाशिंदे हो गए। घर नए पुराने फर्नीचर और साजो सामान से सज गया।
हम अपनी दुनिया में मशगूल हो गए तो ध्यान भी न आया की पुराने मालिक को नया मकान मिला या नहीं।दो दिन बाद इतवार था। सुबह माली को बुलाया था। बाहर नए पौधे लगाने के लिए।
“मैडम ये तुलसी का चौरा हटा दे ? मेरे पास डिज़ाइनर चौरा है। सेरामिक का। ” माली बोला
हंसी आयी की तुलसी जी को भी डिज़ाइनर चौरा !
“नहीं फ़िलहाल रहने दो”, पता नहीं क्यों मन नहीं किया उसे हटाने का।
माली अपना काम कर वापस गया और मैं गेट बंद कर भीतर की तरफ मुड़ी तभी गेट खटका।
देखा तो वही पुराने घर का मालिक। कंधे पर गमछा और पसीने की बूंदों से चमकता चेहरा।
” अरे तुम ?” वो गेट का का दरवाजा खोल वही खड़ा हो गया।
“नमस्ते मलकिन “
हमारे पूर्वांचल में “मलकिन” बहुत प्रचलित है। गांव की भाषा का पुट अगर शहर में मिल जाये तो बड़ी ख़ुशी होती है।
“बताओ कैसे आना हुआ ? अंदर आ जाओ। आजकल कहाँ रहते हो ?” मैंने पूछा
“दुइ रो छोड़ कर ठेका मिला है मलकिन।”
“अच्छा … “
“वो मलकिन कुछु काम रहा।”
“हाँ बोलो ?”
“वो तुलसी का चौरा ले जावे के रहा।”
मैंने आश्चर्य से देखा उसे और फिर चौरे को।
“क्यों ? मेरा मतलब है पहले क्यों नहीं ले गए। अब तो मैं भी पूजा करती हूँ इसकी। “
उसका चेहरा उतर गया।
” हाँ मलकिन ,जल्दी में गए और उ हमार मेहरारू के तबियत ठीक नायी रहा तो बस जो छूट गईल ओके भूल गईली। “
“हम्म , तो ?अब कैसे याद आ गयी ?” मैंने वहीँ पड़े केन के सोफे पर बैठते हुए पूछा।
“मलकिन उ पेट से हैं और बस एक ही जिद की ,हमार तुलसी लाई देयो। केतना समझावे ! गाँव भेजे के कोशिश किये तो कहे है की हमरा ख्याल के राखी। अकता गईली हम तो। “झुंझलाते हुए बोला
उसकी बातें सुन कर यकायक हंसी आ गयी और दोनो पर दुलार हो आया।लगा की हक है उनका। इस मकान के पहले पहल ‘घर’ के मालिक थे ये दोनों। एक नई ज़िंदगी की शुरुआत मेरे मकान से की। और कहीं एक टीस उठी की कभी अपना घर मिलेगा इन्हे
“ऐसे मत बोलो। प्यार करती है तुमसे और तुम उसे यूँ बोल रहे हो। जाओ तुलसी खाली गमले में डाल लो जिससे आगे कहीं जाना हो तो साथ ले जाने में आसानी हो। “
उसके चेहरे पर लाली के साथ ख़ुशी दौड़ गयी। पता नहीं प्रेम के नाम पर या प्रेमिका की मन के हो जाने की ख़ुशी में।
“पर मलकिन आपहु पूजा जात है “
“कोई बात नहीं। मैं डिज़ाइनर तुलसी का चौरा रखूंगी। “मैंने खुद पर ही हँसते हुए कहा।
वो ख़ुशी ख़ुशी तुलसी खोदने लगा और एक छोटे से गमले में मिटटी डाल कर तुलसी लगा दी। मैं तन्मयता से देख रही थी। जाते वक़्त कुछ फल और मिठाई प्रसाद बोल कर दिए। आखिर वहां होने वाली मां है एक । पुराने घर का मालिक अपनी तुलसी ले गया।
आम का पेड़ अब भी है।
आज चार बरस हो गए। दो बरस से खूब आम लगते हैं। हर गर्मी के मौसम में आम की बौर लगती है और मुझे तुलसी के चौरे के मालिकों की याद आती है।

 

 

 

 

 

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Sarita Nirjhra
A sapiosexual, who loves to dwell deep into human emotions! A writer and poet by passion and an entrepreneur by choice!

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