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सोलमेट

“सोलमेट्स आत्मिक साथी होते हैं जो सामने ना होकर भी  साथ -साथ होते हैं पर मेरे लाल के मन में ये जिज्ञासा कैसे जाग गई? बताओ जरा….!” हमेशा की तरह उसे छेड़ा।
“मैगज़ीन में पढा था तो सोचा आपसे पूछ लूँ। आपका सोलमेट कौन है मम्मा?”
“तुम हो बेटे!”
“सच्ची”
“हाँ-हाँ!”
सुनते ही खुश होकर गले लग गया। उसके नजरों से ओझल होते ही ‘सोलमेट’ शब्द कानों से टकराता हुआ सीधे दिल और दिमाग की सैर करता पुरानी यादों को जगाने लगा। मैं अपने सोलमेट ‘आकाश’को भला कैसे भूल सकती थी।
हमारी दोस्ती की उम्र कुल दो साल थी पर लगता था जैसे बरसों का नाता था। इसकी शुरुआत तब हुई थी जब हमारे विभाग की ओर से पाँच दिवसीय ट्रेनिंग के लिए हमें बिनसर भेजा गया था। अपने ऑफिस से नेहा और मैं चुने गये थे। दूसरे सेंटर से आकाश और अन्य पाँच ऑफिसर भी थे जिनमें दो उम्र दराज महिलाएं भी थीं। वहाँ के मौसम, हरियाली सब में एक अद्भुत सा रस था, शाँति में भी एक मधुर संगीत था। सूर्योदय जल्दी हुआ करती। हम सबेरे उठकर सैर पर निकलते। लौटने के बाद तैयार होकर ट्रेनिंग क्लास के लिए जाते। नई जगह व नए माहौल का असर था शायद हम सबों में एक बचपना सा जग गया था। चाॅक से निशाना लगाना….कागजी हवाई जहाज भी उड़ाना… एक-एक कर हमने बचपन वाली सारी हरकतें दोहरा लीं थीं।
ट्रेनिंग के बाद लंच होता और उसके बाद बस में सवार हो नजदीकी स्थानों के लिए यात्राएं शुरू होतीं। अंत्याक्षरी खेलते ,बातें करते,सफर का पता ही नहीं लगता। घुम-फिर कर लौटने में रात हो जाती और डिनर कर अपने कमरों में आ जाते। नजदीकी सारे खुबसूरत जगहों की सैर कर आए थे। अल्मोड़ा, कौशानी से तो आने का दिल ही नहीं कर रहा था। इन रोमांचक पाँच दिनों को शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं। अच्छा वक़्त जल्दी बीत जाता है सो यह भी बीत गया। हम दिल्लीवासियों ने लौटते वक़्त एक वादे के साथ विदा लिया कि जहाँ तक हो सकेगा हम मिलते रहेंगे। वादे के अनुसार जब भी कोई बुक फेयर या एक्जीबिशन में जाना होता हम इकट्ठे जाते। मिलना-जुलना भी हो जाता और काम भी। इसी बीच हमारे परिवारवालों की भी दोस्ती हो गई थी। हमारे बच्चे भी हमउम्र थे। सभी को कंपनी मिल जाती थी। कई बार अपनी पत्नी के साथ आकाश हमारे घर भी आया था। सबकुछ सहज चल रहा था कि एक दिन एक मेल आया ।
“धरा ……
हम आज के बाद बात ना करे तो बेहतर होगा।
आकाश
08.08.08″
“ये क्या बेवकूफी है आकाश ?”
आँखे डबडबाई गईं थीं। गुस्सा भी आ रहा था। उस बेतुके मेल के बदले सवाल दाग दिया तो तुरंत ही फोन की घंटी बज उठी।
“अरे! मजाक किया था । तारीख तो देख लेती। मैं तो बस इस तारीख को यादगार बनाना चाहता था।”
“ऐसे कैसे? तुमने तो डरा ही दिया था।”
“आहा ….तो मेरी बहादुर दोस्त डरती भी है?”
“तुम जैसे अच्छे दोस्त को खोना नहीं चाहती।”
“खोना तो मैं भी नहीं चाहता। खैर छोड़ो। वीकेंड पर पिकनिक के लिए चलें?”
“सारे दोस्तों से पूछकर फोन करना।” पर उसका कोई फोन नहीं आया।
अगस्त के बाद सितम्बर आया और एक लंबा सा मेल साथ लाया। ओह! तो पहले वाला ट्रेलर था असली पिक्चर अब रिलीज़ हुई थी। जाने क्या-क्या लिख रखा था उसमें। अभी आधा ही पढा था कि भावनाओं का तूफान सा उमड़ा। अक्षर धुंधलाने लगे। ऑफिस में आँखें गीली कैसे करतीं? बामुश्किल खुद को संभाला और नयनों के कपाट बंद कर फिर उन्हीं दिनों की सैर करने लगी। ठीक से याद करने लगी। कुछ ऐसा-वैसा तो ना घटा था ? आखिर कोई तो बात हुई होगी? मेरी किस बात से उसे सिग्नल मिला होगा। ध्यान आया कि आखिरी शाम एक पहाड़ी की चढाई के वक़्त हम अकेले थे।
“मुझसे और ना चढा जाएगा आकाश!”
“कम ऑन धरा! तुम कर सकती हो।”
“ऊँची चढाई है।”मैने घबड़ाहट से उसकी ओर देखा तो उसने हाथ बढ़ा दिया। मैं ऊँचाई से इन वादियों को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही थी। मित्रता के उस आमंत्रण को सहर्ष स्वीकारती मंजिल की ओर बढ़ती चली गई।
थोड़ी ही देर की मशक्कत के बाद हम चोटी पर थे। बाकी के साथियों ने हमारा साथ छोड़ नीचे ही डेरा डाल दिया था। उनमें वह महिलाएं भी थीं जिन्हें घुटनों में दर्द की शिकायत थी। ऊपर आसमान और अगल-बगल हरे-हरे पेड़ों से आच्छादित पहाड़ ही नजर आ रहे थे। बड़ा ही मनोरम दृश्य था। कुछ क्षणों के लिए यह भी भूल गई थी कि अपने पीछे पति व बेटे को छोड़कर आई हूँ। ताजी हवाएँ छू-छू कर सिहरन जगा रहीं थीं। प्रकृति के उस नर्म  स्पर्श ने मन को सहला दिया था। चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी मानों किला फतह कर लिया हो। तापमान थोड़ा कम था जैसा अमूमन ऊँचाइयों पर होता है। उफ!आँखें बंद कर उन्हें हमेशा के लिए जेहन में कैद करना चाहती थी। अपने अंदर उस खुबसूरती और शीतलता को आत्मसात कर जब आँखें खोलीं तो आकाश के नयनयुग्मों को खुद पर अटका पाया।
हँसते हुए ही टोका “कहाँ खो गए?”
“कहाँ खो सकता हूँ? यहाँ से सुरक्षित वापसी की चिंता हो रही है।” आकाश अनायास टोके जाने पर हड़बड़ा गया था।
“उपर जाने के लिए ही प्रयास की जरूरत है, नीचे तो गुरुत्वाकर्षण बल खींच लेगी हमें।” दोनों के ठहाके वादियों से टकराकर वापस आ रहे थे।
सच! प्रकृति के उन अद्भुत नजारों की याद ने दिलोदिमाग को तरोताज़ा कर दिया। वापस मेल पढने लगी।
डियर सोलमेट,
माफ करना अपनी मर्ज़ी से तुम्हें ये नाम दे रहा हूँ। तुम दोस्त हो एक बहुत ही प्यारी दोस्त जिसे आजीवन सहेज कर रखना चाहता हूँ पर मेरा दुर्भाग्य देखो कि तुम्हे अपने ही हाथों दूर कर रहा हूँ। मुझे पता है कि मैं तुम्हारे साथ गलत करने जा रहा हूँ पर जब तक तुम मेरे मेल को पूरा ना पढ लो ,कृपया कोई राय ना बनाना।
याद है तुम्हें 2006 की अपने ट्रेनिंग के आखिरी दिन की वह पहाड़ी की चढाई। कितना बोलती थी तुम। यहाँ-वहाँ की,स्कूल -काॅलेज की तमाम बातें और उसके बाद उस ऊँचाई पर जाकर तुम्हारा खामोश हो जाना मुझे दुःसाहसी बना रहा था। मैं ही जानता हूँ उस वक़्त कैसे खुद को संभाल सका। सच कहूँ तो तुम्हारी मासूमियत की ताकत ने ही मुझे नियंत्रित किया। जी चाहता था कि वापस ही ना लौटूं पर जैसा तुमने कहा था कि गुरुत्वाकर्षण बल हम दोनों को वापस अपनी दुनिया में खींच कर ले आएगा, वही हुआ। तुम वापसी के बाद अपनी दुनिया में मशगूल हो गई पर तुम्हारा एक हिस्सा मेरे साथ चला आया और जब-तब मुझे परेशान करने लगा। वादे के अनुसार मिलते रहे। तुम समान भाव से सभी मित्रों को बुलातीं। मैं आने से खुद को ना रोक पाता। तुम्हारे प्रति एक चाहत,एक झुकाव के साथ आता। वह चाहत मेरे अंदर बढती ही जा रही थी। खुद को  समझाने की बहुत कोशिश की। अपनी पत्नी के साथ वक़्त बिताना चाहा पर कुछ काम नहीं आया। तब जाकर मैंने यह कठोर निर्णय लिया कि मेरे परिवार के हित के लिए  मेरा तुमसे कभी ना मिलना ही श्रेयस्कर होगा।
– आकाश”
बड़ा अजीब सा मन हो रहा था। हम दोनों तीस पार कर चुके थे। हँसते- खेलते परिवार व बच्चे के होते हुए यह सब आखिर क्यों हुआ होगा? आँखें मूँद कर बहुत सोचा तो अंतरात्मा से यही जवाब आया। घर और जिम्मेदारियों से दूर खूबसूरत वादियों में बचपन जीते हुए ,उन उन्मुक्त क्षणों में मन किशोर सा हो गया था। उसी हठ में कुछ चाह बैठा। चाहतों की उस मीठी दस्तक ने साथी का मन भरमा दिया होगा। मुझे ऐसा कुछ क्यों नहीं लगा था? शायद हम स्त्रियाँ संबंधों की सीमा रेखा में दक्ष आर्किटेक्ट इंजीनियर होतीं हैं जिन्हें अपनी हदों का भलीभाँति भान होता है।

 

दुख,क्रोध,भावुकता और ठगे जाने का अहसास ,सभी एकसाथ मन में घुमड़ रहे थे। पूरे दो साल तक मन में रखा था उसने। पहले कहता तो समझती या समझाती पर उसने तो अपने फैसले में शामिल होने का हक तक ना दिया था। मैं घोर अचरज में थी कि जिस दोस्ती पर गर्व कर रही थी उसके टूटने का दूख कैसे मनाती। यह ऐसा दर्द था जो किसी से साझा भी नहीं कर सकती थी। इतने में अगला मेल आया ।
“मुझे पता था कि प्यार, उम्र व सीमाओं के बंधन को नहीं मानता और अब समझ भी गया हूँ। मैं खुद को समझाने   के अथक प्रयास करता हुआ अब थक गया हूँ। इन सब से अंजान अपनी पत्नी की ओर देखता हूँ तो खुद को अपराधी पाता हूँ। अपनी पत्नी और अपनी सोलमेट के बीच मैंने पत्नी को चुन लिया है। तुमसे एक अनुरोध है कि मुझसे संपर्क बनाने की कोशिश ना करना। तुम्हारी आवाज़ कहीं मेरे निर्णय को डिगा ना दे।”
“गलत है आकाश! हमारी इतनी प्यारी दोस्ती का ऐसा अंत….क्यों किया आकाश … मुझसे कहते …मैं तुम्हारा मन साफ कर देती। ऐसे बिना कहे-सुने जो तुमने किया वह सरासर गलत है। मैं कबतक तुम्हारी दोस्त थी और कब सारे समीकरण बदल गये, मुझे नहीं पता पर एक बात समझ में नहीं आई कि दो इंसान के जीवन से जुड़े निर्णय तुमने अकेले कैसे ले लिये?”
उसके एकतरफा सोच से तड़प कर मेल कर विरोध जताया पर उधर से कोई जवाब नहीं आया।
कुछ ही समय में मैने खुद को बखुबी संभाल लिया पर उस गुस्ताख को कैसे समझाती जिसने स्वयं अपनी परेशानियां बढाईं और समाधान भी कर लिया मानो मैं कोई बुत हूँ। मेरी अपनी इच्छाओं का कोई वजूद नहीं। हालांकि मुझसे कहता तो शायद मै भी वही करती पर वह हमारा निर्णय होता। हम एक-दूसरे के राह को आसान करते। हम सोलमेट्स थे पर अपनी बातें कह नहीं सके। क्या इस खूबसूरत आत्मिक रिश्ते का यही हश्र होना था? मेरा सोलमेट अपने ही हाथों मेरे रूह को छलनी कर गया था और मैं अपने इस दुःख का जिक्र तक नहीं कर सकी थी। मैं कतरा-कतरा टूट रही थी और वह भी कहीं बिखर गया था।
खैर अब इन बातों के भी सालों बीत गए। मेरा पूत्र अब समझदार किशोर हो चुका है पर आज भी जब किसी की सच्ची दोस्ती देखती हूँ तो दोस्त याद आता है। सच कहूँ तो आज भी इसी आस में बैठी हूँ कि कभी तो उसके मन में घिर आए काले बादल किसी पहाड़ी से टकराकर जरूर बरसेंगे।
कहीं तो धरा और आकाश के बीच संवाद होगा जहाँ दोनों बोल-बतिया कर मन हल्का कर लेंगे। कभी तो मेरा संजीदा दोस्त,मेरी दोस्ती की कद्र कर पाएगा। उस दिन बीच के सारे फ़ासले भुला कर खिलखिलाता हुआ वापस आएगा और सच्चा सोलमेट कहलाएगा।

 

 

 

 

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