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बहू हो,बेटी नहीं

 

“दादी मुझे रिमोट कार चाहिए, दिला दो ना।”
“नमन” कितना समझाऊँ तुमको, रिया को अपने घर चले जाने दो उसके बाद मैं दिलवा दूंगी। नहीं तो उसके लिए भी लेना पड़ेगा। दादी-पोते की यह बात सुनकर उमा सोच में पड़ गयी कि ऐसा क्या हो गया जो माँ जी नमन को ये सब सीखा रही है।कयोंकि वो एक लड़का है और रिया एक लड़की। क्या हो गया जो वो लड़की है।
उमा अपनी सास के पास गई और बोलीं- “माँ आप ये नमन को क्या सीखा रही है? ये गलत है। बच्चे एक कच्ची मिट्टी होते हैं। उनको सही आकार देना चाहिए, ना कि गलत। आप ऐसा कर के भाई-बहन के रिश्ते में अभी से दरार डाल रही है। कल को जब ये बड़े होगे तो क्या करेंगे। कभी सोचा है आपने?”
“उमा, मै घर की बड़ी हूँ । मैंने भी बच्चे पाले हैं। अब तुम मुझे बताओगी क्या सही है और क्या गलत। नमन इस घर का चिराग है। वो जो बोलेगा, जो मांगेगा मै दूंगी। तुम्हारी लड़की है ना इसलिए तुम उससे जलती हो।”
“माँ जी, ये आप क्या बोल रही है। नमन मेरा भी बच्चा है। मै उससे क्यों जलूँगी । मुझे बेटी है उसका मुझे कोई अफसोस नहीं है। मै  खुश हूँ। पर नमन को मै गलत बनते नहीं देख सकती। अभी तो पूरा भविष्य उसके सामने है।”
“अब बस करो उमा। मै तुम्हारी सास हूँ, और तुम इस घर की बहू। और ये मत भूलो बहू हो बेटी नहीं। तुम्हारी माँ ने क्या तुमको यही सिखाया है कि जबान कैसे लडाते है।”
“हाँ, माँ जी । मै तो भूल ही गयी थी कि मैं बहू हूँ इस घर की बेटी नहीं। अच्छा किया आपनें जो मेरी आखों की पट्टी खोल दी।
उमा अपनी बेटी को लेती हैं और अपने कमरे में चली जाती है।

 

 

 

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