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अल्हड़ से वयस्क

 

नादान से जिम्मेदार बनने का एक दौर।
उन्मुक्त गगन में उड़ने वाले पंछी से, शांत मातृत्व की गरिमा का सफर। माँ का एक छोटा पर अपरिभाषित अर्थ, इतना बड़ा परिवर्तन की, एक किसी भी उम्र की लड़की को एक जिम्मेदार महिला बड़ा देतीं हैं। बहुत सुखद यह सफर होता है। चार चाँद तब लग जाता हैं जब बच्चा बड़ा हो और माँ की गरिमा को समझ पाए।
जब मै बेटी थी तो अपनी सब बातें मनवाना ही जरूरी होता था। कोई परेशानी हो ,तो माँ हैं ना, सब ठीक कर देगी। माँ समस्या के समाधान का खजाना जो होती हैं। पर माँ बनने पर बच्चे की आवश्यकता ही सर्वप्रथम होती हैं।
जब बेटी थी तो माँ की कीमत नहीं समझी। आखिर माँ तो मेरी ही हैं कहाँ जाएगी? अब महसूस होता हैं की हम कितने गलत थे, पर अब क्या। कहते हैं ना बीता समय वापस नहीं आता। मै अब बेटी नहीं रही , क्योकि लाड़ करने वाली इस दुनिया से चली गई और मै वयस्क बन गई क्योकि मेरी माँ नहीं हैं मेरा मानना हैं जब तक आपके माँ -पापा हैं। आप बच्चे हैं भले ही आपकी उम्र ज्यादा हो।
मन का एक कोना कभी कभी खाली रह जाता हैं। एक दर्द के साथ, बेटी बनने की चाह के लिए पर रिक्तता ही हाथ लगती हैं। वो अल्हड़ से जज़्बात कब परिपक्वता में बदल गये, पता नहीं चला,क्योकि अब मै बेटी से माँ बन गई। एक खुशनुमा अहसास।
आज जब बेटी ससुराल चली गई तो अपनी माँ की जगह मै खुद आ गई वही फ़िक्र की आदत। वही चिंता , मसलन अब कब आओगी ,और अंतहीन प्रतिक्षा। सब ठीक तो हैं ना ?छोटी छोटी चिंताए और जब बेटी आती तो सारी खुशियाँ घर आ जाती सूने घर में रौनक आ जाती..
याद हैं वो माँ की प्रतीक्षा वाली आँखे। कब धीरे से मेरी आँखों में उतर आई। माँ की वो मुझे सहेजने वाली आदत कब मुझमें आ गई!
कई बार लगता हैं मै माँ की प्रतिछाया बन गई।
शायद हर लड़की ये सफर तय करती हैं बेटी से माँ बनने में।
बेटी में अपना बचपन तलाशती मै। बेटी से माँ का ये सफर एक सुखद अहसास से सराबोर कर जाती हैं।सच ये बदलाव बहुत ही सुखद होता हैं। समयांतराल सब परिवर्तित हो जाता हैं ,समय , पात्र और रिश्ते – भावनायें और जिम्मेदारियां।
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Sangita Tripathi
पढ़ना लिखना... ज्ञान का स्रोत हैं... किताबें सबसे अच्छी दोस्त हैं.... जो कभी दगा नहीं देतीं

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