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थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है

शहर की बालकनी में बैठ कर चाय पीना और उस पर कोयल की मधुर ध्वनि।

ऐसा रोज़ नहीं होता न।

आज की परिस्तिथि में हर कोई अपनी अपनी तरह से सामना कर रहा है और कुछ न कुछ जीवन से सीख रहा है। यूँ कहें की इस कोरोना ने भागती दौड़ती ज़िन्दगी पर एक अर्धविराम लगा दिया।
सुबह आंख खुलते हैं अपनी पूरी ईटीनेरी चेक करने वाले आज सुकून से एक प्याला चाय लेकर सोचते हैं दिन कैसे गुजारा जाएगा।
वर्क फ्रॉम होम मैं काम जरूर होता है लेकिन घंटों की ट्रैफिक की मशक्कत बच गई है। सड़कों पर न गाड़ियां हैं ,न गाड़ियों का शोर, ना किसी से आगे जाने की जल्दी। यह आगे जाने की जल्दी ही शायद हमें यहां तक ले आयी।

पिछले 50 सालों में इंसान ने जितनी तरक्की की है वह काबिले तारीफ है।

इंटेलिजेंस से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक पहुंचने का सफर इन्हीं कुछ सालों में पूरा किया गया और साथ ही पूरी की गई अपना आधिपत्य और प्रभुत्ता दिखाने की ललक।
यही आधिपत्य और प्रभुता दिखाने की लालसा ने हमें द्वितीय विश्वयुद्ध भी दिया था प्रथम परमाणु बम का स्वाद भी। मशरूम की माफिक उठे बड़े से धुएं के गुबार से अब तक पीढ़ियां ढकी हुई है। अपनी सीमाएं बढ़ाने का लालच और खुद को सबसे ताकतवर दिखाने की लालसा शायद यही वो वजह थी जिसने हमें वह भयावह दृश्य दिखाएं।
इस द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कहीं ना कहीं आम आदमी बड़े बड़े हथियारों से डरा हुआ था। उसके बाद यूं लगा कि शायद इंसान एक दूसरे के साथ रहना और प्रकृति के साथ तारतम्य बना कर चलना सीख लेगा।
प्रकृति हमेशा के लिए है ,अजर है अमर है। यह है, तो हम हैं।
लेकिन हाय रे! काम क्रोध लोभ मोह से पीड़ित इंसान !
कभी सुना है कि किराएदार घर को, अपनी मनमर्जी से मकान के नक्शे को बदलते हुए?
अब मान लीजिये आपने अपने घर की ऊपरी मंजिल किसी को किराए पर दे दी और वह तीन कमरे को तोड़कर एक कमरा बनाने पर आमादा हो तो आप क्या करेंगे ?निकाल बाहर करेंगे? हैं ना ?
मगर इतना जरा सा तथ्य हमें समझ नहीं आया। इस पृथ्वी पर किराएदार की तरह आए हुए हम, इसे अपनी जागीर समझ बैठे और इसके ऊपर भी अपनी सत्ता फैलाने शुरू कर दी।
जंगलों को काट कर गाँव ,फिर गांव की जगह शहर , कच्ची सड़कों की जगह लंबी तारकोल की सड़कें, बस, गाड़ियां, रेल, हवाई जहाज, कल कारखाने के शोर में खोती हुई प्रकृति की आवाज।
चहचहाती चिड़ियां , हवा से झूलते पेड़ों की ध्वनि और खुद से खुद का संवाद यह सब कुछ, आगे बढ़ने में मशगूल इंसान सुन नहीं पाया।

धीरे-धीरे हमें आदत हो गई एक रेस में भागने की एक रेस जिसकी मंजिल किसी मृग मरीचिका की भांति है।

जितना पास आओ वह उतनी दूर नजर आती है। दो कमरे के मकान से तीन कमरे का मकान और फिर 4, फिर किसी और ऊंची इमारत की सबसे ऊंची मंजिल जहां से पूरा शहर झिलमिलाता हुआ नजर आए।
एक ब्रांड की कार से दूसरा ब्रांड, फिर उससे बड़ा ब्रांड और फिर उस से महंगा।
कपड़े ,गहने, गर्मी की छुट्टियां कुछ भी हमने नहीं छोड़ा जो रेस में शामिल ना हो।
यहां तक कि रिश्ते और उनकी गर्माहट को भी हमने दिखावे की रेस में शामिल कर दिया।

सभ्यता में आगे बढ़ने कि अपनी ललक में हम कब इंसानियत को पीछे भूल बैठे हमें पता भी ना चला और और इसमें हम सब का योगदान है।

कोई नहीं कह सकता कि मैंने यह कभी नहीं किया। हम सब जिम्मेदार हैं, कोई कम कोई ज्यादा| अपने स्तर पर हम सभी ने इस रेस में योगदान दिया है। आज जब अचानक प्रकृति ने करवट ली और हमारे सामने एक अनजान अनदेखे के रूप में सामने आयी तो हमारी सारी वैज्ञानिक समझ और उसके अविष्कार फीके पड़ गए और हम सब मजबूर हो गए अपने घरों में जाने को।

सुकून के यह पल हमे सज़ा में मिले हैं। सोचिये कितनी ममतामयी है प्रकृति।
भूचाल और प्रलय ला देंने की ताक़त रखने वाली प्रकृति ने हमे मात्र ठहरा हुआ वक़्त दिया।

वक़्त ये सोचने को की क्या किया , क्या कर रहें हैं ,और क्या करेंगे?

थोड़े में रहने का संतोष और छोटी खुशियों में खुद के लिए प्रसन्न चित्त ढूंढ लेना यह इस समस्या की सबसे बड़ी देन है।

यहां परिवार और रिश्तों की बात नहीं करुँगी बल्कि बात उन “ज़रूरतों” जिनके बिना हम समझते थे की हम रह नहीं सकते। हमारी तमाम ज़रूरतें और उस पर वो “हमारा वाला “!
जी हाँ, पूरा परिवार ‘हमाम’ साबुन से नहाने वाला कब “हमारा वाला डव” और “हमारा वाला पार्क अवेन्यू” तक पहुंच गया पता नहीं चला।
मेरा वाला पेस्ट से लेकर शैम्पू और पिज़्ज़ा से ले कर पेमेंट गेटवे तक हम सब का अपना कुछ ख़ास।
ख़ास नहीं रहा तो बस “प्रकृति और उसकी नेमतें”|
तो यह समय हमे “हमारे वाले “से बाहर निकालने को आया है।
ये नहीं की तरक्की करना और जीवन जीने के ढंग में बदलाव गलत है। शिक्षा और बढ़ती समझ ज़रूर हमे उस ओर ले जाएगी किन्तु प्रभुत्व का नशा और खुद को प्रकृति से अलग थलग कर “अहम ब्रह्मास्मि ‘ को पूर्णतया चरित्रार्थ करना ,ये गलत है।
अभी कल नीना गुप्ता जी का एक पोस्ट देखा जहां उन्होंने बड़ी सादगी से कहा की “मेरा वाला भूल जाओ “.नीना जी अभी जहां रह रही है या यूँ कहें की लॉकडाउन की वजह से फंस गयी हैं वहां उनके ब्रांड नहीं मिल रहे लेकिन आम हिंदुस्तानी परिवारों की पुरानी ‘रवायतें ‘ काम आ रहीं हैं। शैम्पू में ज़रा सा पानी डाल लिया और क्रीम दिन में एक बार लगायी !
कहने का मतलब ये की पिछले पचास दिनों से हम घर के बने खाने का लुत्फ़ उठा रहे है। घूमने को बालकनी , घर के बाहर का बरामदा या बहुत हुआ तो आस पास के पचास कदम। गिने चुने चार या छह जोड़ी कपड़े और काम चल रहा है। बड़े मॉल की जगह बगल वाले छोटे भैया की दुकान ही काम आ रही है और सारी ज़रूरतें पूरी भी हो रही है।

ध्यान देने वाली बात है की हमने ‘शौक’ और ‘दिखावे’ को ज़रूरत में तब्दील कर दिया था।

हम कहीं न कहीं भूल गए थे की ‘थोड़ा है और थोड़े की ही ज़रुरत है’।
ये ठहरा हुआ वक़्त हमे सोचने का भरपूर समय दे रहा है की हम अपनी ज़रूरतों और शौक को छांट ले,और समझ ले की किरायेदार के तौर पर रहने वाली जगह पर अगर हम स्थायी बदलाव लाने की कोशिश करेंगे, तो ये पृथ्वी कभी भी हमे घर से बेघर या घर में नज़रबंद कर सकती है।
वर्क फ्रॉम होम में काफी वक़्त मिलता है।चाय का प्याला ले कर इसे पढ़ें और सोचे इस लॉकडाउन के बाद आप कौन से ऐसी ‘ज़रूरत’ को अपने से दूर रखेंगे जिसके बिना आपके ये पचास दिन निकले।

 

 

 

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