Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Short Stories पतिव्रता

पतिव्रता

मन और कृष्णा, 25 बरस का सफल सुखद वैवाहिक जीवन था दोनों का। गृहस्थ जीवन के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध थे दोनों।रमन तो कदाचित चूक भी गए हों किन्तु कृष्णा सदैव ही विवाह संस्था हेतु पूर्णतः समर्पित रही।परिस्थिति कोई भी रही हो कृष्णा कभी विचलित नहीं हुई थी।यहाँ तक कि सुहाग सेज पर ही पति के मुख से दूसरी महिला के लिए प्रेम की स्वीकारोक्ति के पश्चात भी उसके कदम कभी पत्नी धर्म से नहीं डगमगाये थे। पति बच्चे और ईश्वर भक्ति, यही उसका जीवन सार था।
अब बस मन में यही आशा बाकी रह गई थी कि दोनों बच्चों के लिए उचित घर वर मिल जाए तो वो भी गृहस्थी से थोड़ा विश्राम लेकर प्रभु भक्ति में समय बिताए। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। अचानक से रमन की तबीयत कुछ नर्म रहने लगी। कुछ दिन तक जब सुधार दिखाई नहीं दिया तो रमन को बड़े अस्पताल में दिखाया गया। शुरुवाती जांच में ही डॉक्टर ने बता दिया कि रमन को ट्यूमर जैसी जानलेवा बीमारी हुई है। पूरे परिवार पर मानो दुख का पहाड टूट पड़ा।कुछ दिन तो परिवार में कोई मानने को तैयार ही नहीं था कि ऐसा वास्तव में हुआ है।
इस डॉक्टर से उस डॉक्टर, इस शहर से उस शहर रमन को लिए वो दौड़ती रही।जब सभी डॉक्टरों ने एक ही जवाब दिया तो वह बिलकुल निराश हो गई। दिल अभी भी मानने को तैयार नहीं था। “सादा जीवन जीना, कम मसाला तेल खाना, रोज व्यायाम करना, कभी शराब बीड़ी तक न छूने वाले व्यक्ति को कब और कैसे ये जानलेवा बीमारी लग गई ?”, अक्सर अकेले में बैठ कृष्ण खुद के ही सवालों में उलझ जाती। कभी ईश्वर को दोष देती तो कभी अपनी किस्मत को। कभी कभी रात के नीरव अंधेरे में सबके सोने के बाद अपने कर्मों का लेखा जोखा लेकर बैठ जाती, कब किसका कहाँ जाने या अनजाने में दिल दुखाया जो आज इतनी बड़ी विपदा आन पड़ी।
उसे याद आने लगते वे प्रेममय पल जो पति के साथ बिताए थे। कैसे उसके पाँव की पायल की खनक सुनकर ही रमण उसे पहचान लेते थे। उसके माथे पर लगी बिंदिया को देखकर अक्सर कहते, “इस बिंदिया को खुद से अलग मत किया करो बहुत अधूरा लगता है।लाल गुलाबी रंग हमेशा से रमन को पसंद रहे। कृष्णा कभी हल्के रँग पहनना भी चाहती तो रमन हौले से कोई लाल साड़ी निकाल कर बिस्तर पर रख जाते। बिन कहे ही अपने मन की बात जता देते और कृष्णा भी खुद को रोक नहीं पाती रमन की पसंद में खुद को रंगने से।
” बरसों का साथ, हँसना रोना, रूठना मनाना! गहरे से गहरे दुख भी दोनों ने एक दूजे का हाथ थाम कर पार कर लिए थे किन्तु आज लगता था मानो रमन का हाथ छूट रहा हो।
आँखे रोते रोते बेज़ार हो गई थी। परिवार में किसी का मनोबल न टूटे इसलिए सामने तो सभी सदस्‍य एक दूसरे को हौसला देते लेकिन तन्हाई में ज़ार ज़ार रोते। शहर के सबसे बड़े अस्पताल में रमन का इलाज चल रहा था। स्थिति सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी। हर गुजरते दिन के साथ रमन के ठीक होने की उम्मीद भी कम होती जा रही थी।कृष्णा अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। रुपया पैसा, दौड़ भाग किसी भी मामले में कोई कोताही नहीं बरती जा रही थी फिर भी विधाता के लेख भला बदल सका है कोई??
जब डॉक्टर और अस्पताल पर भरोसा न रहा तो नीम हकीम वैध, बाबा, ओझा, तांत्रिक तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। एक पतिव्रता पत्नी के लिए कितना कठिन है उसके सामने पति के कदम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं और वो मूक दर्शक बनी देख रही है। अपनी पूरी क्षमता लगाने पर भी वो नियति को नहीं बदल पा रही थी। रमन को देख देख वो हर पल में सौ सौ मौत मर रही थी । किसी को अपना दुख जाहिर भी नहीं कर पा रही थी। ऐसी परिस्थिति में टूट जाना कोई हल भी तो नहीं था। दो जवान बच्चे, उनका भविष्य, उनका वर्तमान सब कुछ सिर्फ कृष्णा के हाथ में ही था। इस समय कमजोर पड़ने का अर्थ था पूरे परिवार का माला के मोतियों की भाँति बिखर जाना। ‘नहीं बिखरने दूँगी इस परिवार को’ कृष्णा ने निश्चय कर लिया था।
भविष्य में जो होगा सो होगा लेकिन वर्तमान से कैसे पीछा छुड़ा पाएगी वो, हर पल यही खयाल उसको परेशान करता। पंडित जी से कुछ उपाय पूछा तो उन्होनें लक्ष्मीनारायण जी का उपवास करने की सलाह दी। पूरी आस्था और भक्ति में तल्लीन हो, पिछले छह महीने से वह उपवास कर रही थी ।पति की दिन रात सेवा और घर की जिम्मेदारियों ने उसे भाव शून्य बना दिया था।
रमन समान्य दिनचर्या सम्बन्धित कार्य करने में भी असमर्थ हो चला था। बीमारी के अंतिम चरण में होने कारण मुँह से बोल भी नहीं फूटते थे। इधर कुछ एक महीने से खाना पीना भी बंद था। बमुश्किल दो चार चम्मच जूस या सूप ही उसके हलक से उतर पाता। मरे हुए के साथ मारा नहीं जाता, जीना तो पड़ता ही है इसलिए पेट की आग बुझाने को जब कृष्णा भोजन का थाल लेकर बैठती तो कई बार रोते रोते बेदम हो जाती। पति भूखा प्यासा तड़प रहा हो तो पत्नी के गले से निवाला कैसे उतर सकता है!
भूख कमजोरी और बीमारी के कारण अब रमन आँख भी बमुश्किल ही खोल पाता था। खोलता भी तो शायद किसी को पहचानने की सुध नहीं रही थी।अंत समय जान कर धीरे धीरे रिश्तेदार भी आने लगे।कृष्णा का प्रेम कहें या उसके उपवास का प्रभाव कि बिना कुछ खाए भी एक महीने से रमन की साँसे चल रही थी।
कृष्णा बिलकुल बेसुध हुई पड़ी थी। एक दिन बड़ी ननद ने उसे कहा तुम एकादशी का व्रत कर लो, रमन की जल्दी मुक्ति हो जाएगी।
कुछ भी सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो गई थी, बड़ी जीजी के कहे अनुसार उसने निर्जला एकादशी उपवास किया। दूसरी एकादशी के दिन अन्ततः रमन ने प्राण त्याग दिए।
“पत्नी के उपवास का प्रभाव है जो आज ही के दिन मुक्ति मिल गई।”
“बड़ी पतिव्रता निकली कृष्णा तो, सीधे स्वर्ग की यात्रा करा दी पति को”, महिलाओं में खुसुर – फुसुर होने लगी।
कृष्णा मूर्ति बनी बैठी थी। जिस पति की लंबी आयु की कामना करते न थकती थी आज उसी के लिए मृत्यु माँग कर लाई थी वो।
” कैसी पतिव्रता हूँ जो पति की मौत पर भी मुझे बधाई मिल रही है? क्या पति के लिए मौत मांगना भी एक पतिव्रता का धर्म है ? हज़ारों सवाल उसके मस्तिष्क में कौंध रहे थे, उधर घर की महिलाएं उसे रुलाने के प्रयास में लगी थी।कृष्णा की मनःस्थिति कोई नहीं समझ पा रहा था। आखिर में जब रमन का मृत शरीर ले जाने लगे तब कृष्णा को होश आया। पति को आखिरी बार देख कर वो ऐसे रोयी कि जैसे आसमान फट पड़ा हो।कुछ  ही देर में रोते रोते वह अचानक गश खाकर गिर पड़ी। डॉक्टर को बुलाया गया। कृष्ण का ब्लड प्रेशर एकदम नीचे पहुँच गया था।डॉक्टर के माथे पर भी पसीने की बूँदे चमक रही थी।पल्स भी धीरे धीरे कम होती जा रही थी। डॉक्टर उम्मीद छोड़ था  ,इधर कृष्णा को अवचेतन मस्तिष्क ने उसका वादा याद दिलाया “मै परिवार को बिखरने नहीं दूँगी”
“अपने परिवार को मझधार में छोड़ कर मैं नहीं जा सकती”
एकाएक पल्स सामान्य होने लगी.. कुछ ही देर में उसे होश आ गया था।
पति की मौत के बाद उसकी शेष जिम्मेदारियों को पूरा करना ही पतिव्रता का धर्म है, पति के वियोग में प्राण त्याग देना पत्नी धर्म नहीं! अपने सारे प्रश्नों का उत्तर उसे मिल गया था साथ ही जीने की वजह और मकसद भी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

आधी किताब की पूरी विवेचना – सोशल मिडिया में साहित्य

  इंस्टेंट के नाम पर हमे इंस्टेंट खाना , इंस्टेंट मनोरंजन , इंस्टेंट फेम और इंस्टेंट नेम सब चहिये। और अक्सर इंस्टैंट का चक्रव्यूह हमे...

कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला’

  वर दे, वीणावादिनी , वर दे! प्रिय स्वतंत्र- रव अमृत-मंत्र तव भारत में भर दे! काट अंध- उर के बंधन स्तर बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर, जगमग...

बांझाकरी की प्रेमिल कविता

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका प्रियंका गहलोत द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया...

मेरे प्रिय रेडियो

मेरे प्रिय रेडियो, तेज हवाओं ने खिड़की के पल्ले को आपस में टकराने पर मजबूर कर दिया है। मैं भी बिस्तर से उठ कर अलसाई...

Recent Comments