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भोर की किरण

 

वो रात कुछ लंबी हो आई थी । बाहर का अंधेरा मन को और अंधेरे से घेर रहा था। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था, हाथ को हाथ ना सूझ रहा था। फिर भी पगडंडियों को पकड़ खेतों के बीच किसी अनहोनी की आशंका को मन में लिए मंजू यहां वहाँ बेतहाशा ढूंढ रही थी, अपनी बेटी को।
अपनी सोलह साल की बच्ची राधा को जो शाम से ही घर वापस नहीं आई थी। शहर होता तो कोई बात होती। ये पचास मकानों का छोटा सा गांव था, ना बाजार ना और कोई जगह जहां इतने समय तक घूम सके। सारी सखी सहेलियों के घर भी पूछ लिया, पूछ क्या लिया लड़ भी लिया कि जाने किसकी संगत में बिटिया हाथ से निकल गई।
“क्या देख रही है, मिली क्या? सब तेरी गलती है। जब देखो बिटिया से लड़ते रहती थी, मेरा बेटा शहर में खून पसीना बहाता है और तुझसे तीन-चार बच्चे नहीं संभलते! एक ही बेटी थी वो भी ना संभाली गई तुझसे? मुझे तो तेरे ही लक्षण ठीक नहीं लगते तो तेरी बेटी भी तेरी ही तरह होगी ना!”
सास के जहर भरे ताने मंजू के कानो में गर्म शीशे की तरह लग रहे थे पर शायद ये ही सच हो? वो खुद एक अच्छी माँ नहीं बन सकी तो बेटी का क्या कसूर? अब गांव है सवाल उठेंगे ही! जवान होती लड़की नहीं मिल रही है। कल सुबह तक कोई मुँह नहीं देखेगा हमारा इस गांव में। नरेंद्र को क्या मुँह दिखाऊंगी?
राधा पिछले साल तक तो ठीक-ठाक ही थी जब तक गांव में मथुरा से रास लीला नहीं आई थी।
बड़ा घर होने के कारण मंडली की लड़कियों को राधा के घर पर ही ठहराया गया था। कुछ ही दिनों में राधा की अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी उनसे। “चाची! राधा को भी डांस सीखने दो ना? बहुत अच्छा नाचती है।” उन्हीं में से एक ने कहा था। मंजू को बहुत गुस्सा आया था, मेहमान ना होती तो बताती। लड़की को ऐसे सपने दिखा रही है जो उस समाज के दायरे से बाहर था। मंजू ने तो मांजी के कहने पर राधा की पढ़ाई भी दसवीं बाद रुकवा दी कि घर के काम सीखा और ब्याह कर देंगे दो चार साल में।
पर मुसीबत छोड़ कर गए रासलीला वाले की राधा ने थिरकना शुरू कर दिया। और शुरू हो गई थी महाभारत घर में। माँजी जरा भी देख लेती तो गालियां देना शुरू कर देती थी। मंजू और राधा को एक साथ चरित्र-हीन का प्रमाण-पत्र भी दे देती थी। इसी चक्कर में अब रोज मंजू और राधा के बीच तू तू मैं मैं हो जाती थी। और राधा फोन लेकर कमरे में बंद हो जाती थी। सुनने को तो वो भी मिलता की लड़की के हाथ में फोन दे कर बिगाड़ रखा है बस! पर मंजू से राधा ने कहा था कि वो इन्टरनेट पर आगे पढ़ना चाहती थी, इसलिए मंजू उसे फोन दे दिया करती थी।
अंधेरी रात गुजर गई पर सुबह का उजाला उस रात से भी ख़तरनाक था।
नरेंद्र की बेटी भाग गई जाने किसके साथ ये खबर आग की तरह फैल चुकी थी और शाम तक नरेंद्र भी घर आ रहे थे वापस। रिश्तेदारों ने अपनी-अपनी बेटियों की शादी कराने का फैसला ले लिया था कि खानदान की इस बदनामी के बाद शायद अब और खतरा मोल नहीं ले सकते थे। पुलिस में शिकायत देने के बाद उन्होंने कहा चौबीस घंटों के बाद ही वो कुछ बोलेंगे साथ ही मंजू को ताने भी दिये कि लड़की संभाली नहीं अब हमारा सर खा रही है। नरेंद्र आ चुके थे। मंजू उसे देखते ही फूट-फूट कर रोने लगी।

“मुझे माफ़ कर दो नरेंद्र। मैं एक अच्छी माँ नहीं बन पाई, ना ही बेटी को अच्छे संस्कार दे पाई, जिसके वजह से आज पूरे खानदान का सर नीचे हो गया है”

“तुम्हारी कोई गलती नहीं मंजू!”

नरेंद्र के ऐसा कहते ही मांजी फूट पड़ी। “अच्छा तो किसकी गलती है? ख़बरदार जो इस कुलक्षणी की बातों में आया। वो लड़की इस घर में वापस नहीं आएगी। शौक से खोजों तुम लोग, मेरी बात हुई है गांव के मुख्य लोगों ने भी कहा उसे जान से मार डालना, नहीं तो ऐसी लड़किया वापस भाग जाती है।”
नरेंद्र जानता था माँ से बहस कर कोई मतलब नहीं है।
” मंजू! राधा फोन पर किससे बात करती थी कुछ पता चला? कोई लड़के का चक्कर? ”
” पता नहीं जी, मोनू से पूछती हूं ”
मंजू ने मोनू अपने बड़े बेटे को बुला कर पूछा। वैसे फोन उसका कल से बंद ही था।
“दीदी हमेशा आगरा मथुरा जाने कहाँ बात करती थी।”
मोनू की बात से नरेंद्र को यकीन हुआ कि शायद रास लीला वालों को कुछ ख़बर हो कि वो आगरा मथुरा किससे बात करती थी। पूछने पर पता चला कि राधा तो मथुरा के लिए निकली है। और उसने वहाँ बोला कि वो घर वालों को बोल कर आ रही है नृत्य अकादमी में एडमिशन ले कर डांस सीखने फिर रासलीला से भी जुड़ना चाहती है। नरेंद्र ने बहुत फटकार लगाई उन्हें की आपने घर वालों को बताया भी नहीं, जिसका कारण उन्होंने कहा कि सपंर्क साधना चाहते थे अब।
खैर सुकून ये था कि राधा का पता चल गया और नरेंद्र निकल गया उसे लेने। पर मंजू के दिल में वही घबराहट की शायद गांव वाले जान ले लेंगे। जब नरेंद्र वापस आए तो तय था कि राधा से कोई गुस्से में बात नहीं करेगा।
नरेंद ने माँ को बुला कर कहा “माँ गलती मंजू की नहीं मेरी थी! मुझे बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए सिर्फ पैसा नहीं उन्हें शिक्षा के साथ-साथ अपने सपने पूरे करने की भी छूट देनी चाहिए थी। आप चिंता ना करे गांव में रहकर अब हम आपके खानदान का नाम नीचे नहीं करेंगे। मैं जा रहा हूं अपने परिवार को इस जगह से दूर लेके जहां सपने देखने की कीमत जान देकर ना चुकानी पड़े।”
मंजू अविरल बहते आंसुओ के साथ अंधेरा छंट नई सुबह होते देख रही थी।

 

 

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