Phone No.: +917905624735,+919794717099

Email: support@kalamanthan.in

Home Writing Contest Hindi Story रिश्ते पूर्ण या आंशिक

रिश्ते पूर्ण या आंशिक

 

संगीता अपने गायन कक्षा के फॉर्म को देख रही थी।
उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे ।विवेक ने उसे क्लास ज्वाइन करने के लिए मना कर दिया था ।
कहने लगा “उसकी इतनी इनकम नहीं है कि वह दो बच्चों को पाले ,पूरा घर चलाएं ।तुम्हारे बेकार के शौक के लिए मेरे पास पैसे नहीं है।”
संगीता को लगा उसने अपना पूरा जीवन ही हार दिया है। उसका इतने सालों का किया धरा सब उसे बेमानी लगने लगा। उसने तो विवेक को हर तरह से अपना लिया ,पर विवेक उसे उस तरह से नहीं अपना पाया था ।
संगीता को वह पल याद आने लगे । कब और कैसे ,उसने घर और बच्चों के लिए अपने 20 साल कुर्बान कर दिए। जो कुछ भी उसके पास था ,उसने विवेक को दे दिया था ।तन मन धन से इस घर को अपना लिया। उसनेे अपने जेवर तक विवेक को दे दिए थे ,जो उसने गिरवी रखकर ,बिजनेस के लिए पैसा उठाया था ।
संगीता की शादी कम उम्र में हो गई थी। बचपन से ही उसे गायन का बहुत शौक था। पिता नहीं थे। मां ने उसे अकेले पाल पोस कर बड़ा किया था। पैसों की कमी के चलते वह अपना शौक पूरा कर नहीं कर पाई थी। पर वह अच्छी पढ़ी लिखी थी।शादी के एक साल तक उसने जॉब किया। परंतु बेटी के होने के बाद, परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ने लगा, तो उसने जॉब छोड़ दिया ।
विवेक शांत और सुशील था ।हर तरह से संगीता का ध्यान रखता था। 20 साल कब निकल गए पता ही नहीं चला ।इस बीच संगीता ने हर तरह से परिवार का ध्यान रखा। उसके माता-पिता की खूब सेवा की। बच्चों को भी अच्छी तरह से पाला। जीवन के हर की ऊंच नीच में उसका साथ दिया । सब तरह से खुश थी।
एक सप्ताह पहले उसने एक विज्ञापन देखा । उसमें गायन क्लासेस के बारे में लिखा था ।वह रह नहीं पाई । अपना पुराना शौक उसे याद आ गया। वह अब अपने लिए जीना चाहती थी । अपने पुराने शौक को पूरा करना चाहती थी ।
वह फार्म ले आई । उसे पूरा यकीन था कि विवेक उसका साथ देगा ।
परन्तु यह क्या ? फॉर्म देखते ही विवेक आग बबूला हो गया ।
“तुम यह कैसे कर सकती हो ? तुम घर से बाहर नहीं जा सकती। तुम्हारे ऊपर अभी बहुत जिम्मेदारियां हैं ,और ना ही मेरे पास तुम्हारे बेकार के शौक के लिए पैसे है।”
विवेक कि इन सब बातों ने संगीता को तोड़ कर रख दिया। उसने पहली बार अपने लिए विवेक से कुछ मांगा था। वह भी उसने मना कर दिया ।
वह सोचने लगी, विवाह क्या है? यह कैसा रिश्ता है?
उसे सब रिश्ते खोखले महसूस होने लगे। उसने विवेक के सपनों को अपना सपना समझ कर जिया था। बिजनेस में आगे बढ़ने के लिए उसमें विवेक का हर प्रकार साथ दिया। पूरी तरह से घर परिवार की जिम्मेदारी अकेले उठाई थी। हर उतार चढ़ाव में उसने पूर्ण रूप से विवेक का साथ दिया था।
हर दुआ में विवेक की खुशी होती थी ,फिर भी आज विवेक ने उसकी खुशी को पूरा नहीं किया। जबकि वह आज मजबूत स्थिति में था ।
उसे यह सवाल कचोटता रहा कि “मेरी खुशी विवेक की खुशी क्यों नहीं बन पायी ?”

 

 

 

 

Read more from the Author

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

आंखो की नमी से बहता काजल

आंखो की नमी से, बहता काजल देखा है कभी ,दर्द का बादल !! काजल के बहने से, होती वो हल चल सासो के सिसकियां में , बदल...

चिड़िया

  मत कैद करों चिड़ियों को जाने दो जहाँ जाना है ! उड़ने दो इस आसमान मे उनको भी पंख पसारना है!!१!! उनको इस आसमान में अपनी पहचान बनाना है...

इंग्लिश वाली पर्ची

"अरे सुधा कहाँ हो ,जरा एक कप चाय पिला दो" राकेश जी ने अपनी पत्नी को आवाज दी..सुधा जी उम्र करीब 45 साल,केवल 8वीं तक...

राधे तेरी बन्सी और बृज की छाँव

राधे ,कहाँ गयी तेरी बन्सी और बृज की वो छाँव न रहा वो मिट्टी का अपनापन और गऊओं से लगाव अब नहीं आऊगा तेरे  गॉंव वो पुष्पों...

Recent Comments