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गण देवता

बहुत पहले किसी समय किसी नगर में जब भी किसी हाथी ने भोजन की खातिर अपना सूंड फैलाया। वहां के नागरिक अपने सामर्थ्य अनुरूप भोजन उसे देता (यही प्रवृत्ति मानव को देवता रूप प्रदान करता है)।
पर एक दिन एक मनुष्य के बच्चे को शरारत सूझी, उसने भोजन के लिए पास आये हाथी के सूंड में सुई चुभो दी। हाथी दर्द से कराह उठा पर कुछ न कहा चला गया। थोड़ी देर बाद नदी से लौटते हुए अपने सूंड में भरे गन्दे पानी को दर्जी के दुकान में छिड़क कर बदला लिया।
इतनी ही कहानी सुना पाई थी कि अपने सूंड के ज़ख्म के दर्द से मादा हाथी की चीख निकलने को थी परंतु वह ऐसा कर अपने पेट में पल रहे बच्चे को अपने दर्द से अवगत नहीं होने देना चाहती थी। चुप चाप नदीं में खड़े हो अपने दर्द को पीती रही। पर अधीर बच्चा बार बार पूछता-फिर क्या हुआ?
“फिर !” मादा हाथी ने अपने पर काबू रखते हुए बात को जारी रखा।
फिर, उस हाथी की पेशी हाथी समाज की अदालत में हुई। वहां पहुँचे सभी हाथियों ने एक सुर में कहा- इस हाथी ने अशोभनीय कृत्य किया है। इसे बहिष्कृत करना ही श्रेय है। और उसे समाज से निकाल देते हैं। आगे हाथी से कुछ भी कहना कठिन हो रहा था। उधर बच्चे की उत्तेजना भी बढ़ रही थी। उसके हिलने से प्रसव पीड़ा भी अधिक होने लगी।
“पर उसने तो सबक सीखने के लिए ही ऐसा किया था। सही किया था न उसने? बोलो … बोलो न?”, बच्चा उत्तेजित हो गया था। पर माँ की कोई आवाज़ न पाकर उसे समझते देर न लगी कि जो धमाका उसने सुना था माँ उसी से घायल हो गई है। अब वो इसका जिम्मेवार खुद को मानने लगा है।
“माँ बहुत पीड़ा हो रही है? ये सब मेरी वजह से हुआ है। सिर्फ मेरी वजह से। न मझें भू लगती। न मैं तुमसे कहता। न तुम बाज़ार जाती। न वो तुम्हें पीड़ा पहुंचाते।”
दर्द इतनी अधिक होने लगी थी कि मादा हाथी अपने बच्चे को कह भी नहीं पा रही थी कि बच्चे इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं। मन की बात मन मे ही घोट लिया उसने। थोड़ी देर की खामोशी उस नदी को और शांत होने में मदद दे रही थी। जिसके आश्रय में दोनों हाथी आश्रित थे। पर बच्चा उस खामोशी को ज्यादा देर रहने नहीं दिया। देता भी कैसे उसकी माँ जख्मी थी। जख्म देने वालों के प्रति प्रतिहिंसा हिलोरें ले रही थी।
उसने पूछा “अम्मा हम यहां, इस नदी में और कब तक रहेंगे। नदी कितनी गंदी है। कितनी बदबूदार। माँ तुम इस गंदे पानी को अपने सूंड में भर लो, एक साथ.. बहुत सारा! हम जाकर उस मनुष्य के बच्चे को सबक सीखाएं।
“नहीं”, मादा हाथी के मुंह से ये शब्द न जाने कैसे निकल पड़े। अचानक निकले शब्द की हनक से बच्चा सहम गया। खामोश भी।
“प्रतिशोध – ये पशुओं का स्वभाव नहीं, मनुष्यों की फितरत है। वैसे इस नदी तक मैं भी उस प्रतिशोध की अग्नि को उसी प्रकार बुझाने आई थी। परंतु मैं अपने समाज से बहिष्कृत नहीं होना चाहती।”, अब आगे कुछ भी कहना सम्भव नहीं हो पा रहा था मादा हाथी से। उसे अपनी मृत्यु सामने दिख रही थी। फिरभी उसने बात जारी रखनी चाही।
“मेरे बच्चे अगर मुझे कुछ हो गया तो वो ही तुम्हारी देखभाल करेंगे”अब शब्द अपूर्ण से बाहर आने लगे ,”वो .. ही.. तुम … हारी …रक्षा … “,मादा हाथी ठहर गई थी। देह तो पहले ही नदी में आकर ठहरी थी अब जबान और सांस भी।
कुछ देर की खामोशी से बच्चे को कुछ खटका। उसने धीरे से पुकारा,” माँ .. कोई उत्तर न पाकर .. एक बार कुछ तेज बोला .. माँ नाराज़ हो? … अच्छा ऐसे अब नहीं …. माँ बोलो न?”, इतने में उसे कुछ अजीब लगने लगा।
ध्यान देने पर पाया कि उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। पर कुछ देर चुप रहना और सहना ही मुनासिब समझा। वो अपनी वजह से माँ को और तकलीफ नहीं देना चाहता था।
पर विधि को कुछ और ही मंजूर है। उसके सहनशीलता का बांध तोड़ ही दिया। उसे बोलने को बाध्य ही होना पड़ा और उसने धीरे से कहा
“माँ मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है अब और … माँ सुनो न मुझे .. मेरी … साँस।”
दो ज़िंदगियाँ एक ख़ामोशी।

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