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तस्वीर की प्रेम कथा

ये कहानी है प्रतिमा की।
प्रतिमा , ठाकुर खानदान की बेटी थी।

प्रतिमा की परवरिश इस तरह हुई जैसे सोने के पिंजरे में कैद चिड़िया।

इसका कारण ये था कि ठाकुरों के कुलगुरु ने कई साल पहले भविष्यवाणी की थी कि , ‘कुल में कोई एक बेटी जन्म लेगी , जिसका विवाह ठाकुरों की मर्जी के खिलाफ यानी कि प्रेम विवाह होगा।

ठाकुरों को ये कतई रास न आया। इसीलिए, अब ये उपाय निकाला गया कि खानदान में पैदा होने वाली हर बेटी का सामना किसी बाहरी मर्द से होगा ही नही। जब किसी पराय मर्द पर नजर नही पड़ेगी, मिलना नही होगा तो किसी के साथ प्रेम में पड़ने का कोई मौका ही नही मिलेगा , ठाकुरों की बेटियों को।
बड़े ठाकुर की बेटी माला, जो कि प्रतिमा की चचेरी बहन थी, उसे भी महल में ही शिक्षा दी गई और अंत मे बीस साल की होने पर माला का विवाह करवाकर उसे और उसके वर को वही महल में रखा गया घर जमाई बनाकर।
माला ने तो कभी ठाकुरों की इस बंदिश पर कोई सवाल खड़ा न किया।अपने पति के साथ अपने मायके में ही रहकर माला बड़ी खुश थी लेकिन प्रतिमा, एक आजाद ज़िन्दगी जीना चाहती थी। प्रतिमा ने बचपन मे ही जब महल के बाहर स्कूल जाने की इच्छा जताई तो नियम और कड़े कर दिए गए।  जैसे जैसे प्रतिमा जवान हो रही थी महल के नियम कायदे उतने ही कठिन कर दिए गए। प्रतिमा की खूबसूरती भी देखते ही बनती थी।

सुर्ख लाल होंठ, गोरा रंग, लंबे काले बालो से बनी चोटी और उस पर कमाल का यौवन। प्रतिमा की उम्र के साथ साथ महल की दीवारें भी बढ़ा दी गई।

खिड़कियों  , रौशनदान के बाहर पेड़ो की लताओं के घने पर्दे लगा दिए गए। महल के दरवाजे इतने विशाल और भारी, कि एक या दो इंसानों के बस का नही था उन्हें खोलना।
प्रतिमा ने सत्रह बरस तो बिता लिए थे इस क़ैद में, आज प्रतिमा की अठारहवीं सालगिरह है। मंझले ठाकुर अपनी बेटी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने , हाथ मे उसकी मनपसंद जलेबियां लिए कमरे में आते है,
“क्या हुआ बेटी , आज तो तुम्हारी सालगिरह है आज उदास क्यूँ हो! ये देखो हम तुम्हारी मनपसंद जलेबियां लाये है।”
“पिता जी, हम खुशनसीब है कि आप हमें पिता के रूप में मिले है। आपने हमारी हर फ़रमाइश को पूरा किया है। मगर, हम बहुत अधूरा महसूस करते है अपने आप को। हमें लगता है कि हम बनावटी जीवन जी रहे है। असली दुनिया, असली खूबसूरती, वो तो हम कभी देख ही नही पाये।”
“क्या कहना चाहती हो बेटी!” ठाकुर साहब ने पूछा।
“हम बाहर की दुनिया देखना चाहते है, हम देखना चाहते है कि इस महल के दरवाजे के बाहर की धरती कैसी है। आसमान कैसा है, कितने तरीके के फूल और पंछी है इस दुनिया मे ….हम उन सब को देखना चाहते है, कुछ नया गीत गुनगुनाना चाहते है, कुछ तस्वीर गढ़ना चाहते है इस प्रकृति की खूबसूरती की।”
मंझले ठाकुर साहब , दिल से कोमल थे। अपनी बेटी की इस इच्छा को समझ रहे थे और पूरा भी करना चाहते थे लेकिन बड़े ठाकुर की सख्ती से डरते थे । मगर फिर भी , प्रतिमा के जन्मदिन पर उसे इनकार न करते हुए उन्होंने बड़े ठाकुर से बात करने का वचन दिया।
बड़े ठाकुर स्वभाव से बहुत सख्त थे पहले तो उन्होंने प्रतिमा की इस इच्छा को दबा दिया लेकिन, प्रतिमा द्वारा बार बार जिद किये जाने पर उसे महल के अंदर ही अपने चित्रकारी सीखने के शौक को पूरा करने की इजाजत दी गई। बड़े ठाकुर ने एक ऐसे चित्रकार की खोज शुरू की , जो चित्रकारी में अव्वल हो। अब उन्हें छवि कुमार नाम का एक चित्रकार भी मिल गया । छवि कुमार, दुनिया के किसी भी जीव का, चित्र बना सकता था।
अपनी कल्पनाओं और हुनर पर इतनी अच्छी पकड़ थी छवि कुमार की, जो बिना देखे भी एक खूबसूरत कृति गढ़ सकता था।प्रतिमा को चित्रकारी सिखाने के लिए छवि कुमार को चुना गया लेकिन ये सुनिश्चित किया गया कि प्रतिमा किसी भी तरीके से छवि कुमार को देख न सके।
महल के अभ्यास कक्ष में चित्रकारी सीखने के इंतजाम किए गए।
कक्ष के बीचोंबीच, एक विशाल पर्दा लगाया गया जिसके एक तरफ छवि कुमार चित्र गढ़ सकता और पर्दे के दूजे तरफ , ऐसे व्यवस्था की गई कि प्रतिमा की पीठ पर्दे की तरफ और निगाहे, सामने दीवार की तरफ लगे बड़े शीशे पर हो। उस शीशे को इस तरफ लगाया गया कि, पर्दे के इस तरफ छवि कुमार द्वारा गढ़े जा रहे चित्र का अक्स उस शीशे पर पड़े जिससे कि प्रतिमा सिर्फ उस चित्र को ही देख पाए और चित्रकारी सीख पाए। इस तरह एक दूजे की तरफ पीठ करे हुए प्रतिमा और छवि एक दूजे को देख न पाएं।
मगर कहते है न , प्यार , इश्क़ ,मोह्हबत को किसी शक्ल ,नजर या आकार की जरूरत नही , प्यार तो आँख बन्द करके किसी की भी तस्वीर को मन मे उतार लेता है
प्रतिमा के साथ भी यही हुआ। प्रतिमा ने छवि को कभी नही देखा लेकिन उसकी चित्रकला से इतनी प्रभावित हुई कि उसे उस कलाकार की कला से प्रेम होने लगा। छवि कुमार , प्रत्येक दिन एक नया चित्र बनाता जिसमे की कुदरत की खूबसूरती , ममता, प्रेम, त्याग , भक्ति, और जाने कितने ही भावनाओ को उतार देता मानो जैसे ये चित्र अभी बोल पड़ेगा। और प्रतिमा भी , उन चित्रों को देख उनमे खो सी जाती।
अभ्यास करते करते प्रतिमा को छवि की अनुपस्थिति में भी उसकी खुशबू का एहसास होता। प्रतिमा रात रात भर जागकर छवि द्वारा बनाये गए चित्र का अभ्यास करती, उन्हें चूमती और गले लगाती। प्रतिमा की चचेरी बहन माला ये सब देख समझ रही थी कि प्रतिमा ,प्रेम की राह पर है मगर, माला ने सोचा कि कहाँ ये प्रेम मुक़्क़म्मल हो पायेगा और यदि प्रतिमा ने हठ भी किया तो बड़े ठाकुर उसे मार डालेंगे जिससे कि खानदान की इकलौती बेटी रह जायेगी माला।
ऐसे में उसके घर जमाई पति और माला के लिए जायदाद पाने का रास्ता साफ हो जाएगा। माला ने किसी को इस बात की भनक न होने दी और यहाँ प्रतिमा, दिन ब दिन छवि की चित्रकारी और कला की तरफ आकर्षित होती जा रही थी। अब प्रतिमा के मन मे ये सवाल आया कि जब चित्रकारी इतनी भव्य है तो चित्रकार स्वयं कितना प्यारा होगा! इसी सोच के चलते प्रतिमा ने छवि को देखना चाहा, लेकिन ठाकुर साहब के लगाए गए पहरे और निगरानी में , एक पर्दे भर की दूरी को तय करना प्रतिमा के लिए मुश्किल था।

ऐसे में प्रतिमा ने पर्दे के पास निगरानी देने वाले निगेहबानो के हाथ सन्देश भिजवाया कि आज वह एक ऐसा चित्र बनाना सीखना चाहती है जिसमे पिंजरे में क़ैद चिड़िया को पिंजरे बनाने वाले की खुशबू से प्रेम हो।

छवि कुमार ने जब यह संदेश सुना तो , समझ चुका था कि प्रतिमा क्या कहना चाहती है! छवि कुमार चित्र बनाने लगा, पर्दे के दूसरी तरफ मुँह फेरे बैठी प्रतिमा सामने के शीशे में चित्र को बनते देखने लगी। जितने प्रेम और समर्पण से छवि कुमार अपनी कला को अंजाम दे रहा था उतने ही उत्साह और अधिक उत्साह के साथ प्रतिमा शीशे पर अपनी नजर लगाए बैठी थी। चित्र पूरा होने को आया कि प्रतिमा के पैरों तले जमीन खिसक गई हो जैसे।
छवि कुमार ने चित्र में सब बनाया पिंजरा, पिंजरे में क़ैद बेहद नाजुक और खूबसूरत चिड़िया और पिंजरा बनाने वाला इंसान भी लेकिन अंत मे उस पिंजरा बनाने वाले के हाथ काट दिए गए। किसी खूबसूरत चित्र से बयां करने वाली ऐसी दुखद कहानी में छिपे सन्देश को प्रतिमा ने पढ़ लिया। आज अभ्यास कक्ष से छवि कुमार के जाने के बाद जब प्रतिमा ने अपनी बहन माला को बातों बातों में टटोलकर देखा तो उसे कड़वी सच्चाई मालूम हुई।
दरअसल, बड़े ठाकुर साहब ने छवि कुमार की गरीबी और मजबूरी के चलते उसका फायदा उठाया जिसमे एक शर्त थी कि, छवि कुमार को उनके द्वारा सिखाई जाने वाली चित्रकारी की  मुँहमाँगी कीमत दी जाएगी लेकिन बदले में छवि कुमार को अंधा होना होगा, अपनी आँखों की रोशनी खो देनी होगी ताकि वो प्रतिमा की परछाई भी न देख पाये।  छवि कुमार ने अपने बूढ़े माँ बाप और बहनों को सुखी जीवन देने की चाह के चलते अपनी आँखों को कुर्बान कर दिया। अब ये छवि कुमार का सच्चा हुनर था कि वे बिन देखे भी कोई चित्र बना लेते।
जब प्रतिमा को ये बात मालूम हुई तो उसे बहुत दुख हुआ । उसे लगने लगा कि छवि कुमार के इस हालत के लिये शायद वही जिम्मेदार है। प्रतिमा ने आँसू बहाते हुए एक तस्वीर बनाई जिसमे , प्रतिमा ने स्वयं को छवि कुमार के चित्रों के साथ अग्नि में जला डाला। ये प्रतिमा की आख़री तस्वीर थी। अगली सुबह, प्रतिमा ने अपनी आँखें कभी न खोली ,वह अपनी जान दे चुकी थी।

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