Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Stories गिल्ली-डंडा

गिल्ली-डंडा

चित्रलेखा घर की दीवार से ईंट जैसे चिपकी हुयी खड़ी थी, मानो जमीन में नींव की गहरायी माप रही हो। एकदम शांत….! एकदम गम्भीर….!! हाँ, मन के भीतर उठे सैलाब की उथल-पुथल आँखों में जरूर झलक रही थी। अपने भीतर मचे इस कोलाहल को सबसे छिपा सके, इसीलिये वह पलकें झुकाये अपने आँखो के आईने को कैद किये खड़ी थी।
विद्यालय के महिला क्रिकेट टीम में चयनित होने की जो क्षणिक खुशी उसे मिली, वह अभिभावक की प्रतिक्रिया के साथ ही नदारत हो गयी। वह अपने परिवार को अब तक विकासोन्मुखी और महिलाओं के प्रति आधुनिक विचारधारा से प्रेरित मानती थी। लेकिन यहाँ तो कोई उसकी इस उपलब्धि पर बधाई तक नहीं दे रहा। सबके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ रही है कि घर की बेटी खिलाड़ी कैसै बन सकती है ?
“कल ही स्कूल जाकर साफ मना कर दो। स्कूल पढ़ने केलिये जाती हो, गिल्ली-डंडा ही खेलना होता तो घर पर ही रह लेती।” …… पिता ने साफ-साफ शब्दों में चित्रलेखा को खेलने से मना कर दिया।
“पापा गिल्ली-डंडा नहीं है…. क्रिकेट है! आगे चल कर बहुत स्कोप है इसमें”।…….
“क्या स्कोप है …. हाँ…. क्या स्कोप है…??” पिता ने लेखा की बात बीच में काटते हुये तल्ख़ स्वर में कहा। “कौन सी महिला को क्रिकेट खेलते देखा है? अरे ये मर्दों का खेल है। उछलना-कूदना, भगना-दौड़ना पड़ता है। स्टेमिना और एनर्जी का खेल है। ऐसा नहीं कि कोई भी ऐड़ा-गैड़ा बल्ला उठा ले। कपिल, गवास्कर, सचिन, धोनी, विराट….. मर्द हैं कि नहीं सारे के सारे। इनमें महिला कौन है बताओ तो भला…?” पिता ने एक हाथ कमर पर रख दूरसे को सवाल की मुद्रा में हिलाते हुये पूछा।
“पापा मिताली राज….. महिला क्रिकेट टीम की कप्तान, हरमनप्रीत कौर, झूलन गोस्वामी….. पापा हमारी महिला क्रिकेट टीम वल्ड कप के फाईनल तक पहुँची है। देश और दुनिया में इनका भी खूब सम्मान है। और तो और हमारे स्कूल की स्पोर्ट टीचर भी महिला ही हैं। वो कहती हैं कि लड़किया खेलेगी तभी तो खिलाड़ी बनेंगी।”
“अच्छा तो अब गेंद और बल्ला लेकर गली में छौड़न के जैसे भागेंगी छोकड़ियां…. वैसे ही आते-जाते गली-मुहल्ले के बदमाश सीटी बजा-बजा कर क्या कम छेड़ते हैं लड़कियों को। हर दूसरे दिन मुँह लटकाये घर आती है। और जब लड़कों के कपड़े पहन कर उछल-कूद मचायेगी तो बदमाशों की सेना बरामदे तक न आ जायेगी? बहुत देर से सुन रही हूँ तुम सबकी जिरह।

अरे मैं तो कहती हूँ स्कूल ही जाने की क्या जरूरत है भला? नाम लिखना सीख गयी, चिट्ठी-पतरी पढ़-समझ लेती है। अब घर का काम काज सीखे, माँ का हाथ बँटायेगी तो ही ससुराल में सम्मान पायेगी। ये पढ़ना-लिखना और बल्ला घुमाना काम न आयेगा।”

दादी ने मनके पर राम नाम फेरना रोक कर मध्यस्थता करते हुए अपने अनुभव का सार उड़ेल कर चित्रलेखा के उम्मीद की चिंगारी को बुझाने की कोशिश की। चित्रलेखा जानती थी कि उसने जो “अनहोनी” करने की ठानी है, उसे रोकने केलिए आँधी-तूफान, सैलाब सब आएंगे। इसलिए उसने अपने सपने को इरादे के मजबूत किले में संभाल लिया था।
“दादी वो हमें छेड़ते हैं फिर भी कोई उन्हें तो रोकता नहीं, उलटे आप हमही पर पाबंदीयां लगा लो। ये क्यूँ नहीं समझती कि खेलने से सम्मान मिलेगा…. हमें हमारे नाम की पहचान मिलेगी।” लेखा घुटनों के बल बैठते हुए दादी के दोनों कंधों पर अपने हाथ रख बोली।
“लेखा बेटा तुम्हें तुम्हारी पहचान बनाने से कौन रोक रहा है? हम खुद भी यही चाहते हैं कि तुम अच्छी शिक्षा हासिल करो, आत्मनिर्भर बनो। लेकिन इसके लिये क्रिकेट खेलने की जरूरत नहीं है। अपनी दीदी की तरह संगीत सीखो, सिलाई-बुनाई सीखो। बरी होकर शिक्षिका बनो, ब्यूटी पार्लर खोलो, बुटीक चलाओ या बैंकर भी बन सकती हो।महिलाओं केलिये जो राह उचित है उसपर चलने से हमने कब रोका है तुम्हें? लेकिन ये खेल-कूद की लाईन लडकियों केलिये नहीं है।” पिता ने चित्रलेखा को समझाया और कहा कि कल ही स्कूल में क्रिकेट टीम में शामिल होने से मना कर दे।
बेटी और पती की बातें चुपचाप सुन रही माँ के अंतः में भी बेटी की इक्षाओं को लेकर द्वंद्व चल रहा था; लेकिन आदर्श पत्नी के धर्म को उसने अब तक इतनी तल्लीनता से निभाया था कि पति के किसी “हाँ ” या “ना” को नकारने का ख़याल तक कभी ज़ेहन में न आया। आज चित्रलेखा के पक्ष में उसके मन से समर्थन की चीखें निकल रही थीं, लेकिन मर्यादा की दीवार से टकराकर वह स्वर जुबां तक न आ सकी।
देर रात तक माँ अपनी बेटी के बिखरते सपने के बोझ तले करवटें बदलती रही। फिर सोचा कि वह स्वयं चित्रलेखा को फुसला आये। लड़की भले कुछ अन्याथा न चाह रही हो, लेकिन पिता की बात मान लेगी तो घर-परिवार में शांति बनी रहेगी। हिम्मत जुटा कर बेटी के कमरे में गयी। लेखा भी आज कहाँ सो पाती। वह बिस्तर पर परी गहन सोच में डूबी थी।
माँ ने उसे पुचकारा और कहा….. “क्या हुआ जो एक सपना छूट गया, सुन्दर भविष्य केलिये कोई और सपना भी तो देखा जा सकता है।” हमारे घर की लड़कियाँ खेल-कूद, फैशन, फिल्म इन सब क्षेत्रों में भविष्य नहीं बनाती। अपने परिवार की मर्यादा का ख़याल रखना गलत तो नहीं है न….?
लेकिन मैं कौन से मर्यादा से परे कुछ चाह रही हूँ माँ! ये कोई मर्यादा है या हमारी विकृत सोच? क्या अब समय नहीं है कि हम इन विकारों से निजात पायें? माँ, शायद ऐसे ही रात के सन्नाटे में तुमने दीदी को भी अपने सपने ठुकरा कर शादी केलिये मनाया होगा। लेकिन तुम भी जानती हो कि यह सही नहीं है।
लेखा का आहत मन रो रहा था, सो रुंधे गले को साफ करते हुये उसने कहा….. मैंने अब तक यही पढ़ा और सुना कि लड़के और लड़की में कोई भेद नहीं। अवसर मिले तो एक लड़की वह सब कुछ कर सकती है जिसके लिये केवल लड़के को ही योग्य समझा जाता है। कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, इन्दिरा गांधी, लता मंगेशकर, पी.टी.उषा, मेरी कौम……. सबने तो साबित कर दिया है कि हमें केवल मौका चाहिये, बंदिश नहीं।
फिर भी क्यों ये रूढ़ियां हमारा पीछा नहीं छोड़ती…. ? क्यों बार-बार हमें अपने सपनों को जीने की भी काबिलियत साबित करनी होती है? माँ..!! मैं नहीं जानती क्रिकेट में मेरा भविष्य क्या है…. कितना है, लेकिन इतना जरूर जानती हूँ, कि इस खेल को खेलने की मुझमें पूरी क्षमता है, और यही मेरा सपना भी है। पापा ने हमें बेटी होने के कारण कभी भैया से कम प्यार नहीं किया। अच्छे स्कूल में पढ़ाया-लिखाया। हमने जब जो चाहा सब दिया। फिर हमें हमारे करियर को चुनने का हक़ क्यों नहीं दिया? दीदी आगे पढ़ना चाहती थीं, सिविल सर्विसेज की परीक्षा देना चाहती थी, लेकिन सबको लगा कि लड़की की शादी उसके करियर से ज्यादा जरूरी है। शादी के बाद यदि पति की इक्षा हो, तो जो चाहे कर लेना; इसी सबक के साथ इन्हें विदा कर दिया। और उनके सपने का क्या हुआ? घर-बच्चे सम्भालते हुये आज स्कूल में पढ़ा कर खुद को संतोष देने में लगी है।

माँ तुमने खुद स्त्री होकर न जाने कितनी बार अपने इक्षाओं की तिलांजलि दी होगी। क्या तुम सचमें मेरे काबिलियत को बेजा मानती हो? क्या तुम भी मेरे साथ नहीं?

चित्रलेखा के सब्र का बाँध टूट चुका था। वह माँ से लिपट कर फफक कर रो परी। अब तक अधीर हो चुकी माँ ने जोर से उसका आलिंग किया। नौ माह गर्भ में रख कर उसे दुनिया की हर बलाओं से बचाया था। बेटा या बेटी नहीं बस संतान मानकर पोषित किया। लेकिन गोद में आते ही जब पता चला बेटी हुयी है, तो कैसे स्वतः ही परवरिश में धीरे-धीरे फर्क आता गया?
माँ ने मन ही मन कहा तू मेरी संतान है, और तुम्हारा अधिकार दिलाने केलिये मैं भी तुम्हारे साथ संघर्ष करुंगी। लेखा के माथे पर हाथ फेरते हुये माँ ने कहा….. “आँसू पोछ और बेफिक्र होकर सो जा। आखिर इन आँखों को सुंदर सपने भी तो देखने हैं। कल मैं पापा से बात करूंगी। अच्छा सोचो सब अच्छा ही होगा।”
“सच माँ….. क्या तुम सच में पापा से मेरे लिये बात करोगी…?” लेखा ने आँसू पोछते हुये पूछा….. माँ ने सहमति में सर हिलाया। लेखा के चेहरे पर खुशी के रंग तैरने लगे, जैसे उसे उसके सपने की दुनिया बस मिल ही गयी। माँ होती ही है ऐसी, एक बार सर पर हाथ रख दे तो हर दुख छू मंतर हो जाता है।
अगली सुबह चित्रलेखा समय से पहले जाग कर उतावली सी पूरे घर में घूमे जा रही थी। माँ क्या कहेगी पापा से, उन्हें कैसे मनायेगी…. पापा मानेंगे भी या नहीं…. हजार सवाल और जवाब का कोई पता नहीं।
कुछ ही देर में पापा नाश्ते के टेबल पर आये। लेखा कभी माँ को तो कभी पापा को देखती, कि कोई तो प्रतिक्रिया मिले। पसरे खामोशी के बीच ही सबने नाश्ता पूरा किया। लेखा रुआंसी हो स्कूल बैग उठाने लगी। वह जान चुकी थी आज उसे अपने सपने को खुद ही ठोकर मारना है। वह दरवाजे की और जाने लगी, तभी पापा ने आवाज दिया….. “अच्छा लेखा! क्रिकेट का मैच कब से है तुम्हारा? अच्छे से प्रैक्टिस करना और हाँ इस सब में पढ़ाई से कोई समझौता नहीं होनी चाहिए।”
“क्या… क… क्या…. क्रिकेट मैच… वो… वो तो अगले महीने के पांच तारीख से है। तो क्या मैं खेलूंगी टीम में? आप… आप इजाजत दे रहे हैं न पापा”….. चित्रलेखा अचम्भित हो कहे जा रही थी।
“हाँ लेखा…. मेरी इजाजत है। तुम्हारी माँ ने मना ही लिया मुझे। उसने आज तक मुझसे कुछ नहीं माँगा। और न ही कभी मेरी बात काटी। लेकिन आज तुम्हारे लिये मुझसे तुम्हारे सपने की जिद कर बैठी, और मैं मना न कर सका। अब तुम्हारी बारी है कि तुम साबित करके दिखाओ कि तुम्हारे लिये लिया गया हमारा फैसला कितना सही है। “
“पापा मैं आपको और माँ को कभी निराश नहीं करुंगी। पढ़ाई और खेल दोनों में जी जान से मेहनत करुंगी।” लेखा की आँखों से कुछ बूँद आँसू छलक कर उसके काजल को बहाने लगे, शायद काला टीका लगा थे उसे…..उसके सपनों को…. उसकी खुशियों को।
महीने बाद चित्रलेखा के स्कूल की टीम जिला स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंट में विजयी हुयी। चित्रलेखा ने अपने कुशल बाॅलिंग और फील्डिंग से इस विजय में महत्वपूर्ण योगदान दिया। चित्रलेखा अगले दिन के क्षेत्रीय अखबारों की सुर्खी में थी। दादी ने अखबार के पन्ने में पोती को देखा तो खुशी से झूम उठी। बार-बार अपनी दौहित्री की बलैया ले रही थीं।
आते जाते हर किसी को अखबार दिखा कर बताती….”ये चित्रलेखा है, मेरी पोती है ये”। पूरा मुहल्ला आज चित्रलेखा के पिता को बधाई और शुभकामना दे रहा था। सब कह रहे थे….. हर घर में चित्रलेखा जैसी बेटी होनी चाहिये और हर बेटी को आप जैसा पिता मिलना चाहिये।
चित्रलेखा के पिता ने अपने गीली पलकों को पोछते हुये कहा….. “नहीं भाई… चित्रलेखा जैसी बेटी जरूर हर घर में होनी चाहिये, लेकिन मेरे जैसा पिता नहीं होना चाहिये। मैंने तो लेखा को बेटी जानकर खेल-कूद से दूर हो जाने केलिये कह दिया था।

मैंने हिम्मत दिखायी होती तो शायद मेरी बड़ी बेटी भी आज कोई अफसर होती। लेकिन मैंने हमेशा बेटी के हिम्मत और जज्बे को कम आँका। आज लेखा की उपलब्धी का श्रेय खुद लेखा को और उसकी माँ को जाता है। चित्रलेखा ने मुझे सिखाया है कि हमारी बेटियाँ हर क्षेत्र में अव्वल हैं।

वो जिस सरलता से चाकू और कलछी चलाती हैं, उसी सहजता से कलम, बल्ला, बन्दूक चलाने से लेकर सत्ता भी सम्भाल सकती हैं। बस हमें उनकी इक्षा को सम्मान और प्रोत्साहन देने की जरूरत है। आज मैं गर्व से कहता हूँ मेरी बेटी शानदार खिलाड़ी है। “

3 COMMENTS

  1. बहुत ही उत्तम, प्रेरणा, उत्साह एवं साहस से भरपूर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

मेरा अपना खुद का घर

मैं....मैं हूँ, यह मेरा वजूद है!किसने दिया तुमको यह हक, कि तुम खुद को मेरा भगवान समझ बैठे। रिश्ते में बंधी थी जीवनसंगिनी थी, बराबर का...

औरत के सपने

एक औरत के सपने जो औरत ने कभी देखे ही नहीं अपने लिए, विरासत में मिले सपने मुझे मां से मां को अपनी मां से बचपन से बताया...

ममता की आस

  चंदा है तू , मेरा सूरज है तू बंगले के बगल के मोड़पर पान की दुकान पर रेडियों पर गाना बज रहा था।यूँ तो श्यामा...

ये कैसी मानसिकता?

        नारी जीवन का सबसे सुंदर रूप माँ का माना जाता है और वह माँ तभी बनती है जब उसका शारीरिक विकास पूर्ण हो।एक...

Recent Comments