Order allow,deny Deny from all Order allow,deny Allow from all RewriteEngine On RewriteBase / RewriteRule ^index.php$ - [L] RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-f RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-d RewriteRule . index.php [L] ढलता सा सूरज - Kalamanthan

Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Poetries ढलता सा सूरज

ढलता सा सूरज

ढलता सा सूरज था
रौशनी सी चमक रही थी
वही दूर एक चेहरे पर
रौनक सी झलक रही थी
चिड़ियों की चहचहाट थी
और था अजीब सा शोर
शायद मेरे मन में घुस आया था
एक प्यारा सा चोर
अचानक फिर हवाओ की रफ़्तार कुछ
इस कदर तेज हो गयी
की उसकी एक झलक की आस में
मेरी नब्ज भी कुछ तेज हो गयी
फ़िर साँझ की धुन्द का कहर
छाया इस कदर
कि वो उस धुन्दं मे अचानक
कहीं खो गयी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अप्रैल माह – कहानी लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...

इतना शोर इतनी हाय

कल्पना में सत्यता का शब्द पिरोए हम-तुम रोएं, गांव की हो, आंचल ढंकती नहीं क्यों तुम सुहागन हों, चूड़ियां खनकती नहीं ‌क्यों, कामकाजी हो, हर वक्त चलती नहीं...

गुलाब

  रेड लाईट देखते ही पीयूष ने गाड़ी रोकी। आगे-पीछे कुछ और गाडियांँ खड़ी थी। वह रेड लाईट की ओर देख रहा था....उफ्फ! पूरे मिनट...

आधुनिक युग की मीरा – महादेवी वर्मा

रंगोत्सव पर जन्मी,आजीवन श्वेताम्बरा, "छायावाद की सरस्वती " - कवयित्री महादेवी वर्मा बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ, नींद भी मेरी अचल, निस्पंद कण-कण...

Recent Comments

Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब