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लॉकडाउन में बदलते रिश्ते

आज मै यह लेख अपने अपराध बोध को कुछ कम करने की मंशा से,और अपनी गलत धारणा को स्वीकार करने हेतु कलमबद्ध कर रही हूं ,कि संतान चाहे बेटा हो या बेटी उनमें सचमुच कोई अंतर नहीं होता।दोनों की मां के प्रति भावनाएं एक समान ही होती हैं।
यत्रै नार्यनस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रै तास्तु न पूज्यन्ते सवाऀस्त्त त्राफलाः क्रियाः
मनुस्मृति में लिखे इस श्लोक के अनुसार जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं अन्यत्र नहीं।
मेरा जन्म एक ऐसे ही परिवार में हुआ जहां पुत्र एवं पुत्रियों में कोई भेद भाव नहीं किया जाता अपितु बेटियों को बेटों से भी अधिक महत्व दिया जाता है और लाड़-प्यार से पाला जाता है।और ये भी कहावत है हमारी यहां कि “वह नार सुलक्षणी जिसने जायी पहली लक्ष्मी”
मेरे विवाहोपरान्त जब मेरे प्रथम पुत्र का जन्म हुआ तो समस्त परिवार में खुशियां मनाई गईं क्योंकि वह घर की प्रथम संतान थी। स्वाभाविक है,मैं भी बहुत खुश थी अपने नवमातृत्व की भावना से ओत-प्रोत हो कर ,पर जब मेरे द्वितीय पुत्र का जन्म हुआ तो मै अधिक उल्लास का अनुभव नहीं कर सकी क्योंकि इस बार संतान के रूप में मुझे बेटी चाहिए थी,मै कुछ उदास सी हो गई थी,पर ईश्वर की इच्छा के समक्ष किसका बस चलता है।
शैनेः शनै: बच्चे समय के साथ बड़े होने लगे ।जब भी मैं अपनी सहेलियों की बेटियों को देखती ठंडी सांस भर कर रह जाती और दुखी होती कि भगवान ने मुझे बेटी क्यों नहीं दी।जब मेरी सखियां बेटी होने के सुख गिनवातीं तो मुझे बेटी ना होने की कमी और भी अधिक तीव्रता से खलने लगती। कैसे बेटियां भावनात्मक रूप से मां से जुड़ी होती हैं,सखी की भांति हर छोटी बड़ी बात सांझा करतीं हैं, अस्वस्थ होने पर घर के कार्यों में हाथ बंटाती हैं,फैशन से के कर हर विषय पर चर्चा करती हैं,ये सब सुन कर मै कुढ़ती रहती कि ये सब सुख मेरे नसीब में कहां,मेरे घर में तो पुत्र_पिता का एकाधिकार है, उन्हें मेरी कोई परवाह नहीं, कद्र नहीं।
मुझ असहाय को घर के प्रत्येक कार्य का अकेले ख्याल रखना पड़ता है कोई किसी कार्य में दिलचस्पी नहीं दिखाता, आदि_इत्यादि।मेरा यह दृढ़ विश्वास था कि एक बेटी ही मां की भावनाओं व मनोदगारों को भली-भांति समझती है। जैसा कि आम तौर पर संपन्न परिवारों में होता है उन्हें ना किसी कार्य को करने की आवश्यकता थी न ही रुचि। यहां मेरे कहने का यह आशय कदापि नहीं है कि मेरे बेटे मुझसे स्नेह नहीं करते थे,घर में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम मुझे ही पुकारते , ढूंढते, पर जताने का तरीका शायद भिन्न था, मुखर न था।ये मेरी समझ का ही फेर था।
आज मेरे दोनों पुत्र युवा हो चुके हैं।उच्च शिक्षा प्राप्त करने व अपने कार्य वश सुदूर बड़े शहरों में रहते हैं, परन्तु जब से कोविड_ १९ का संक्रमण फैला है सबका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।इन तीन-चार महीनों में मेरे पुत्रों का जो नया रूप मेरे सामने आया है उससे मैं सोचने पर विवश हो गई हूं कि क्या ये मेरे वहीं पुत्र हैं जिन्होंने कभी पानी का गिलास भी स्वयं ले कर नहीं पिया,वे इतने जिम्मेदार हो गये हैं।
कोरोना के संक्रमण के कारण वे घर भी नहीं आ सके।उनके घर के कार्यों में मदद करने वाले भी सब छुट्टी पर चले गए।अब वे अपने छोटे बड़े सब कार्य खाना बनाना,साफ़ सफ़ाई करना , कपड़े धोने, इत्यादि समस्त दायित्व अपने शिक्षण व आफिस के कार्यों के साथ साथ कर रहे हैं। वे ना केवल अपना, अपितु अपने फ्लैट-मेटस का भी परस्पर ख्याल रख रहे हैं, पूर्ण संजीदगी से और धैर्यपूर्वक बिना किसी शिकवा -शिकायत के ।
यूट्यूब देख-देख कर नित्य नये व्यंजन बनाते हैं और उनके चित्र हमें भेजते रहते हैं, कि मां हम ठीक हैं,आप हमारी चिंता मत करो।जो पुत्र पठन-पाठन व कार्य की व्यस्तता के कारणवश शीघ्र फोन भी नहीं कर पाते थे वे अब बिना भूले प्रतिदिन फोन करके हाल-चाल पूछते हैं, हमें गंभीरता से अपनी उचित देखरेख करने का निर्देश देते हैं। जिन बेटों को मैं सदा गैरजिम्मेदार व असंवेदनशील होने का ताना देती थी ,आज उन्हीं का ये सकारात्मक रूप देख कर मेरा मस्तक गर्व से ऊंचा हो उठा है।
आज मुझे अपने शब्दों को वापिस लेने में लेश मात्र भी ग्लानि नहीं है और यह कहते हुए अत्यंत गौरान्वित सा अनुभव कर रही हूं कि संतान चाहे बेटी हो या बेटा इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने व दर्शाने में बेटे चाहे बेटी की भांति मुखर अथवा वाचाल न हों पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वे मां से कुछ कम स्नेह रखते हैं।
उचित मार्गदर्शन, अच्छे संस्कार, उच्च पारिवारिक मूल्यों से पालन पोषण होने पर बेटे भी बेटियों की भांति संवेदनशील और जिम्मेदार साबित हो सकते हैं, इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है।
कामना की कलम से……

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