Phone No.: +917905624735,+919794717099

Email: support@kalamanthan.in

Home Blogs पितृसत्ता में पिसते पुरुष

पितृसत्ता में पिसते पुरुष

नारीवाद या फेमिनिज्म से भी लोगों को गुरेज़ शायद इसीलिए भी है की वो प्रत्येक नारी के पुरुष को और प्रत्येक पुरुष के भीतर की नारी को बाहर निकालने की मांग करता है।
नारी सम्मान और समानता के बारे में अक्सर लिखने वाली कोई अगर इस विषय पर बोले तो थोड़ा आश्चर्य हो सकता है। किन्तु इस आश्चर्य का कारण, नारी समानता की मांग को पुरुषों की खिलाफत के रूप में देखने की वजह से है और कुछ नहीं । बहरहाल ये अलग ही मुद्दा है बहस का किन्तु आज कुछ और था जिसने मेरा ध्यान खींच लिया। कुछ और लिखने बैठी किन्तु ये ख़्याल ज़हन से निकला ही नहीं और फिर सोचा आज रविवार का लेख पुरुषों के नाम जो स्वयं अपने बीने जाल में कसमसा रहें हैं।ट्रांसजेंडर समुदाय के बारे लिखे किसी आलेख में एक वाक्य पढ़ा

‘मैं पुरुष रूप में पैदा हुआ था इसलिए मुझसे तो मेरी पैदाइश से पहले से ही बहुत अपेक्षाएं थी!’

ये वाक्य किसी टीस सा महसूस हुआ और बहुत नज़रअंदाज़ करने पर भी नहीं कर पायी।
‘बेटा होगा और बड़ा हो कर सारा कारोबार संभालेगा !
‘मेरा बेटा इंजीनियर/डॉक्टर /क्रिकेटर बनेगा जो मैं नहीं बन पाया। ‘
अक्सर समाज में पुरुष होना मात्र ही उनकी राह आसान कर देता है किन्तु कभी ठहर के सोचे तो पितृसत्ता के बनाये नियम कानून कहीं न कहीं पुरुषों को भी बांध कर रखते है। एक ऐसे जाल में जहां दम घुट सकता है किन्तु आंसू नहीं निकल सकता।
लड़के रोते नहीं और मर्द को दर्द नहीं होता ये जुमला एक नन्हें से बच्चे के रोने पर भी, सुनने को मिलता है। जैसे जैसे वो बच्चा बड़ा होता है उसे समझाया जाता है की परेशानी का कोई हल हो न हो उसे बताने में ,उससे लड़ने में , उसे सुलझाने में उसका दुखी या परेशान हो कर रोना मंज़ूर नहीं। रोना किसी भाव को दिखाने का ज़रिया न बन कर कमजोरी का अभिप्राय कैसे बन गया ?
हंसना मुस्कराना ख़ुशी की निशानी तो रोना दुःख और परेशानी की न हो कर कमज़ोरी की कैसे हुआ ? और क्यों इसे नारी के झोली में डाल दिया गया और मर्द के हिस्से से छीन लिया गया?
पुरुष , लड़े, थके, हारे किन्तु कुछ बोले न, ये नियम क्यों और किसने बनाए ? उन्ही चार लोगो ने तो नहीं ??
ज़िन्दगी में तमाम परेशानियों में हारने की या थकने की इजाज़त क्यों नहीं दी जाती पुरुष को। जैसे नारी सुपरवुमेन का चोंगा पहन अंदर ही अंदर घुट रही होती है कहीं पुरुष भी तो अपनी सारे मुखौटे उतार कर दो पल आह भरना चाहता होगा।
कब ,क्यों और कहाँ हम उन्हें पुरुषार्थ के रूप में खुद से खुद की लड़ाई की घुट्टी पिला देते हैं पता नहीं चलता।
बहुत साल पहले किसी जान पहचान वाले का किस्सा सुना था। बहुत ज़हीन बेटा था उनका, प्रख्यात आई आई टी से पढ़ा और गूगल में नौकरी करता हुआ विदेश में रहने लगा।
नयी उम्र ,नई जगह, नई नौकरी।
घर से दूर ,काम करने के लम्बे घंटे।
शायद नौकरी मिलते ही उसे भी बड़ा और समझदार समझ लिया गया बिलकुल वैसे जैसे सात फेरों के तुरत बाद एक लड़की ‘समझदार बहू ‘के रूप में देखी जाती है।
क्या हुआ क्या नहीं ये तो नहीं है पता लेकिन कुल १३ महोने बाद उस बच्चे ने खुदख़ुशी कर ली। बच्चा कहना इसलिए लाज़मी है क्योंकि मात्र कॉलेज और नौकरी ,२५-२६ साल की उम्र में किसी को ज़िन्दगी के लिए परिपक्व नहीं बनाती।
यूँ ही एक और किस्सा ज़हन में आया की नए शादी शुदा जोड़े की अनबन की खबर थी। रिश्तेदारी थी तो लड़के को जानती थी। कुछ सालों के गुज़रने पर पता चला की दोनों अलग हो गए। तकलीफ हुई की एक रिश्ते के टूटने के दर्द से गुज़रे दोनों। सुना आजकल वो लड़का घरवालों से भी ज्यादा बात नहीं करता।

वहीँ घर के बड़ों का कहना था ‘संभाल नहीं पाया औरत को। इस हद तक बात पहुंची क्यों ?एक रसीद (थप्पड़ ) करता सब समझ आता”।

उस लड़के से मिली तो उसने कहा,’घरवालों को क्या समझाऊँ । अलग थे हम दोनों। मार पिटाई से रिश्ता चलता ??कैसे समझाऊं की अलग होना बेहतर था ”
उसे कुछ कह नहीं पायी लेकिन लगा की पितृसत्ता की रस्सी से इसका भी दम घुटता है।

हाल में ही हुए सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने जहां एक तरफ अवसाद को ज्वलंत मुद्दे की फेहरिस्त में ला खड़ा किया वही ज़रूरी है की पुरुष द्वारा अपने भाव न दिखा पाने की नाकामयाबी या दिक्क्त पर बात की जाये। बदलते समाज में जहां ज़िन्दगी की आपाधापी ने हमें एक दूसरे से दूर किया है वहीं ‘नारी’ को ‘नारी समान ‘ और ‘पुरुष को पुरुष समान ‘ रहने पर दिया जा रहा ज़ोर भीतर एक आवेश ला रहा है। जहां नारी अपनी आवाज़ उठाने की कोशिश कर रही है वही पुरुष अभी भी उस कश्मकश में है की उसके लिए सही क्या है और गलत क्या।

‘तुम बड़े हो गये हो ‘
‘मर्द बन बी अ मैन !’
‘कैसी नामर्दों वाली बात करता है ‘
‘ये लड़कियों जैसी रोनी सूरत मत बना ‘
ये तमाम जुमले हैं जिन्होंने कभी न कभी किसी लड़के को मर्द बनने के लिए वो करने पर मजबूर किया होगा जिसे वो शायद करना नहीं चाहता था ।
सिगरेट का पहला कश , शराब का पहला घूंट ,किसी लड़की को छेड़ने की पहल और उसके ‘ना ‘कहने पर अपनी मर्दानगी दिखाते हुए ‘कुछ न कुछ ‘करने की शुरुआत ये सब मात्र इसलिए की ,”मर्दों”, की एक रुपरेखा है और उसके बाहर निकलना आसान नहीं।
अपनी पसंद का रंग हो या रूचि कहीं न कहीं ‘मर्दों वाली बात आ ही जाती है’।
गुलाबी लड़की का और नीला लडकों का रंग बन गया।
क्रिकेट खेले तो ठीक किन्तु पारम्परिक नृत्य लडकों के हिस्से नहीं।
यकीं मानिये आज भी खाना बनाना लड़कों का शौक है ये आश्चर्य की वजह बनता है। रसोई घर में औरत पांच दिन के लिए वर्जित होती थी किन्तु मर्द हमेशा के लिए है। ऐसे तमाम वाकये हैं जहां पुरुष कमज़ोर पड़ता है पर दिखाता नहीं या यूँ कहूं की दिखा नहीं सकता। पुरुषसत्ता , नारी और पुरुष दोनों का ही एक पिंजरे में कैद करती है।

मनुष्य के स्वभाव में निहित हर भाव दोनों के हिस्से आना चाहिए।

नारीवाद या फेमिनिज्म से भी लोगों को गुरेज़ शायद इसीलिए भी है की वो प्रत्येक नारी के पुरुष को और प्रत्येक पुरुष के भीतर की नारी को बाहर निकालने की मांग करता है।
अर्धनारीश्वर और शक्ति के रूप को पूजता हुआ भारतीय समाज किसी पुरुष में रत्ती मात्र भी कोमल ह्रदयता स्वीकार नहीं कर सकता और न ही किसी नारी की अपने राह में चलने की ज़िद स्वीकार करता है।
नारी घर के भीतर से आसमान को ताकती है और विधान पर कसमसाती है वही पुरुष बाहर कठोरता का चोंगा पहन उसे घर के भीतर भी लादे रखने पर मजबूर है।
जहां एक ओर औरत को घर की दहलीज़ में बांध कर रखना गलत हैं वहीँ पुरुष को घर में भी बेघर करना गलत है।
हर उस पुरुष को समाज का साथ मिलना चाहिए जो ‘मर्द’ होने की परिपाटी बदल रहा है चाहे घर में मदद कर के , बच्चों को पिता का देखभाल दे कर ,अपनी पसंद का कार्य कर के या फिर दुखी होने पर बेहिचक आँखें नम कर के ।

ये संख्या शायद 0 .5 %ही है। ये जी रहे हैं नारीत्व के पुरुष्त्व के साथ और पुरुष्त्व के नारीत्व के साथ।

PS :ये लेख स्त्री पुरुष समानता के लिए मेरी एक सोच है उनके लिए जो समानता में विश्वास रखते है अन्यथा बाकि लेख अवश्य पढ़ें।

 

 

To read more by the Author

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

 

nirjhra
Leading the editorial team with a vision of bringing quality content and varied thoughts on different aspects of society, art , life in general.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

August – Story Writing Contest

Are you a writer who loves to dwell into stories? Do you love to see beneath the layers of human emotions? If yes, the Monthly Story...

अगस्त माह – कहानी लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? अगर हाँ तो हम आपके लिए शुरू कर...

Unapologetically Happy

“Aww!  My baby….mamma loves you so much." I moved towards my mom taking Ziva in my embrace. "Mom, I know it's going to be tough for...

वर्किंग मदर्स

जाने क्यों 'माओं ' के बीच भी ये खाई बना दी गयी। क्यों मान लिया जाता हैं की घर में रहने वाली माएँ अपना...

Recent Comments