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वो दौर और प्यार

वो दौर ही कुछ और था। फिजाओं में प्रेम खुशबु की तरह यूँ फैलता था कि बिन बताये चेहरे की चमक देख दोस्त जान जाए कि ये प्यार में है। सच 1999 की बात ही और थी। रुचि यौवन की दहलीज पर खड़ी अपनी प्रिय सखी प्राची का इन्तेज़ार कॉलेज के गेट पर बेताबी से करती। प्राची जो उसकी हर राज की राज़दार थी से हर सुख दुख की साथी।
प्राची के आते ही रुचि लिपट गई।
” कहाँ थी तू यार? कब से तेरी राह देख रही थी”
” हाँ हाँ मैंने तो कॉलेज जॉइन ही तेरे खातिर किया है, एक काम करते हैं हिस्ट्री की क्लास के बाद बात करेंगे लेट हो रहे हैं” प्राची ने रुचि को खिंचते हुए कहा।
” अरे सुन तो पहले! सारी एक्साइटमेंट का कचरा कर दिया तूने, मेरी बात ज्यादा जरूरी है.. तेरे घर फोन होता तो अब तक मैं कह चुकी होती समझी, अब सुन पहले ” रुचि ने प्राची गले लगाते हुए कहा।
” अच्छा बताओ “
” मुझे ना प्यार हो गया है” रुचि ने शर्माते हुए कहा।
“वो तो हर महीने होता है.. नया क्या है बता? “
” चुड़ैल! मैं क्रश की बात नहीं कर रही हूं.. सच्चा वाला प्यार हुआ है! “
” हम्म! कैसे पता? “
” उसकी आवाज़ सुनते ही कानो में शहनाई बजती है, और उससे दूर होने का एहसास दिल बैठा देता है ” रुचि आसमान में देख बता रही थी।
” तेरा पानी पूरी वाला? “
” जा, नहीं बताना तूझे! “
रुचि को नाराज होते देख प्राची ने धैर्य से सुनने का वादा किया तो रुचि ने रवि के बारे में बताया। रवि उसके नई वाली भाभी का छोटा भाई जो इंजीनियरिंग का स्टूडेंट था। भाभी के संग शादी के बाद बिदाई में आया था तभी से अलग सा आकर्षित करता था। मज़ाक के रिश्ते का मस्ती मज़ाक कब प्रेम निवेदन में बदल गया कुछ पता ना चला।
रवि अब छुट्टियों में दीदी के घर ज्यादा आने लगा था। रुचि के पापा जो थोड़े कड़क मिजाज थे उन को रवि का यूँ बार बार आना कुछ खास अच्छा ना लगता था। पर रवि ने ना ही रुचि से और ना ही रुचि ने रवि से कभी अपनी भावनाओ का इजहार किया वो तो बस एक दूसरे को नजरो से दिल में कैद कर खुश हो जाते थे। रुचि की भाभी को धीरे धीरे ये बात महसूस होने लगी थी। उन्होंने रुचि को प्यार से बुलाकर पूछा तो रुचि ने अपने दिल की बात भाभी को बताया साथ में ये वादा लिया कि वो अभी इस बारे में किसी से कुछ ना कहे रवि से भी नहीं। आज रुचि ने प्राची से ये सब दिल खोल कर बताया।
” कब से चल रहा है और तू आज बता रही है? और ये क्या रवि को बताया नहीं और मुझे बता रही है” प्राची ने शिकायत भरे लहजे में कहा।
” नहीं ऐसा नहीं, मैं अपनी ही भावनाओ को लेकर संशय में थी। पर जब भाभी ने कल पूछा तो जैसे अलग सी हिम्मत आ गई। तूझे बता रही हूं पहले की सलाह ले सकूँ की कैसे बात करू ”
रुचि ने राहत की साँस ली।
” देख पहले तू उनसे साफ बात कर ले ऐसा ना हो वो सिर्फ दोस्ती सोचे और तू आगे ही बढ़ जाए, पारिवारिक रिश्तों में भी खटास आ जाएगी “
प्राची के समझाने के बाद रुचि ने तय कर लिया कि रवि से जरूर बात करेगी।
कॉलेज से लौट कर एसटीडी बूथ जाकर हॉस्टल में फोन घुमाया।
” ऐसा क्या हो गया रुचि , सब ठीक? “
” रवि जी, भाभी को पता चल गया “
” क्या? “
” क्या मतलब वही जो हम महसूस करते हैं एक दूजे के लिए “
” रुचि तुमने मेरा डर निकाल दिया,मैं डर रहा था तुमसे कहा नहीं। क्यूँकी जानता था मेरे प्यार को तुम महसूस कर ही लोगी और अगर मेरा प्यार एकतरफ़ा हुआ तो तुम जैसी अच्छी दोस्त भी खो दूँगा। अब जब तुम्हारे तरफ से हाँ है तो मैं घर पर बात करूंगा। बस अगले महीने मेरा प्लेस मेंट हो जाए अच्छी कंपनी में। “
रुचि के पैर जमीन पर नहीं थे। प्रेम की रूमानी दुनिया ने जैसे उसे नए पंख दे दिए थे। रवि से फोन पर चंद मिंटो की बात भी उसे नई ऊर्जा दे देती थी।
शायद प्रेम मिल जाना इतना आसान नहीं था। प्लेसमेंट में रवि को कोई अच्छी कंपनी नहीं मिली। इधर रुचि के पापा ने भी रुचि की शादी के लिए अच्छे अच्छे रिश्ते देखने शुरू कर दिए थे। रुचि चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाती क्यूँकी रवि ने मना किया था कि अच्छी जॉब होगी तो वो खुद ही बात करेगा।
रुचि क्यूँकी इकलौती बेटी थी इसलिए उसके पापा हर रिश्ते को उससे पसंद जरूर पूछते थे। रुचि कोई ना कोई कमी निकालती और रिजेक्ट कर देती थी। रुचि की दीदी को भी इस बात पर गुस्सा आता पर मीरा जिद पर अड़ी रहती। ईन सब बातों का असर रुचि की पढ़ाई पर भी पड़ा और उसके मार्क्स सोचे से कम ही आए । रुचि अब दुगुनी परेशान थी। रह रह कर रवि से झगड़ा भी हो जाता था।
प्राची ने सलाह दी कि या तो उसे अब पापा की बात सुन लेनी चाहिये या रवि बात करे सबसे। रुचि इस तरह घरवालो को परेशान कर अपनी इमेज ना खराब करे। रुचि ने हिम्मत कर के माँ से बात की तो माँ बिफर पड़ी। माँ ने कहा कि उनकी बेटी हमारे घर है अब रीति अनुसार हम उनका पांव पूजन नहीं कर सकते हैं तो तुम भूल जाओ। रुचि बहुत दुखी हुई। इधर पापा की तबीयत भी बिगड़ने लगी थी। रुचि ने रवि को समझाया कि तुम कोई भी नौकरी देख लो और घर पर बात करो। रुचि की बात सुन कर रवि पहले तैयार ना हुआ फिर बोला इस तरह हड़बड़ाहट में कंपनी जॉइन करना कैरियर में सूइसाइड होगा पर रुचि के लिए वो इस लिए भी तैयार है। इस दौरान प्राची की शादी भी हो गई और रूचि और अकेली पड़ गई थी। प्राची फोन पर रुचि को हिम्मत देती रहती की प्रेम इम्तेहान लेता है और अगर सच्चा प्रेम है तो मिलेगा जरूर याद रखना।
रवि ने हिम्मत करके अपने घर पर साफ साफ कह दिया शादी वो रुचि से ही करेगा। पहले तो घर में तूफान आ गया फिर बेटे की जिद में सब झुक गए। रवि के पापा ने रुचि के पापा से शर्माते हुए ही बात की। शुरुआत के नाराजगी के बाद रुचि के पापा ने हाँ कर दी क्यूँकी वो भी बीमारी से थक चुके थे और वो चाहते थे आँखों के सामने रुचि को विदा कर दे। रुचि की पसंद का अंदाजा उन्हें था जब वो एक के बाद एक रिश्ते ठुकरा रही थी पर डरते थे कि जोर जबरदस्ती में बच्चे गलत कदम ना उठा ले।
रुचि और रवि की शादी काफी सादगी से हुई जैसा कि रुचि के पापा चाहते थे।
” रुचि ! मैं तुम्हारी बहुत धूमधाम वाली शादी करना चाहता था पर जैसा कि तुम्हें भी पता है कि ये सामाजिक रीति रिवाजों के खिलाफ हो रही है तो मैं ज्यादा हो हल्ला नहीं चाहता हूं.. हाँ ये जरूर चाहता हूं कि तुम हमेशा खुश रहो। और वैसे भी रवि की नौकरी बहुत छोटी है तो तुम्हें भी सादगी की आदत रखनी होगी। अपना प्रेम जिम्मेदारी पूर्वक निभाना बेटा क्यूँकी शायद अब मैं ज्यादा दिन ना रहूं तुम्हारे नखरे उठाने को ” विदाई में पापा कह कर रो पड़े।
” पापा! मैं रुचि के सारे नखरे उठाऊंगा, वादा रहा कभी शिकायत का मौका हम नहीं देंगे। आप अपना ध्यान रखे और हमेशा आशीर्वाद बनाए रखे ” रवि की बात से पापा संतुष्ट दिखे।
प्राची ने रुचि को विदाई की गाड़ी में बिठाकर रवि की चुटकी ली
” रवि जी! हमारी रुचि को खुश रखियेगा। जितनी देर आप अपने इजहार-ए-मोहब्बत में लगा रहे थे मुझे लगा रुचि को पानी पूरी वाले के साथ भागना पड़ेगा। अब आप दोनों अपना प्रेम बनाए रखे”
“हाँ जी साली साहिबा! जरूर, रुचि की हिम्मत और सहनशीलता का मैं कर्जदार हूं। अब अपने प्यार से इसके सारे शिकायत दूर कर दूंगा “
रवि और रूचि की गाड़ी जाते हुए सब प्रेम से देख रहे थे । काश सब को ऐसे ही उनका प्यार मिल जाए।

 

 

 

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