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वर्किंग मदर्स

जाने क्यों ‘माओं ‘ के बीच भी ये खाई बना दी गयी।
क्यों मान लिया जाता हैं की घर में रहने वाली माएँ अपना सारा समय बच्चों के लालन पालन में देंगी किन्तु ‘वर्किंग मदर्स’, वक़्त ही कहाँ है उनके पास!
बोर्ड की परिक्षाओं का रिज़ल्ट आ गया और मैंने एक साथ दसवीं और बारहवीं की परीक्षा पास कर ली।
जिन नन्ही उँगलियों को लिखना सिखाया था आज वो खुद का भविष्य लिखने की तैयारी में हैं।
बोर्ड की परीक्षा का सबसे मज़ेदार और उतना ही खीजने वाला समय होता है रिज़ल्ट के बाद का जब दूर दूर के शर्मा जी से ले कर तिवारी जी के घर से फोन आता है येन केन प्रकारेण ‘कितने आये ?’ ये पूछने।
कुछ घुमा के पूछते हैं , कुछ सीधे, कुछ उसके बाद सांत्वना देते हैं की थोड़ी और मेहनत करते तो और कुछ कॉलेज से ले कर करियर तक की सलाह भी दे देते हैं। ये वो लोग हैं जो उस बच्चे की कमज़ोरी और उसकी ताक़त दोनों से नावाकिफ हैं जो उसकी पसंद नापसंद के बारे में कुछ नहीं जानते। बच्चे भी ‘कन्फ्यूज़ ‘ होते हैं की ये कौन हैं जिन्हे अचानक उनके भविष्य की चिंता हो आयी।
अपने सपनो देखो और उनके पीछे भागो बिना अगल बगल वाले की चिंता किया यही गुर मैंने दिया ,और हर बच्चे को सपना देख, उसे पूरे करने की आज़ादी मिले ये मेरा ‘पेरेंटिंग ‘का अपना मंत्र है।
इन परीक्षाओं की महत्ता इतनी है की कॉलेज तुम्हें दाखिला देगा या तुम्हारा स्वयं का आत्मविश्वास बढ़ेगा की मेहनत करके तुम हर परीक्षा पास कर सकते हो। बस इसके बाद कुछ नहीं।
ये न तो जीवन के सफलता की कुंजी है न तुम्हारे व्यक्तित्व का मापदंड। तो बस साँस लो मुस्कराओ और आगे बढ़ जाओ।

बहरहाल ये पोस्ट बच्चों के लिए नहीं है।

ये हैं उन माओं के लिए जो अपने काम में मसरूफ रहती हैं और इस गिल्ट में रहती है की कहीं उनके काम और सपने, बच्चों के सपनो पर भारी न पड़ जाएँ। जिन्हे हम अमूमन ‘वर्किंग मदर्स’ कहते हैं।
बच्चे को सुबह टिफिन के साथ स्कुल भेज दोपहर के खाने की तैयारी कर के जाती और घर के किसी सदस्य या डे – केयर में अनुदेश देती ,या कुछ बड़े बच्चों को घर की चाबी देते हुए हर दिन टीस से भर उठती हैं और फिर अपने सपनो की पोटली टाँगे बस मेट्रो से ऑफिस पहुँचती है।
स्कुल बस के आने के वक़्त से ले कर बच्चे की आवाज़ सुन लेने तक उसे भी बेचैनी होती है और रोज़ होती हैं। मीटिंग के दौरान बार बार घड़ी देख वो दो मिनट निकल उसकी आवाज़ सुनती है ,खाने में क्या बना ये बताती है और मुस्करा कर शाम को मिलते हैं कह कर काम में लग जाती है। उसका दोपहर का निवाला कभी 1 बजे तो कभी 4 बजे जाता है जिसके दौरान वो शाम के खाने और अगले मेल के बीच झूल जाती है।
वक़्त उसके पास भी 24 घंटों का ही होता है और उसमे मिले कुछ घंटे वो अपना भरपूर देना चाहती है बच्चे और परिवार को और ऐसे में एक नन्ही सी गलती या उसका थका चेहरा या यूँ ही बेवजह कह दिया जाता है ‘नहीं मैनेज होता तो छोड़ दो ‘!
ये आलेख उन माओं के लिए – जो अक्सर जज की जाती हैं। जाने क्यों ‘माओं ‘ के बीच भी ये खाई बना दी गयी।
क्यों मान लिया जाता हैं की घर में रहने वाली माएँ अपना सारा समय बच्चों के लालन पालन में देंगी किन्तु ‘वर्किंग मदर्स’, वक़्त ही कहाँ है उनके पास!
बचपन में स्कुल से घर आते ही मां को सारा हाल सुनाने की आदि थी और वही देखा भी था। आस पास दीदी या भाभियाँ सभी ने घर संभाला और उसे ‘घर ‘ किया। उनकी कायल हूँ लेकिन कोई सपने देखने की हिम्मत करे तो उसके पंखो की उड़ान बनने की बजाय उसे जज करने की बेड़ियाँ क्यों ?
वो घर पर रहे या बाहर जा कर काम करने की सोचे इस फैसले को बिना जज किये स्वीकार क्यों नहीं कर सकते। कोई ऊँची पढ़ाई कर के भी घर पर रहना चाहे और कोई अपने पैरों पर खड़े होने के लिए एक कदम बाहर का करे वो दोनों ही सम्मान के हक़दार है।

जैसे घर में रहने वालों पर ‘सारा दिन घर में करती क्या हो ?’ का जुमला फेंका जाता है उसी तरह ‘वक़्त की कमी ‘ का पत्थर काम काजी नारी पर रोज़ ही मारा जाता है।

क्यों ??
और ये जज करने वाले वो जो बस दूर से
‘हेलो जी दिखते नहीं ?हाँ आपके पास वक़्त कम होता है न ?’ कह कर आलू चाट पर मसाले सा चटपटा तंज़ करते हैं या फिर
‘बच्चों का कैसे ??बेचारे इंडिपेंडेंट हो गए होंगे अब तो ‘
मानो इंडिपेंडेस मुई कोई बीमारी हो।
कोई मेरे जैसे जिसका काम भी उसे सोशल मिडिया पर दिखने की मांग रखता हो उसे तो , “हें हें हें ,आप तो बस फेसबुक पर ही दिखती है। घर कैसे मैनेज होता है? ऑफिस का काम फिर ये सब ??
जी चाहता है कह दूँ “बोतल में जिन्न बंद है न वही करता है जी, मैं बस हुकुम देती हूँ!”
क्यों आज 2020 में भी वर्किंग मदर्स को जज करने और उनसे काम छोड़ कर मातृत्व की ज़िम्मेदारियाँ सँभालने के अपेक्षा होती है।”इन पैसों से घर नहीं चलता तो क्यों नाहक परेशान हो घर बैठो “ये कहते हुए उसके काम की महत्ता मात्र उसकी तनख्वाह से क्यों जोड़ दी जाती है।
उसके सपने, उसकी आज़ादी, उसकी इच्छा इनकी कोई कीमत क्यों नहीं ?

परीक्षा के दिनों में हर माँ की भी परीक्षा होती है, बच्चे के अंको से माँ के दिए वक़्त को भी आँका ज़रूर जाता है !

मैंने दोहरी बोर्ड की परीक्षा काम करते हुए दी है। मुमकिन है या यूँ कहूं आसान है। बस माँ और बच्चे साथ साथ सपने देखो और उस पर काम करो। एक गिरे तो दूसरा थामे और दूसरा थके तो गले लग कर बोले ‘यु आर द बेस्ट ‘
मत रुको जब तक तुम्हें न लगे।
सपनो के पीछे मेहनत लगती है ये बताओ उसे जो अभी ‘फैंटसी की दुनिया ‘ में है ,जिसे डोरेमोन से ले कर तेज़ भागती गाड़ियां दिखती हैं उसके लिए सपने पूरे करने की जद्दोजहत की मिसाल बन जाओ।
आसानी से कुछ नहीं मिलता ये समझने का एक तरीका बन जाओ।
वर्किंग वीमेन ‘ एक हक़ीक़त है ये साबित करने का तरीका बन जाओ ताकि बेटी खुद को उस सांचे में देखे और बेटा इस सांचे के लिए तैयार रहे !
पिता की परीक्षा क्यों नहीं होती ये लिखते हुए बेवजह वक़्त जाया नहीं करूंगी।
तो हर वो माँ जो अगले आने वाले सालों की परीक्षाओं के दिनों के लिए परेशान है ,मेरी मानो एक लम्बी साँस लो।
ज़िन्दगी के पाठ रटाये नहीं जाते ,जिए जाते है और नन्ही आँखें उन्हें देख कर सीखती हैं तो बस हर सुबह ज़िन्दगी से प्यार करो। घर में रहिये या बाहर, माँ की पाठशाला ,से सबक मिलते रहते हैं और ये सिर्फ बोर्ड में नहीं जीवन की परीक्षाओं में भी उन्हें पास करने की ताक़त रखते है।
माओं को मुबारकबाद।
% न लिखने की यही वजह की माँ की मेहनत और मोहब्बत उसकी मोहताज नहीं।

 

 

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