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बचपन को बांटते रंग

 

डीयर किंडर जॉय……… सबसे पहले तो तुम्हें बहुत बधाई कि तुम हमारे नन्हे-मुन्ने का दिल जीतने में इतने कामयाब रहे। किसी शॉप में अगर हम अपने बच्चे के साथ चले गये तो एकदम सामने सजाये गये किंडर जॉय की कतारें बच्चे के बाल हठ की पराकाष्ठा दिखा देती है।

एक तो इसका यम्मी क्रंची, चाकलेटी और क्रीमी स्वाद और उसपर से शानदार खिलौने की चाह………. बच्चे तो बच्चे, सच कहूँ तो यदा-कदा मेरे जैसे बड़ों का मन भी ललचा जाता है। कई बार इसकी कीमत जेब करतती हुयी लगती है, लेकिन इसे पाकर बच्चों के चेहरे पर आये असीम सुख को देख कर हमारा मन भी खुश हो लेता है। आपने बाल मन को परखा और अपने उत्पाद से उसे जीतने में कामयाब रहे…….. हैट्स ऑफ टू यू। बस एक बात जो अखरती है और पूरी तरह से मेरे समझ से परे है, वो ये कि आपने अपने उत्पाद में जेंडर के हिसाब से दो रंगों की दीवार क्यूँ खड़ी कर दी?

क्या आप जेंडर ईक़्वालिटी के खिलाफ हैं? मुझे नहीं लगता कि ऐसा होना चाहिये। हालाँकि मेरी सोच का दायरा इतना ज्यादा बड़ा नहीं है कि मैं इस विषय पर कोई बड़ी बात कहूँ, लेकिन जितना मैंने समाज के प्रगतिशील सोच के समर्थक वर्ग को जाना और समझा है तो यही जान पायी हूँ कि आज का समाज जेंडर इक़्वालिटी का पुरज़ोर समर्थन कर रहा है।

आज के समय में जब हर वर्ग का व्यक्ति समाज में महिलाओं के योगदान को सम्मान देने पर उन्हें बराबरी के उनके अधिकार को दिये जाने केलिये बात कर रहा है, उन्हें बराबरी का अधिकार दिलाने के प्रयास कर रहा है। वहीं कुछ अभिभावक अब भी बचपन से ही नन्हे-मुन्ने बच्चों के विकासशील जेहन को नर और नारी के भेद से पाटने में कोई जुगत नहीं छोड़ते।

जहाँ बच्चे का निर्विकार मन हर रंग से रंगोली बना कर आह्लादित होता है और उन्हे इंद्रधनुष का सतरंगी रूप बहुत लुभाता है, वहीं आपने लड़के और लड़की के लिये दो अलग रंग ही नहीं बनाये, उनके खिलौनो को भी भेदों से पाट कर रख दिया। अगर कोई बच्चा है तो वो नीले रंग का किंडर जॉय लेगा, और उससे कार, रोबोट और बहुत से क्रियेटिव खिलौने निकलेंगे। अगर कोई बच्ची है तो उसे गुलाबी रंग का किंडर जॉय मिलेगा और उससे जो खिलौने निकलेंगे वो होंगे डॉल, परियाँ, गुलाबी बालों वाला यूनिकॉर्न…… आपके द्वारा निर्धारित ऐसे ही और गर्लिश जेंडर के खेमे वाले खिलौने।

बच्चों का मन एकदम साफ पानी की तरह होता है। गंगोत्री के जितना पावन और उतना ही निर्मल। इस पारदर्शी पानी में हम विचार के जिन-जिन रंगो की बूँद गिरायेंगे वो उस-उस रंग की छटा बिखेरेंगेे। पर आपसी भेद के काले रंग कि एक बूँद भी हमने गिरा दी तो पानी का रंग स्याह हो जायेगा। फिर ये क्या सोच थी कि आपने चटकीले इन्द्रधनुषी रंगो के बीच इस स्याह रंग को तवज्जो दी और बचपन को ही दो खेमा बना दिया।

अक्सर जब दो-चार बच्चे और बच्चियों के बीच में कोई उन्हें किंडर जॉय देता है तो इस बात का खास खयाल रखा जाता है कि लड़के को नीला और लड़की को गुलाबी वाला दिया जाये। ये स्वाभाविक है। क्योंकि आपने आपने हमारी चेतना को उस ओर दिशा देने का काम किया है। दो लड़की है और तीन लड़के तो हम गिन कर दो पिंक और तीन ब्लू ही खरीदते हैं। और अगर गलती से बाँटने में कोई चूक हुयी तो बाल महाभारत वहीं शुरू।

यकीनन बहुत से लोग मेरे इस बात का समर्थन करेंगे, क्योंकि सच में अक्सर ऐसा होता ही है। मेरी बेटी मुझसे कई बार ये पूछ चुकि है कि क्या गर्ल ब्लू वाला किंडर जॉय नहीं ले सकती या ब्वॉय पिंक नहीं ले सकते? तो मैं उसे समझाती हूँ कि दुनिया का हर रंग उसका है वो चाहे जो चुने। लेकिन बच्चों के हठ को देखकर मैं सोचने पर मजबूर हो जाती हूँ कि कैसे तुतला कर अपना वाक्य पूरा कर सकने वाला बच्चा भी चीख-चीख कर ये ज़िद करता है कि मुझे गर्ल के रंग वाला चाकलेट नहीं चाहिये, मुझे गर्ल के खिलौने नहीं चाहिये।
कहाँ से और कैसे विकसित होती है ये सोच दुनिया को समझने की कोशिश में लगे नौनिहालो में? पहला ज्ञान घर से मिलता है खुद उस बच्चे के अभिभावक से तो उस सोच पर मोहर लगाने का काम करता है आप जैसे व्यापारियों के उत्पाद जो कहता है कि लड़के हो तो वो न खरीद कर ये खरीदो और लड़की हो तो यह तुम्हारे लिये नहीं है तुम वह खरीदो।
बच्चों के ये हठ हमें बरे फनी लगते हैं और हम सब मिलकर उसका जी भर कर लुत्फ़ लेते हैं। लेकिन बच्चों के अंतः में जेंडर को लेकर पनप रहा यही भेद कालांतर में पूरे समाज पर हावी होता है। एक सोच समय के साथ परिपक्व हो जाती है कि लड़के हैं तो ज्यादा इमोशनल नहीं होंगे, लड़के कभी रोते नहीं क्योंकि मर्द को दर्द नहीं होता।
वो क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी खेलेंगे। वो घर के बाहर की ज़िम्मेदारी उठायेंगे लेकिन गृहस्थी और रसोई के काम से दूर रहेंगे क्योंकि ये काम उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं और उनके व्यक्तित्व को गिरा सकता है। घर के किसी और सदस्य की तो दूर अपने कपड़े धोना और गलती से भी कभी घर में झाडू-पोछा कर लेना तो मर्दानगी पर आघात बन जाता है।
वहीं दूसरी ओर लड़की कितनी भी कुशल और उच्च पद पर आसीन ही क्यों न हो, घर और परिवार उनका पहला दायित्व बन जाता है। क्योंकि बचपन से ही उनके खेल-खिलौने में घरौंदा बनाना, गुड़िया की देख-भाल करना, छोटे-छोटे किचन सेट में खाना पकाना और सबको सलीके से खिलाना शामिल किया जाता है।

बचपन से हम उन्हें एक-दूसरे से इतना अलग साबित करने की कोशिश करते हैं कि जिन्हें समाज के दो समानान्तर पहिये बनना चाहिये वो अक्सर एक दूसरे के विरोधी बन जाते हैं।

 

एक विज्ञापन है जिसमें कहा गया है कि लड़के को कभी ये मत कहो कि लड़के कभी रोते नहीं, बल्की उन्हें ये सिखाओ कि लड़के कभी किसी को रुलाते नहीं। मुझे लगता है कुछ मिनट का समय निकालकर हमें यह विज्ञापन सपरिवार जरूर देखना चाहिये। क्योंकि यह विज्ञापन समाज का वास्तविक स्वरूप दिखाता भी है और साथ में उसे बदलने की राह भी बताता है। देखियेगा जरूर, लिंक नीचे है।

जेंडर इक़्वालिटी का मतलब ये कतई नहीं कि आपका पूरा फोकस लड़कियो को हर मोड़ पर समानता के अधिकार दिलाने केलिये जबरदस्त ज़ंग करने पर देनी पड़े।

बच्चों की परवरिश में जरा सी बदलाव की जरूरत है। उन्हें ये बताने की जरूरत है कि एक अच्छे इंसान होने केलिये क्या सही है और क्या गलत, न कि ये कि वो मेल और फीमेल दो अलग जेंडर के हैं इसलिये उनके पसंद और नापसंदगी केलिये क्या कायदे जरूरी हैं।

शायद तभी युवा होने पर जब एक बेटा अपनी माँ केलिये रोटियां बना सकेगा, किसी दिन अपनी पत्नी केलिये चाय बना कर लायेगा, किसी दिन अपने बच्चों के कपड़े साफ कर लेगा या किसी दिन घर की सफ़ाई करते हुये उसके दोस्त उसे देख लेंगे तो शर्मसार होकर सिर झुकाने की जगह गर्व से सर से उठा कर उनका अभिवादन करेगा। और एक बेटी भी खुद को आत्मनिर्भर समझ कर अपने और परिवार के फैसले लेने में खुद को सक्षम महसूस कर सकेंगी। अपने भविष्य को चुनने, सपने को पाने और जिम्मेदारियों को निभाने केलिये उसे किसी का मोहताज नहीं होना होगा।
आपकी पहुँच देश के अधिकांश घरों में है। बच्चों को आप अपना प्रोडक्ट बेचते हैं तो उनके अभिभावकों को आप अपनी सोच भी पैकेट के साथ भेंट देते हैं। और आपको ये मानना होगा कि एक उत्पाद जिसकी अच्छी पकड़ जन-सामान्य पर है, लोग उसके द्वारा दिये जा रहे संदेश से भी खासा प्रभावित होते हैं। तो क्यों न लकीर के फकीर वाले विचार को छोड़ कर वो बात कहें जिसकी समाज को जरूरत है।

लड़कियों के हिस्से में गुड्डे-गुड़िया और टैडीबियर और लड़को के खेल के लिये बैट-बॉल और बन्दूक ही लिया जाय, वो जमाना बहुत पीछे छूट गया है। छूटी नहीं है तो हमारी सोच।

आप इस सोच के पोषक बनने के जगह समानता का संदेश दीजिये। एरियल और कम्फर्ट जैसे डिटर्जन ने भी समाज के मिथ को ललकार कर समानता और इंसानियत का संदेश देने का प्रशंसनिय प्रयास किया है। उसने बताया है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और। घर कि जिम्मेदारी में योगदान शर्म की नहीं शान की बात है और आज के समय में बेटों को भी इस जिम्मेदारी को ससम्मान निभाने के योग्य बनाना हमारा दायित्व है।

आपके उपभोक्ता को आपका प्रयास भविष्य का कुशल व्यक्ति बनाने में सहायक हो सकता है। बचपन कि गीली मिट्टी से सभ्य, सुदृढ़, शालीन और सक्षम नागरिक बनाने में अगर आप अपना योगदान दे सकते हैं तो उससे पीछे न हटें। अगर किसी तरह आप तक मेरा ये मैसेज पहुँचे तो विचारियेगा जरूर।

3 COMMENTS

  1. बहुत सुन्दर वर्णन। बचपन में भेदभ।व के बीज़ बोना कतइ उचित नहीं।

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