Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Poetries नगरवधू

नगरवधू

 

कमल नयन कटोरे भरे जल की बदली,
जाने कितने हाथों से बँधी वो कठपुतली…
रखकर दाँव पर अपने आत्मसम्मान को,
नगरवधू बन वो मासूम चली इक नगर को !
आबरु उसकी तौली गई चंद सिक्कों में…
दर्ज हुई उसकी दास्ताँ बेबसी के पन्नों में…
इशारों पर ग़ैरों के रोज़ वो बिखरती रही,
पीकर आँसू अपने वो रोज़ ही मरती रही !
बहुत हुआ अपमान, पीड़ा अब न सहेगी…
बनके कठपुतली अब वो और न जियेगी…
अब वो बनायेगी दूसरों को कठपुतलियाँ,
नचायेंगीं रसिकों को अब उसकी ऊँगलियाँ !
नगर के ऊँचे प्रासाद की अब वो नगरवधू है…
थामती है डोर, अब वह स्वयं में ही स्वयंभू है…
सफ़ेदपोशों को अपने इशारों पर नचाती है…
उसकी एक झलक को जनता उमड़ी जाती है !
उसके पाँवों तले बिछती हैं सिक्कों भरी पोटलियाँ,
उसने पाल रखी हैं अब बिना रीढ़ की कठपुतलियाँ..
नारी अस्मिता से अब वो कोई खिलवाड़ न होने देगी,
अब किसी मासूम कली को वो नगरवधू न बनने देगी !
विवश कोमलांगी नहीं, जग जलाने वाली ज्वाला बनो…
निरीहता की सुन्दर मूरत नहीं, स्वयंसिद्घा सबला बनो…
पाँवों की ज़ंजीरें तोड़, सामर्थ्य की नुकीली कँटिया बनो…
बनना है तो कठपुतली नहीं, नचाने वाली ऊँगलियाँ बनो !

 

 

 

 

To read more from Author

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं।लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

सवालों पर बेड़ियाँ – पितृसत्ता की तिलमिलाहट

अक्सर सोचती हूँ की न लिखूं। ये रोज़मर्रा की बातें हैं और घटियापन ,ओछेपन और बीमार मानसिकता पर तो जी ही रहें हैं हम। अपने काम...

अंतरज्वाला

इधर कुछ दिनों से अंजलि बैंक से काफ़ी देर से लौटने लगी थी। अंजलि और अजय दोनों कामकाजी थे। अंजलि बैंक में और अजय...

दो दिल मिले चुपके-चुपके

  "निलेश आज जो हुआ वो ठीक नहीं था" " हां सीमा इस बात का मुझे भी एहसास है कि हमसे अन्जाने में बहुत बड़ी गल्ती...

अब बस

  रूपा सुबह सुबह हाँथ में चाय का कप लिए हॉल में बैठकर टीवी देखते हुए चाय पी रही थी कि तभी उसको डोरबेल की...

Recent Comments