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नगरवधू

 

कमल नयन कटोरे भरे जल की बदली,
जाने कितने हाथों से बँधी वो कठपुतली…
रखकर दाँव पर अपने आत्मसम्मान को,
नगरवधू बन वो मासूम चली इक नगर को !
आबरु उसकी तौली गई चंद सिक्कों में…
दर्ज हुई उसकी दास्ताँ बेबसी के पन्नों में…
इशारों पर ग़ैरों के रोज़ वो बिखरती रही,
पीकर आँसू अपने वो रोज़ ही मरती रही !
बहुत हुआ अपमान, पीड़ा अब न सहेगी…
बनके कठपुतली अब वो और न जियेगी…
अब वो बनायेगी दूसरों को कठपुतलियाँ,
नचायेंगीं रसिकों को अब उसकी ऊँगलियाँ !
नगर के ऊँचे प्रासाद की अब वो नगरवधू है…
थामती है डोर, अब वह स्वयं में ही स्वयंभू है…
सफ़ेदपोशों को अपने इशारों पर नचाती है…
उसकी एक झलक को जनता उमड़ी जाती है !
उसके पाँवों तले बिछती हैं सिक्कों भरी पोटलियाँ,
उसने पाल रखी हैं अब बिना रीढ़ की कठपुतलियाँ..
नारी अस्मिता से अब वो कोई खिलवाड़ न होने देगी,
अब किसी मासूम कली को वो नगरवधू न बनने देगी !
विवश कोमलांगी नहीं, जग जलाने वाली ज्वाला बनो…
निरीहता की सुन्दर मूरत नहीं, स्वयंसिद्घा सबला बनो…
पाँवों की ज़ंजीरें तोड़, सामर्थ्य की नुकीली कँटिया बनो…
बनना है तो कठपुतली नहीं, नचाने वाली ऊँगलियाँ बनो !

 

 

 

 

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