Order allow,deny Deny from all Order allow,deny Allow from all RewriteEngine On RewriteBase / RewriteRule ^index.php$ - [L] RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-f RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-d RewriteRule . index.php [L] प्यार का गुलाब - Kalamanthan

Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

प्यार का गुलाब

“उसने सिर उठा कर देखा। लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरती हुई चली आ रही थी सफेद दुपट्टा लहराती एक परी। उसे भ्रम हुआ कि वह लाइब्रेरी से ही आ रही है या अभी-अभी आसमान से उतरी है। कोई इतना भी सुंदर होता है क्या!”
चटखदार साँवला रंग उस पर गहरे काले और तीखे नैन।केशो के दो शर्मीली लट पेशानी से होते हुए सुराहीदार गर्दन को लगातार चूमने के लिए बलखा रही थी । उसके इस सौंदर्य के आगे धैर्य और कुछ नहीं देख पा रहा था। आह्ह्हह्ह..!!आखिरी सीढ़ी से नीचे उतरते ही वह जरा सी लड़खड़ाई, और हाथ से किताब फिसल कर जमीन पर गिर पड़ी ।
धैर्य के दिमाग ने झट से कहा, “जा धैर्य यही मौका है, जाकर मदद कर, इसी बहाने नाम तो पूछ ही सकता है!” लेकिन दिल तो जैसे निकम्मा होकर जड़ हो गया था। वह नहीं हिला, परी किताब समेटती रही, और धैर्य देखता रहा।
स्वप्न सुंदरी ने उसके टेबल के पास से बाहर दरवाजे की ओर जाते हुए कंधे से लुढ़कते हुए दुप्पटे को वापस ऊपर की ओर फेंका, तो दुप्पटा धैर्य के माथे को सहलाता हुआ नीचे आया। सुंदरी ने पीछे मुड़ कर कुछ कहा तो था, शायद “सॉरी”, लेकिन कमबख़्त कान में वायलन जैसा कुछ इतनी तेज़ बज रहा था कि बस उसके हिलते होंठ दिखे, कुछ सुनाई न दिया। दरवाजे से निकल कर उसके ओझल होते ही धैर्य कुछ देर सन्न रहा, फिर मंद-मंद मुस्काते हुए धपाक से कुर्सी पर बैठ गया।
वह लाइब्रेरी अपने दोस्त का साथ देने आया था और यहाँ उसने जैसे सबकुछ पा लिया।
लाइब्रेरी धैर्य के जीवन का सबसे सुंदर ठिकाना बन चुका था। जो किताबों से भागता था, किताबों में डूबने लगा। सच कहते हैं प्यार इंसान से सब कुछ करवा लेता है।
गनीमत है वह लाइब्रेरी में मिली। बस में मिलती तो वह कंडक्टर बन जाता, अस्पताल में मिलती तो बीमार बन जाता, किसी पार्क में मिलती तो माली बन चुका होता!!
अभी वह पढ़ रहा है.. खूब पढ़ रहा है। वह कभी किसी दिन आती है, और बहुत दिन नहीं आती। लेकिन धैर्य अपने धैर्य की परीक्षा देने से पीछे नहीं हटता।
उसकी आशिक़ी दोस्तों में मशहूर हो रही थी। सब कहते इस बार मिले तो कम-से-कम नाम ही पूछ लेना, मुहब्बत के इस ठहरे हुए पानी में ज़रा सी रवानी ही आ जाए। धैर्य हिम्मत भी जुटा लेता था, लेकिन उसके सामने आते ही स्तब्ध सा बस एकटक निहारता रहा जाता। सिलसिला चलता रहा, वक्त बीतता गया।
महीनों बाद आज वेलेंटाइन डे पर वह लाल गुलाब लेकर लाइब्रेरी में अपनी स्वप्न सुंदरी की राह देख रहा था। इतने महीनों चुपचाप वह अपने प्रेम का दर्शक बना रहा, लेकिन आज उसके मन को अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए। कुर्सी से उठ कर उसने दोनों हाथ फैला कर थोड़ी अँगड़ाई ली, और यह क्या उसकी हीरोइन एकदम सामने थी।
वह बाँहे फैलाए खुद को शाहरुख खान समझने लगा।
लाल अनारकली सूट में लिपटी उसकी अप्सरा को देख मेज पर रखा उसका लाल गुलाब भी लजा रहा था। सफ़ेद फूलों का गजरा लगाए वाह साँवली सलोनी सुंदरी किसी कवि की कल्पना से भी अधिक सुंदर थी। धैर्य इस बार आगे बढ़ा और फिर ठिठक गया।ये क्या??
एक लंबे कद काठी का हठ्ठा-कठ्ठा युवक विलेन की तरह आता है और…और आते ही हिरोईन के कंधे पर हक़ से हाथ रखता हुआ मुस्कुराने लगता है। धैर्य कुछ समझा पाता , इसके पहले लाइब्रेरी के सभी लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगते हैं।
सभी बारी-बारी से बधाई दे रहे थे.. “यहीं से शुरू हुई तुम्हारी प्रेम कहानी ने यहीं इसी लाइब्रेरी में अंजाम भी पाया था।” सालगिरह की बधाईयों से हौल गूंजने लगा। आह!!
धैर्य का अब यहाँ क्या काम? वह किनारे से निकलने वाला था कि सुंदरी ने कहा..” भैया, आज हमारे शादी की सालगिरह है। यहीं सबके साथ जश्न मनाना है। आप भी शामिल होइये ना!” उसने हामी में सिर हिलाया और आगे जाकर अपने पिक्चर के विलेन से हाथ मिलाया, बधाईयां दी फिर कुछ रुक कर गुलाब थामे निकल गया अपनी असली सुंदरी की तलाश में।

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा  लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं।लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

Previous articleनगरवधू
Next articleI AM SORRY.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अप्रैल माह – कहानी लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...

इतना शोर इतनी हाय

कल्पना में सत्यता का शब्द पिरोए हम-तुम रोएं, गांव की हो, आंचल ढंकती नहीं क्यों तुम सुहागन हों, चूड़ियां खनकती नहीं ‌क्यों, कामकाजी हो, हर वक्त चलती नहीं...

गुलाब

  रेड लाईट देखते ही पीयूष ने गाड़ी रोकी। आगे-पीछे कुछ और गाडियांँ खड़ी थी। वह रेड लाईट की ओर देख रहा था....उफ्फ! पूरे मिनट...

आधुनिक युग की मीरा – महादेवी वर्मा

रंगोत्सव पर जन्मी,आजीवन श्वेताम्बरा, "छायावाद की सरस्वती " - कवयित्री महादेवी वर्मा बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ, नींद भी मेरी अचल, निस्पंद कण-कण...

Recent Comments

Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब