Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Blogs बातचीत पर टिकी सम्बन्धों की डोर

बातचीत पर टिकी सम्बन्धों की डोर

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय
सौंह करे भौंहन हंसे देते कहें नटि जाय।

हिंदी साहित्य जगत में उच्च कोटि के कवि बिहारी जी का लिखा दोहा है।उनके रचित दोहे और छंदों में प्राय: प्रेम श्रृंगार और भक्ति के भाव मिलते हैं।
उनके दोहों में द्विअर्थ भाव भी दिखाई देते हैं। मैं कवि बिहारी जी की काव्य शैली के बारे में कुछ कह सकने में सक्षम नहीं हूं।इस दोहे में जो प्रेम के वशीभूत होकर बातचीत करने प्रयास का जो सौंदर्य है । वह मुझे अपनी ओर आकर्षित करता है। आज के समय के परिपेक्ष्य में इस दोहे में निहित अर्थ पूर्णतः सटीक है।
श्रीकृष्ण और गोपियों की लीलाओं के अनेक रूप कथा कहानियों में हम पढ़ते सुनते आए हैं। कृष्ण की बांसुरी की धुन पर सारा ब्रज मोहित था लेकिन गोपियां केवल बांसुरी सुन कर संतुष्ट नहीं थी वे कृष्ण से अपने हृदय की बात कहना चाहती थीं। वे कृष्ण की बांसुरी छुपा देतीं उसे खोजते हुए कृष्ण गोपियों के पास आते और गोपियों से बातें करते।गोपियां साफ मुकर जाती थीं। गोपियों का चुपके से हंसना, अनभिज्ञता जताना जैसे साधारण से व्यवहार का कवि बिहारी जी ने सुंदर चित्रण किया है। हमारे साहित्य में आपसी संबंधों संवाद से उत्पन्न परिस्थिति के चित्रण अनेक कहानियों कविता में मिलेंगे।

 

आप इसे आज के परिप्रेक्ष्य में सोचिए बातें करने में जो सुख था वो हम आप लगभग भूल गये हैं। हमारी व्यस्तता समयाभाव संकोच कुल मिलाकर हम एकाकी हुए जा रहे हैं। लगभग दो दशक पहले हमारे देश में संयुक्त परिवार अधिक पाए जाते थे ।
बदलते समय के साथ लोग जीवनयापन हेतु गांव से कस्बे , फिर शहर और फिर महानगरों में रहने लगे।उन शहरों ने जीने के सुख साधन तो मुहैय्या करवाए लेकिन साथ ही हममें एक असुरक्षा की भावना भी आ गई। हम दिल खोलकर बात करने या यूँ कहें की मित्रता करने में हिचकिचाते हैं।
संयुक्त परिवार में बड़े से बड़े मसले आपस में मिलकर सुलझा लिए जाते थे। बड़े बुजुर्गो की बैठक में बातचीत के दौरान सभी विषयों पर चर्चा होती थी। घर का मुखिया सभी सदस्यों के शोक व ज़रुरतों का ध्यान रखते समयानुसार फैसला लेते । हालांकि उस समय की अपनी समस्या थी । आज के लोग कहेंगे की तब कोई निजी जीवन नहीं था । घर में केवल मुखिया का रोब चलता वे सदस्यों के साथ अन्यान्य भी कर जाते थे।
यह सभी कुछ था लेकिन सुख दुख में सब एकजुट होते थे। कोई समस्या किसी एक की नहीं होती थी । लोगों की भलाई के लिए परिवार और सार्वजनिक कार्यों के लिए पुरा गांव एकजुट हो जाता था।गांव की चौपाल या नदी किनारे पानी भरने के बहाने लोग अपने सुख-दुख साझा करते थे।
समय बदलने के साथ शहरों में काफ़ी हाऊस का चलन हुआ। आपने सुना होगा तमाम साहित्य प्रेमी कवि लेखक थियेटर से जुड़े लोग आपस में चर्चा हेतु एकत्रित होते थे। हमारे स्वतंत्रता संग्राम में ऐसी गोष्टियों ने अहम भूमिका निभाई थी। वहां जन साधारण के हित की देश की तरक्की की चर्चा होती थी उसी के साथ लोग अपनी व्यक्तिगत बातें भी साझा करते थे।ये सभी दृष्य़ लगभग गायब से हो गये हैं। शहरीकरण के साथ हमारी व्यस्त जीवनशैली और आत्मकेंद्रित होना हमारे एकाकीपन के लिए जिम्मेदार है।
इन सब बातों के परिणाम बहुत दुखदाई रूप में प्रगट हो रहे हैं।
अवसादग्रस्त होना आज की सबसे बड़ी बिमारी बनती जा रही है। खेलने की उम्र के बच्चों में अवसाद होना एक दुखद समाचार है। हमारी भावी पीढ़ी एक अलग सा जीवन देख रही है। लोग स्क्रीन पर अनजान दोस्तों के साथ बात करने अन्य प्रकार के मनोरंजन में इतना व्यस्त है कि खुद को भूल गए हैं। आपसी संवाद केवल ज़रुरतें बताने तक सीमित हो गया है।आने वाली पूरी पीढ़ी के एकाकी जीवन की ओर भेज रहे हैं। कभी कभी इसके परिणाम आत्महत्या के रूप में प्रगट हो रहे हैं।
अनजान से छोड़िए लोग अपनों से बातचीत करने से कतराते हैं। कभी समय का अभाव , व्यस्तता और कभी हमारा अहम हमें अपना दिल खोलकर बात करने की इजाजत नहीं देता।हम आप मिलकर इस एकाकीपन को जीवंत करने का प्रयास कर सकते हैं। हम आधुनिक तकनीक के प्रयोग के विरुद्ध नहीं हैं लेकिन कोई तकनीक मानवीय संवेदनाओं का स्थान नहीं ले सकती है।

आपका मोबाइल या रेडियो लोरी अवश्य सुना सकता है लेकिन वो ममता भरा स्पर्श नहीं दे सकता है ।

हमें यह समझना होगा आकाश तक उड़ान भरने वाली पतंग का धागा जमीन से जुड़ा होता है।आपसी समझ और विश्वास के बल पर कोई भी कठिनाई समाप्त की जा सकती है।आपसी बातचीत हमारे बुजुर्गों को एकाकीपन से और हमारी युवा पीढ़ी को बढ़ते असुरक्षा के भाव उससे होने वाली चिंता और तनाव से दूर रखेगी।यह प्रयास दो पीढ़ियों को एकजुट हो करना चाहिए तभी समाज में दबे पांव फैलते तनाव और एकाकीपन को समाप्त कर सकते हैं
हम यदि मिलकर प्रयास करें तो हमारी बैठक हमारे गांव की चौपाल हमारे पार्क और तो और हमारे आपके खाने की मेज़ फिर से गुलज़ार हो सकती है। हमारी हंसी और ठहाकों से जिंदगी फिर खिलखिलाएगी।
Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

किसान

जिस देश में अन्नदाता का अपमान हो, ड्रग्स की पुड़िया की चर्चा पर घमासान हो, अन्नदाता के संघर्ष पर किसी का ना ध्यान हो, बेवजह की खबरों...

संजोग

मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है ना जाने क्यों आज जितेंद्र का ये पुराना गाना बहुत याद आ रहा...

नेकी

सुनीता एक बहुत ही छोटे परिवार में जन्मी थी। बारह वर्ष की उम्र में ही उसकी माँ ने उसे बर्तन मांजने के काम में...

पछतावा

सुनिए ये एड्रेस बता सकेंगी। एक अजनबी की आवाज़ आयी और गेट खोलते हुए ही उसने पीछे मुड़ कर देखा, ये तो सुबोध ही...

Recent Comments