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तेरे बिना जिया जाए ना

शाम होने को आई थी, घर और बच्चों के लिए कुछ जरूरी सामान खरीदकर मोना तेज कदमों से घर जा रही थी तभी पीछे से किसी की आवाज आई, “हैलो….हैलो मैम आपकी थैली नीचे गिर गयी”।
मोना जैसे ही पीछे मुड़ी उस शख्स को देखकर अचंभित रह गई, उसे ऐसा लगा मानो उस कड़कती ठंड में किसी ने एक बाल्टी ठंडा पानी उसके सर पर डाल दिया हो, पूरे बदन में कपकपी फैल गई, होंठ सूखने लगे, आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वो बेहोश हो गई।
कुछ देर बाद आँखें खुली तो हड़बड़ा कर उठी, देखा तो अपने बिस्तर पर लेटी हुई है और उसके पास मनोज और उसके दोनों बच्चे बैठे हुए हैं।
“दीदी, अब तुम्हारी तबीयत कैसी है? तुम्हारा बी.पी लो हो गया था। कितनी बार कहा की अपने शरीर पर ध्यान दो, लेकिन तुम्हें तो मेरी बात समझ ही नहीं आती है। डाॅक्टर ने कुछ दवाईयां लिखी हैं, मैं लेकर आता हूँ” – इतना कहकर मनोज वहां से चला गया।

“मम्मा आपको क्या हो गया था?

“कुछ नहीं बच्चे”, आशू को गोद में उठाते हुए मोना ने कहा लेकिन अभी भी वो शख्स उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। तभी मनोज दवाई लेकर वापस आया।

“दीदी तुम किचन में क्या कर रही हो, डाॅक्टर ने तुम्हें आराम करने के लिए कहा है, सब्जी रखो, मैं खाना बना लूंगा।”

“अरे मुझे कुछ नहीं हुआ है तू बहुत चिंता करता है। मैं ठीक हूँ, ले.. किन, थोड़ी सकुचाते हुए मोना ने पूछा – मुझे घर कौन ले आया? मुझे किसी ने फोन किया तुम्हारे मोबाइल से तो मैं वहां आया और देखा विमला चाची और रमा चाची तुम्हें पकड़े हुए ले आ रहे थे, ये कहो मैं पास ही बंटी के घर ट्यूशन ले रहा था। पता नहीं किस शख्स ने फोन किया था, मेरे आने से पहले शायद वो चला गया था।”

अब हर समय मोना के आँखों के सामने उसी शख्स का चेहरा घूम रहा था,

दूसरे दिन मोना अपना बैग में लंचबॉक्स रख रही थी तभी उसकी नज़र रवि की तस्वीर पर पड़ी जो उसने पर्स में रखा था, रवि की तस्वीर देख अतीत में खो जाती हैं तभी मनोज ने कहा – दीदी मैं स्कूल के लिए निकल रहा हूँ, तो मोना सकपका कर उठ गई हाँ… हाँ ठीक है। दोनों बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते थे, जिस स्कूल में मनोज टीचर था”।
“मोना भी रेडी होकर दफ्तर के लिए निकल गई, रास्ते भर उस शख्स का इंतजार कर रही थी, फिर सोचा ये कैसे हो सकता है,शायद मेरा वहम हो। यही सोचते-सोचते आफिस पहुंच गई। शाम को काम से निकलने में थोड़ी देर हो गई, अंधेरा भी हो गया था। मोना घर के लिए निकल पड़ी तभी उसे याद आया की आशू ने कलर पेंसिल लाने के लिए कहा था”।
“रास्ते में ही एक स्टेशनरी की दुकान पड़ती है, वहीं से ले लूंगी…. ये सोच मोना चलने लगी, दुकान पास ही था। अब वो भी बंद होने जा रही थी, तभी मोना ने कहा भईया एक कलर पेंसिल का पैकेट और दो नोटबुक दे दीजिए और… तभी एक शख्स मोना की बात काटते हुए बोल पड़ा भईया मुझे चार नोटबुक, मार्कर और दो ग्रीटिंग कार्डस दे दो, इतना कहकर मोना की तरफ मुड़ा।
“अरे आप तो वहीं हैं जो कल मिली थीं अब कैसी हैं आप? कल आप मु्झे देखकर बेहोश हो गई थीं।”
मोना कुछ नहीं बोल पाई बस एकटक देखते रही। तभी दुकानदार ने कहा बहन जी ये रहा आपका सामान और ये आपका भाईसाहब। मोना ने पैसे दिए और दुकान से बाहर निकल गई।
“सुनिए मेरा नाम साहिल हैं और आपका?”, नाम सुनकर मोना के कदम रूक गए और कुछ देर साहिल के तरफ देख वापस जाने लगी। घर पहुंचकर खाना बनाकर खिलाया और बच्चों को सुलाने के बाद गहरी सोच में डूब गई – क्या ऐसा हो सकता हैं?
बिलकुल रवि की छवि वैसे ही मुस्कान, वही चुलबुलापन , वहीं बोलने का ढंग, क्या वो मेरे लिए वापस आया है, इतना सोचते ही चेहरे पर एक मुस्कान फैलते ही सिमट गई.. ले.. लेकिन उसने तो मुझे पहचाना ही नहीं। आँखों से आंसू की बरसात होने लगी, दिल में  बिछोह  का असहनीय दर्द उठा।
“दूर कहीं से गाने की आवाज आ रही थी.. तेरे बिना जिया जाए ना… बिन तेरे.. तेरे बिन साजना सांस में सांस आए ना…। मोना का रोम – रोम रो रहा था, दिल से यही आवाज आ रही थी क्यों चले गए मुझे इस मझधार में अकेला छोड़कर… रोते-रोते न जाने कब उसकी आंख लग गई”।
“सुबह मोना ने खुद को समझा लिया की वो रवि नहीं हैं लेकिन दिल मानना नहीं चाहता था और आज आईने में करीब से खुद को देखा तो उसे अहसास हुआ की वो समय से पहले ही चेहरे पर न झूर्रियां पड़ गई है। रवि को मोना का सादा रहना बिलकुल पसंद नहीं था, अपनी सूनी कलाईयों को देख उसे रवि की याद हो आयी उसकी कही बातें की कही बातें याद आई –

लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरती दुपट्टा सँभालते हुई तुम परी सी लग रही थी , इतना भी सुंदर कोई होता है भला ?

शादी के बरसों बाद भी शर्म से लाल हो जाती मोना

रवि हमेशा कहता की तुम हाथों में भरकर चूड़ियां पहनों मुझे बहुत पसंद हैं और वो मेरे लिए रंग-बिरंगी चूड़ियां ले आता और खुद अपने हाथों से पहनाता।

“मम्मा मुझे खाना दे दो ना”, रूनु ने मोना को बोला तो उसकी तन्द्रा टूटी।
“हां.. बेटा देती हूं”, मोना ने दोनों बच्चों को स्कूल के लिए रेडी किया। मोना की अभी उम्र ही क्या थी, इस छोटी उम्र में पति का साथ छुट गया। शादी को छह साल ही हुए थे, एक रोड एक्सीडेंट में रवि की मृत्यु हो गयी। ससुराल वालों ने मनहूस कहकर घर से निकाल दिया और अब अपने मायके में ही रह रही थी। दामाद के गुजरने के सदमें में मां भी चल बसी अब बस इकलौता भाई का ही सहारा था। मनोज ने कुछ लोगों की मदद से मोना की नौकरी लगवा दी थी।

“जबसे उसने साहिल को देखा था तब से मोना की जिंदगी उथल-पुथल हो गयी, दिन – रात वहीं नजर के सामने रहता। खोई -खोई ही रहने लगी थी…मोना उसकी तरफ खींचती जा रही थी, रास्ते में उसके आने का इंतजार करना, उसकी एक झलक पाने की कोशिश में लगी रहती।

आज फिर आंफिस से लौटते वक्त वो लड़का मिला। सुनिए उसने मोना को पुकारा ..आज मोना रूक गई। एक लिफाफा थमाते हुए उसने कहा हैप्पी न्यू ईयर। उत्तर में मोना ने सेम टू यू कहा। फिर दोनों की बात शुरू हो गई। मोना इतनी सुन्दर थी की किसी का भी दिल उसपे आ जाए”।

“आपने अपना नाम नहीं बताया?
“मोना.. मोना नाम हैं मेरा”।
‘मैं तुम्हें.. आपको मीनू कहूं तो बुरा तो नहीं मानेंगी ना”।
मोना ने सर हिलाकर स्वीकृति दे दी। आप बहुत खूबसूरत हैं’ – साहिल ने कहा।
“मोना शरमाते हुए मुस्कराई।
“मैं यहा इंजीनियरिंग कॉलेज में फर्स्ट ईयर का स्टुडेंट हूं।” मोना बहुत खुश थी जैसे रवि उसे वापस मिल गया हो।
“एक कप चाय हो जाए हमारी दोस्ती के नाम”? मोना ने हामी भर दी। तभी वहां से मनोज गुजरा वो भी साहिल को देखकर अचंभित रह गया और दीदी के स्वभाव में आए हुए बदलाव का कारण समझ गया”।
“मनोज घर पहुंच गया और मोना का इंतजार करने लगा।करीब आधे घंटे बाद मोना आई। आज बड़ी देर कर दी आपने” – मनोज ने कहा। “वो आफिस में काम अधिक था, इसलिए देर हो गई”। दूसरे दिन सुबह  उठकर देखा तो मोना जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार कर रही थी।
मनोज से कहा –  मैंने नाश्ता तैयार कर दिया हैं, तुम बच्चों को उठा दो। मैं नहाकर आ जाती हूं नहीं तो स्कूल के लिए लेट हो जायेंगे। दीदी आज इतवार हैं और आज हमें मंदिर जाना हैं, क्या तुम ये भी भूल गई। मोना सकपका गई “अरे आज रविवार हैं, मैं तो भूल ही गई थी, लेकिन मंदिर क्यों जाना हैं तुमने कोई पूजा रखी हैं क्या?”

“दीदी आज जीजा जी की बरसी हैं, ये बात तुम कैसे भूल सकती हो? परछाई के पीछे भागने से कुछ हासिल नहीं होगा और वो साहिल एक मृगतृष्णा हैं और कुछ नहीं। वो दोस्त बन सकता हैं हमसफ़र नहीं”।

 

दीदी तुम्हारे और साहिल के उम्र में काफी अंतर हैं, वो अभी इस लायक नहीं हैं जो इस रिश्ते को संभाल सके। तुम्हारे तरफ खींचना ये सिर्फ आकर्षण हैं और कुछ नहीं। अगर कोई अभी आगे बढ़कर तुम्हारा हाथ मांगे और इस रिश्ते की नाजुकता को समझें, बच्चों की जिम्मेदारी लें सके तो मैं खुशी – खुशी तुम्हारा साथ दूंगा।”

“ये सब सुनकर मोना जैसे चीर निंद्रा से उठ गई और आज उसे अपने आप से घृणा हो रही थी, आज रवि की बरसी थी और मुझे याद नहीं रहा, मैंने रवि का दिल दुखाया हैं वो मुझे कभी माफ नहीं करेंगे। मुझे माफ कर दो मनोज… मैं भटक गई थी, परछाई के पीछे भाग रही थी।” इतना कहकर रवि की तस्वीर के सामने चीख -चीखकर रोने लगी। बच्चे रोने की आवाज सुनकर उठ गये और वो भी रोने लगे”।

मनोज ने मोना को संभालते हुए कहा – “दीदी शायद तुम्हारी जगह कोई और भी होता तो वो भी यही करता, तुम्हारी इसमें कोई गलती नहीं हैं। साहिल जीजा जी की परछाई हैं और सिर्फ परछाई। परछाई के पीछे भागने से कुछ हासिल नहीं होगा, संभालो अपने आप को”।तुम्हारी प्राथमिकता बच्चे होने चाहिए, उनके भविष्य पर ध्यान दो। जीजा जी भी यही चाहतें होंगे।

“दूसरे दिन एक नयी मोना नजर आई जो अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए नये साल में एक नये जीवन की शुरुआत करने जा रही थी और फिर उस डगर कभी नहीं गई जो उसे उसके फर्ज से विमुख कर दे”।

दोस्तों  जीवन में कभी – कभी ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जो विश्वास के परे होती हैं। कहानी पसंद आए तो लाइक और कमेंट करके जरूर बताएं और मेरी आगे की कहानियों को पढ़ने के लिए मुझे फाॅलो जरूर करें।

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