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फरेबी इश्क

“नगीना अरे ओ नगीना पता नहीं ये लड़की कहां है दिन चढ़ आया है और अभी तो कॉलेज के लिए देर भी हो रही है”, बड़ी मां नगीना को बुलाते हुए। बड़ी मां यानि की घर की सबसे वफादार मुलाजिम जिनकी पुश्तों ने इस हवेली की सेवा की थी ,उम्र में घर की औरतों में सबसे बड़ी होने से घर के सभी इन्हें बड़ी मां कहकर पुकारते थे। जो नगीना को सारी हवेली में ढूंढ रही थीं।
” हाय राम, तू यहां अम्मा के पास बैठी है और सुषमा ज़मीनदारनी नाश्ते की प्लेट लगाए तेरा इंतज़ार कर रही है”, बस बड़ी मां अभी अाई वोह अम्मा के पैर में दर्द हो रहा था इसलिए मैंने सोचा कॉलेज जाने से पहले लगा जाऊं नहीं तो शाम तक कराहती ही रहेंगी।
“हम्म !!! पर तेरा कॉलेज का वक़्त होने लगा है बिटिया”, बड़ी मां दोहराते हुए।
दादी सास को तेल लगाकर नगीना जल्दी से अपनी सास के साथ नाश्ता खाकर निकल जाती है कॉलेज।
तीन साल पहले की ही तो बात है ज़मीनदार साहब के छोटे बेटे लेफ्टिनेंट कर्नल राज सिंह का विवाह नगीना के साथ बड़ी ही धूम धाम के साथ किया गया था। राज सिंह के व्यक्तित्व के जितनी तारीफ़ की जाए कम होगी। एक तो ज़मीनदार और ऊपर से सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल। राज सिंह के विवाह की तैयारियों में किसी भी प्रकार की कमी नहीं की गई। पूरी हवेली को दुल्हन की तरह सजाया गया।
और नगीना राज की दुल्हन बन हवेली में आ गई।
नगीना जैसलमेर के बॉर्डर से सटे पड़ोसी देश के खैरपुर शहर में रहने वाली एक हिन्दू परिवार की लड़की थी। जो मां बाप को आर्थिक सहायता के लिए लाइब्रेरी में नौकरी करती थी।
राज सिंह एक खुफिया एजेंट बनकर उस शहर में तैनात किए गए। ताकि वो खबर के मुताबिक उस शहर में हो रही आतंकी गतिविधियों पर निगरानी रख सकें।
राज अपने होटल के कमरे की खिड़की से बाहर का मुआयना कर ही रहे थे कि अचानक उनकी नज़र एक लहराते दुपट्टे पर पड़ी। सामने ही एक कॉलेज था जिसकी सीढ़ियों से उतरती हुई इस खूबसूरत हसीना पर जैसे राज की नज़रें जम सी ही गई हों।
लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरती हुई ये हसीना अपने उड़ते दुपट्टे को संभालने की पूरी जद्दोजहद करती किसी परी जैसी दिख रही थी।
ट्रिंग ट्रिंग!!! लगातार बजती फोन की घंटी से राज का ध्यान वापस लौटा।
*”सर खबर है कि कॉलेज की लाइब्रेरी से कुछ गैर कानूनी हरकतें होती हैं जिसका सिग्नल हमें कंप्यूटर पर मिला है, पर हमें लाइब्रेरी में घुसने के लिए किसी की मदद की जरूरत पड़ेगी”, पुख्ता खबर है न, मैं कुछ बंदोबस्त करता हूं कहकर राज फोन रख देता है।
लाइब्रेरी की पूछताछ के लिए राज बाज़ार में बदले हुए भेष में घूम रहे होते हैं और पूछते पूछते एक स्टेशनरी की दुकान पर रुक जाते हैं और दुकान वाले भाई से कुछ शायरों की किताब के बारे में पूछते हैं जिसके जवाब में दुकानदार उन्हें लाइब्रेरी में मिल सकती हैं ये किताबें कहकर लाइब्रेरी की तरफ इशारा करता है।
“पर भाईजान इस लाइब्रेरी में जाने के लिए तो मेंबरशिप की जरूरत पड़ेगी और में रहा परदेसी मैं तो व्यापारी हूं मुझे मेंबरशिप कैसे मिलेगी? क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?,”राज उतावला होकर पूछताछ करने लगता है कि इतने में पीछे से एक आवाज़ आती है,”जी लगता है आपको शेर और शायरी का बहुत शौक है”, राज सहमकर मुड़कर देखता है और कुछ सेकंड्स के लिए खो जाता है। ये वही चेहरा था जो दूर से ही राज की आंखों में बस गया था।
“जी, जी हां.. बस यूं ही थोड़ा बहुत शौक है”, कहकर राज अपने होश संभालता है।
“तो फिर देर किस बात की ये लीजिए मेरा नंबर और आ जाइए लाइब्रेरी, मैं दिलवा देती हूं मेंबरशिप आपको”,नगीना अपना नंबर राज को देकर चलने लगती है।
“पर आपका नाम”, राज थोड़ा झिझकते हुए पूछता है।
* नगीना*
कहकर रफ़्तार से आगे बढ़ जाती है।
दूसरे ही दिन राज नगीना को फोन करके लाइब्रेरी में घुस जाता है।
धीरे धीरे राज और नगीना की दोस्ती होने लगती है।
नगीना हिन्दू थी और घर खर्च के लिए नौकरी करती थी इस सब की जानकारी राज को मालूम चली।
इधर राज अपने खुफिया मिशन में धीरे धीरे सफल हो रहा था उधर नगीना के प्यार में भी। और एक दिन लाइब्रेरी से चलने वाली आतंकी गतिविधियों को एक योजना के तहत खत्म कर दिया गया। राज और उसकी पूरी टीम ने अपनी सूझ बूझ से इस मिशन पर फतेह पा ही ली।
मिशन सफल होते ही राज नगीना के मां बाप से उसका हाथ मांगने पहुंच जाता है। बेटी के लिए इससे अच्छा रिश्ता और कोई नहीं हो सकता था। एक हिन्दू परिवार को इससे ज्यादा और क्या चाहिए था। राज जैसा सीधा साधा व्यापारी जो बॉर्डर पार करके जान जोखिम में डालकर पराए मुल्क आकर व्यापार शुरू करता है बस इतनी सी जानकारी घर वालों को प्राप्त होती है। और पूरा परिवार राज की गुजारिश पर उसके शहर आने को तैयार हो जाता है।
गांव वापस आकर दोनों का ब्याह बड़े जोर से किया जाता है। और गांव आकर ही नगीना और उसके परिवार वालों को राज के लेफ्टिनेंट कर्नल, बड़े भाई अर्जुन सिंह के एयर कमोडोर और उसके ससुर जी राकेश सिंह के ब्रिगेडियर जनरल होने की खबर लगती है।
कुछ ही समय में नगीना परिवार के रंग ढंग में ढलने लगती है। और उसके मां बाप भी बेटी के ब्याह के बाद उस ही गांव में बस जाते हैं। नगीना जब भी समय मिलता था अपने मां बाप से मिल आती थी।
शादी के बाद सब कुछ ठीक रहा पर बॉर्डर पर बढ़ती गतिविधियां बाप बेटे के गले की हड्डी बनती जा रही थीं।
खबर मिली थी कि कुछ आतंकवादी देश में घुसपैठ की योजना बना रहे हैं जिनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए ब्रिगेडियर ने राज को एक टुकड़ी के साथ बॉर्डर पर बने जंगल की तरफ से कूच करने का आदेश दिया।
पर न जाने कहां और कैसे अतांकवादियों को राज की इस योजना की खबर लग गई और एक भीषण मुठभेड़ में राज वीरता को प्राप्त हो जाता है।
राज की शहादत की खबर से ब्रिगेडियर राकेश सिंह एक झुके हुए वृक्ष की तरह टूट जाते हैं पर देश के आगे जज़्बातों की अग्नि को ज्यादा देर सुलगने नहीं देते।
राज को बेतहाशा चाहने वाली नगीना उसकी मौत का सदमा सह नहीं पाती है। महीनों अपने कमरे में बेहाल पड़ी रहती है।
और फिर एक दिन बड़ी मां और सास के समझाने पर होश संभाल सबके साथ उठना बैठना शुरू करती है। कुछ ही दिनों में सामान्य हो , सबका आशीर्वाद ले शहर की लाइब्रेरी में नौकरी करना शुरू कर देती है ताकि उसका मन बंट जाए।
इधर ब्रिगेडियर देश में बढ़ती जा रही अराजकता से दिन रात परेशान थे। उधर बड़ा बेटा अर्जुन भी डिपार्टमेंट में बढ़ी उथल पुथल से ज्यादा व्यस्त था।
तीनों बाप बेटे मिलकर देश की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। राज ज़मीन और अर्जुन आसमान में अपनी धाक जमाए रखता था। पर राज की मौत से ये तिकड़ी थोड़ी से गड़बड़ा जरूर गई थी।
एयर कमोडोर अर्जुन ज्यादातर घर से बाहर डयूटी वाले क्षेत्र में ही रहा करते थे और बीच बीच में बीवी मायरा और दो बेटियों के साथ मां बाप के पास भी आते जाते थे। पर राज के जाने के बाद अर्जुन और मायरा के चक्कर अपने घर ज्यादा लगने लगे।
मायरा को नगीना का सामान्य होता व्यवहार अच्छा नहीं लग रहा था खासकर उसका उसके कमरे में हर वक़्त बंद रहना।
एक दिन जब दादी के पैर में बहुत तेज दर्द हुआ तो उन्होंने तेल के लिए नगीना के पास जाकर लाने के लिए मायरा को इशारा किया। मायरा को पता था कि नगीना नहीं है पर फिर भी वो तेल लेने के लिए उसके कमरे में पहुंच जाती है।
देवर राज के रहते हुए कभी किसी को उनके कमरे में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। तेल की शीशी ड्रेसिंग टेबल से उठाकर मायरा पलटती है कि उसे कोई सिग्नल जैसी आवाज़ आती है।
नगीना के आने से पहले ही इसकी सूचना घरवालों को दे दी जाती है।
समय रहते ही उस सिग्नल का पता लगाने पर वहां एक एक्टिव टाइम बॉम्ब मिलता है जिसे नगीना उर्फ़ रसिया बेगम ने उस घर की बर्बादी के लिए लगाया था।
अपने शहर की लाइब्रेरी के पूरे प्लान की मास्टर माइंड रसिया बेगम अपने ही शहर में भेष बदलकर हिन्दू लड़की बनकर रह रही थी ताकि उस पर किसी को कभी शक न हो।
राज से मिलने के बाद उसे शक हुआ था इसलिए रसिया जब होटल के कमरे में उससे मिलने के बहाने वहां आती है तो उसकी गैरहाजिरी का मौका पाकर छानबीन करती है जिसमें उसे राज के हिन्दुस्तानी अंडर कवर एजेंट होने का पता चलता है।
अपने साथियों की मौत और प्लान के तहस नहस होने का बदला लेने के लिए रसिया राज से न सिर्फ शादी करती है बल्कि राज की मौत की साज़िश भी कर उसे मौत के घाट उतार अपना आधा बदला लेती है और हिन्दुस्तानियों को उनके ही घर से बर्बाद करने की योजना अपने आकाओं के साथ मिलकर बनाती है।
पर शायद जेहाद के नाम पर नर संहार मचाने वाले अतांकवदियों की इस दूत को और उसके नापाक मंसूबों को मसलने के लिए ब्रिगेडियर और एयर कमोडोर ने उसे चोरी से बॉर्डर क्रॉस करते हुए धर दबोचा और इंसान की शक्ल में छिपी इस आतंकी को देश के हवाले कर दिया।

 

 

 

 

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