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इत्तफाक

आज उसका दाखिला विश्वविद्यालय में एक शोधकर्ता के रूप में हुआ।सारी औपचारिकताएं पूरी कर थोड़ी बहुत सीनियर्स की खिंचाई भी झेला फिर थक कर पुस्तकालय के ठीक सामने के लाॅन में बैठ गया।
लाॅन के एक कोने में उसने देखा कि एक बुढ़िया बैठी मूंगफली बेच रही थी।
मूंगफली और वह,खुद को रोक पाए ऐसा हो ही नही सकता।वह लपक कर बुढ़िया अम्मां के पास गया और सौ ग्राम मूंगफली लेकर खाने बैठ गया।घर जाना भी संभव नहीं था उसकी चचेरी बहन ने भी यहीं दूसरे विभाग में दाखिला लिया है। उसी का इंतजार वह कर रहा था। जैसे ही मूंगफली खत्म हुई …. उसने सिर उठाकर देखा।

लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरती हुई चली आ रही थी सफेद दुपट्टा लहराती एक परी।उसे भ्रम हुआ कि वह लाइब्रेरी से ही आ रही है या अभी अभी आसमान से उतरी है।कोई इतना भी सुन्दर होता है क्या?

सौन्दर्य की अप्रतिम मूरत वह देखता ही रह गया। श्वेत वसना वह सद्यस्नाता सी लग रही थी। जल्दी ही वह मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली और उसकी आंखों से ओझल हो गई।वह स्वयं को संभालना चाह ही रहा था कि अतीत में खो गया।नवीं कक्षा का छात्र था वह तब।उसका घर लखनऊ की एक अच्छी सोसायटी में था ,वह मध्यमवर्गीय परिवार से था।घर के सामने पार्क और पार्क के दूसरी ओर एक आलीशान बंगला। शाम को रोज वह अपने दोस्तों के साथ पार्क में खेलने जाता था।यह उसकी रोज की दिनचर्या थी।
वह दिन उसे आज भी याद है जब बाॅल खेलते खेलते उसकी नज़र पार्क के कोने में खड़ी एक बहुत ही प्यारी अति सुन्दर सी लड़की पर पड़ी जो चुपचाप देख रही थी। उसके साथ एक प्रौढ़ महिला भी थी ,देखने से वह उसकी आया लग रही थी ।उसने सोचा जरूर वह सामने के बंगले में रहती होगी,उसका कपड़े पहनने का सलीका,उसका सौन्दर्य सब पढ़ते हो , पढ़ाई करो परी मत देखो और वह तो छोटी बच्ची है।अरे तो मैं कौन सा बड़ा हूॅ॑ उसने कहा_मैं भी तो बच्चा हूॅ॑ ,सब हंसने लगे।
लगभग दस दिनों तक यह चक्र चलता रहा। फिर वह न दिखाई दी , उसने भी क्यों ,क्या ,कैसे आदि सोचना छोड़ दिया और अपनी पढ़ाई में मशगूल हो गया।

तीन वर्षों से अधिक हो गए न कभी परी उसे दिखी न उसने पता किया, हां उसे वह परी ही कहता था अपने मन में ही सही।

अचानक उसकी बहन अमृता ने आवाज लगाई वह अचकचा कर उठा जैसे लम्बी तन्द्रा से उठा हो और अमृता के साथ मेन गेट कीओर बढ़ा ,मेन गेट पर उसने अमृता को रिक्शा दिलवाया,चाचा जी का घर दूसरी दिशा में था। उनकी आज्ञा थी दो चार दिन अमृता की मदद कर देना ।
मेन गेट तक आने तक का रास्ता चुपचाप गुज़रा वह चाहते हुए भी परी समान उस लड़की के बारे में बात नहीं कर पाया अमृता क्या सोचती कि भइया पहले ही दिन विश्वविद्यालय में रम गए।सोचते सोचते रात कटी और सुबह जल्दी जल्दी तैयार होकर वह अपने विभाग पहुॅ॑चा। शुरूआती दौर था जल्दी जल्दी काम निबटा कर वह लाइब्रेरी की ओर भागा , शोधकर्ता तो वह था ही लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ना भी था।
थोड़ी देर में ही वह आ गई ।आज उसने उसे सीढ़ियों से उतरते नहीं पास से देखा बला की खूबसूरत थी वह। बेबी पिन्क कलर के सलवार सूट में वह सचमुच परी लग रही थी।वह तो जैसे शून्य में भ्रमण करने लगा ।दूसरा दिन आया वह घर से सोच कर निकला कि आज जैसे भी हो उसका नाम पूछेगा, बातें करेगा आदि।
आज जब वह लाइब्रेरी पहुॅ॑चा तो वह बैठी थी पास में ही एक शोधपत्र लेकर वह भी बैठ गया थोड़ी देर में उसने उसका नाम पूछा पता चला उसका नाम शगुन है अपना नाम शरद बताते हुए उसे भी हंसी आ गई __दोनों का नाम “श”से आरम्भ था।शरद ने भी बताया कि स्नातक व परास्नातक उसने दिल्ली से किया है और लखनऊ से शोध करेगा। दोनों की दोस्ती बढ़ती गई और प्यार की सीढ़ियां चढ़ने लगीं।
एक दिन शरद ने शगुन को अपनी मां से मिलवाने का आग्रह कर घर चलने को कहा ।शगुन भी तैयार हो गई जैसे ही दोनों घर के पास पहुॅ॑चे शगुन बड़ी ही तेजी से बोली अरे मैं तो कुछ साल पहले यहां आ चुकी हूॅ॑,ये पार्क के सामने जो बंगला है वह मेरी बुआ जी कि था ,बुआ फूफा बंगला बेच कर अमेरिका चले गए। मैं उस दौरान यहां पार्क में रोज आती थी।शरद के मस्तिष्क में हजारों ख़्याल दौड़ने लगे___क्या ये परी वही परी है जिसे उसने बचपन में परी का नाम दिया था।
आज तीन साल बीत गए उसका शोध कार्य भी पूरा हो गया और शगुन का स्नातक …..और इत्तफाक है कि दोनों पति-पत्नी के रूप में हमारे सामने खड़े हैं ।

 

 

 

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1 COMMENT

  1. Samaj ka chehra hai ye…bhot hi achi kahani…jise padh ke sar garv se uncha ho or samaj ki aise kuritiyo se dat ke ladne ka naya hausla mile

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