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ठहरा हुआ पतझड़

 रैना बीती जाऐ, श्याम ना आये
निन्दिया ना आये…….
एक सुरीली आवाज ने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी लेकिन बुरा नही लगा, वो आवाज थी इतनी मीठी थी। तभी माँ  कमरे मे आई  
“अरे तू जाग गया, उठ जा। गोधूलि में सोते  नहीं हैं।” 
इतना कहकर वो वापस  चली गईं। 
मै लेटे लेटे गाना सुनता रहा। 
        श्याम  को भुला  शाम  का वादा  रे 
कुछ था उस आवाज़  में जो  मुझे  बांध रहा था। मै उठकर माँ के पीछे रसोई की  तरफ  चला गया। 
माँ  ये कौन  गा  रहा है ?
माँ  मुस्कुरा कर बोली “अरे ये निवि  है। मीठा गाती  है न। मुसीबत के मारे माँ बेटी अपने नए किराएदार  हैं।” 
तब तक गाना खत्म  हो चुका  था। 
अरे अपना परिचय तो दिया ही नहीं।  मै  अनूप दास फौज में नौकरी है। नया नया तबादला लैह हुआ है वहाँ  जाने से पहले अपनी माँ  से मिलने कलकत्ता आया हूँ। बहिन की शादी हो चुकी है वो इसी शहर में  रहती है। बाबा अपने ज़माने मे बड़े अधिकारी थे। लगभग पांच साल पहले उनका देहांत हो गया था। बड़े से मकान  में माँ अकेले रहती थीं। पुराने किराएदार चले गए थे।  माँ ने यह बात मुझे फ़ोन पर बताई थी। 
मै  देख रहा था माँ इन लोगों के आने से बहुत खुश थीं। मेरी बहिन की शादी के बाद माँ अकेली हो गई थीं। शायद इस लड़की ने वो कमी पूरी कर दी थी। 
सुबह थोड़ा देर से जगा था। माँ ने मुझको चाय दी और मै टहलता हुआ बालकॉनी  की तरफ चला गया। मौसम में उमस थी लेकिन हवा चल रही थी। आसपास के पेड़ों से पंछियों का शोर अच्छा लग रहा था। तभी मेरी निग़ाह  पिछले आँगन की तरफ गई वहां एक बीस बाइस साल की लडकी सूर्यदेव को जल दे रही थी.. 
गीले बालों  का जूड़ा  बनाये गेहुँआ रंग सादी  सी सूती साडी पहने, आभूषण के नाम पर केवल हाथों मे एक लोहे का कड़ा था. मै  अभी देख ही रहा था की माँ वहां आ गईं और बोलीं  “अनु ये देख यही निवी  है” 
मै  कुछ कहता उन्होंने निवी को आवाज़ लगाई 
       “निवी ये देख ! ये है मेरा बेटा  अनूप!
उसने वही से हाथ जोड़  लिए और मेरी ओर  देखा, वो बड़ी बड़ी सी काली आँखें लेकिन बिलकुल सूनी।  बहुत कुछ छिपा था मगर क्या किससे  पूछता ?”  
        अब मै लगभग रोज़ शाम को निवी का रियाज़ कमरे मे बैठ कर सुनता। ये मेरी दिनचर्या बन गई थी।  दो  दिन के बाद अचानक रात को लगभग दस बजे किसी ने दरवाज़ा ज़ोर से खटखटया। मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा निवी बदहवास सी खड़ी थी. 
         वो घबराकर बोली “काकी माँ जल्दी चलिए माँ बेहोश होकर आँगन मे गिर गई हैं।” 
मै और माँ घबराकर उसके साथ भागे , देखा तो एक बुजर्ग महिला आँगन मे बेहोश पड़ी हैं। मैंने तुरंत गाड़ी निकलीऔर हम सभी अस्पताल लेकर गए। निवि की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। गाड़ी के शीशे मे मैंने उस दोबारा देखा चेहरे पर गजब की मासूमियत लिए वो बेहताशा रो रही थी। मेरी माँ लगातार महा मृत्युंजय का जप कर रही थीं। सबके चेहरे पर परेशानी देख मै भी घबरा रहा था। मुझे भी याद  आ रहा था कैसे इसी तरह हमने बाबा को खो दिया था। ऐसे ही बाबा बिस्तर पर गिरे और फिर कभी नहीं उठे। तब मै  केवल अट्ठारह बरस का था। 
         हम अस्पताल पहुंचे और निवी की माँ को तत्काल चिकित्सा कक्ष मे लिटा दिया।डाक्टर ने इलाज शुरू कर दिया था। डाक्टर ने कहा दिल का दौरा पड़ा है। रात भर  जरुरी जाँच होती रहीं।  मैने निवी को सांत्वना देने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ। अपनी माँ को इस हालत मे देख शायद वो बहुत डर गई थी।  
       वो रात हम सबके लिए बहुत भारी थी। सुबह उनकी बेहोशी ख़तम हुई। 
अगले दो तीन दिनों तक वो अस्पताल मे भर्ती रहीं। निवी मेरे साथ जाती जरूर लेकिन ज्यादा बातचीत नहीं होती। चौथे दिन हम उनको घर ले आये।निवी जी जान से  उनकी सेवा कर रही थी। माँ सुबह शाम उनको देखने जाती थीं। तीसरे दिन मे भी माँ के साथ निवी के घर काकी को देखने चला गया। 

       आज सालों के बाद मे अपने ही घर के पिछले हिस्से मे आया था। वो जगह बेहद खूबसूरत लग रही थी। फूलों के कई पौधे थे कुछ मे फूल थे  तो कुछ केवल हरियाली  से ही अपनी सुंदरता बिखेर रहे थे। वहां गुड़हल और गुलाब के भी पेड़ लगे थे। वहां एक हरसिंगार का पेड़ था जो फूलों से लदा था। चारों ओर खुशबू बिखरी थी।

माँ तब तक अंदर जा चुकी थी।  मै वही मंत्रमुग्ध सा उस हरसिंगार के पेड़ को देखता रहा। उसके आसपास की जगह भी रंगीन पत्थरों से सजाई थी। कुछ खास बात थी उस पेड़ मे वो बड़ी शान से हवा मे लहरा रहा था। 
      तभी निवी वहां मुझको बुलाने आ गई। मैंने उससे  पूछा “तुम्हे हरसिंगार बहुत पसंद  है क्या ?
 एक फीकी सी मुस्कराहट उसके होठों पर तैर गई। उसने कहा हाँ इसके फूल शाम को सुगंध बिखेर देते हैं। 

मैं हंस पड़ा अच्छा  इसीलिए तुम शाम को गाती  हो। उसने ख़ामोशी से एक निगाह मेरी ओर देखा और बोली “काकी माँ आपको बुला रही हैं। चलिए” !
 खैर मे घर के अंदर गया। 
वहां की साज सज्जा देख मे निवि से बेहद प्रभावित हुआ। घर के अंदर भी नन्हे पौधे सुन्दर  कलात्मक गमलों मे लगे थे। सादी सी दरी पर छोटे छोटे  मोढ़े रखे थे। एक छोटी सी तिपाई पर हारमोनियम रखा था। मुझे निवी  का गाना याद  आ गया । 
तब तक निवी चाय नाश्ता लेकर आ गई। उसे देखते ही मैं बोल पड़ा “निवी तुम्हारी आवाज़ बेहद मीठी है।” 
शायद उसे ऐसे तारीफ़ की आदत नहीं थी। वो चुपचाप वहां से चली गई। 
माँ निवी की माँ से बातें कर रही थीं और मै चाय पीने लगा। काकी परेशान होकर बोलीं “मुझे निवी की बेहद चिंता होती है। अगर मुझे कुछ हो गया तो इसका क्या होगा” ?
मैंने तुरंत कहा “अरे आप परेशान न हों आपकी बेटी इतनी काबिल है इतना सुरीला गाती है कोई लड़का देख उसकी शादी कर दीजिये।” 
वो एकदम से चुप हो गई और मेरी माँ ने मुझे घूर कर देखा और तनिक गुस्से से बोल “अनूप बड़ो के बीच नहीं बोलते चाय पीकर घर जाओ”
        मुझे थोड़ा गुस्सा भी आया अरे मैं  कोई बच्चा हूँ जो माँ कहीं भी डांट  देती हैं।फटाफट चाय पीकर  घर वापस आ गया। 
मै घर आकर बिस्तर पर लेट गया लगभग एक घंटे बाद माँ घर वापस आई। वो थोड़ी दुखी दिखाई दे  रही थी। “क्या हुआ नाराज़ हो गया मुझसे!” 
माँ धीरे से बोली “बेटा निवी एक बालविधवा है और तुम उसकी शादी की बात करने लगे। मै तुझको डांटती नहीं तो क्या करती ?”
मै उछलकर उठ बैठा मनो मुझको करंट लग गया हो। “क्या माँ आज के ज़माने मे कौन मानता  है ये सब”। 
माँ बड़े दुखी स्वर मे बोली “बेटा ज़माना कोई भी हो गरीबी इंसान को लाचार कर देती है। ये दुनिया बहुत ज़ालिम है।  तुझे मालूम है निवि की शादी दस साल की उम्र मे हो गई थी”। “उस साल बहुत बाढ़ आई थी जिसमे इसके पिता की मृत्यु हो गई थी। निवी की माँ निश्चिंत थी की एक बेटी थी उसकी शादी हो चुकी थी। निवी का पति जो उस समय केवल  पंद्रह साल का था बाढ़ के बाद फैली महामारी मे उसकी मौत हो गई निवी बारह साल की उम्र मे विधवा हो गई”। 
         माँ की बातें मुझपर गहरा असर कर रही थीं। मैं निवी के बारे मे ज्यादा जानना चाह  रहा था।
तभी माँ बोली “निवी को दो शौक हैं गाने  और बागवानी का। मैंने ही कहा तो निवी  बच्चों को हारमोनियम बजाना सिखाती है। इसी बहाने कुछ आमदनी होती है। शाम को जब वो गाती  है तो पूरे घर का वातावरण मानो पवित्र हो जाता है”
 
माँ उसका गाना सीधे दिल मे उतर जाता है। “एक अजीब सी कशिश है उसी आवाज़ में,जैसे तूफ़ान के गुजरने के बाद समुद्र की लहरें खामोश सी किनारे को छूकर लौट जाती हों”। 
    
 मैं कुछ देर खामोश रहा फिर बोला “ माँ और किस चीज़ का शौक है निवी को?”
“बागवानी का ,देखा नहीं पीछे का आँगन कितना खूबसूरत बना दिया निवी ने। मुझे वो खूबसूरत हरसिंगार का पेड़ याद आ गया”। 
“मुझे भी बागवानी का शौक था वो जो पौधा कहती है वो मैं उसे खरीदकर ला  देती हूँ।कई तरह के बीज भी लाकर दिया है। पिछवाड़े एक कोने में छोटे सी नर्सरी बना दी है उसने ,आसपास के लोग फूलों के पौधे उससे खरीद लेते हैं। उसके आमदनी होती है साथ मेरा आंगन खूबसूरत लगता है। सारा  दिन मेरा मन लगाए रहती है। वो तो आजकल तू आया है इसलिए नहीं आती है”। 
“क्यों मै कोई भूत हूँ क्या जो उसे खा जाऊंगा”।  मै हंस दिया। मुझे निवी के बारे मे जानकर बहुत दुःख हो रहा था। 
“लेकिन माँ ये लोग यहां कैसे आये?”
“अरे वो जो संगीत के मास्टर जी आते थे न ,अरे वो जो तुझको और तेरी दीदी को तबला और हारमोनियम सिखाते थे ये दोनों माँ बेटी उनके गांव की रहने वाली हैं। वही इन लोगों को यहां लेकर आये  हैं”।  
 तभी माँ हंस कर बोली  “ तुझे पता है वो पेड़ों से बात करती है”। 
“क्या भला कोई पेड़ों से कैसे बात कर सकता है।” 
“अरे निवी कर सकती है। वो कहती है काकी माँ ये सारे  मेरे दोस्त हैं कुछ नहीं मांगते ,इन्हे ज़रा सा सहलाओ ख़ुशी से झूम उठते हैं।” 
मै न चाहते  हुए भी निवी के बारे मे सोचने लगा। 
     
तभी माँ ने खाना खाने के लिए  आवाज़ दी मैंने पलट कर देखा तो माँ जाने कब वहां से जा चुकी थीं। मै सीधा माँ  के पास चला  गया।  
अगली सुबह जल्दी उठकर आँगन की तरफ चला गया। निवी धीमे आवाज़ मे कुछ गा  रही थी। कानों में जैसे शहद घुल रहा हो। मुझे देख कर पौधों को पानी देना रोक कर घर के भीतर जाने लगी। 
“अरे क्या हुआ मैं तो तुमसे दोस्ती करने आया था। माँ कह रही थी तुम पौधों से बात करती हो”। उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा !
मैंने मुस्कुरा कर कहा “अरे माँ तुम्हारी बहुत तारीफ कर रही थीं”। 
“इतने बड़े शहर मे घोष बाबू के कहने पर काकी माँ ने हमे आसरा दिया है। उनके लिए जो भी करूं कम है। उनके बहुत अहसान हैं हम लोगों पर”। 
बाप रे ! इतनी सी उम्र मे इतनी बड़ी बड़ी बातें करती हो तुम तो” 
तभी माँ मुझे ढूढ़ते वहां आ गईं। “अरे ! अनूप तू यहां है चल घर चाय ठंडी हो रही है”।  मै  वापस घर आ गया।  
लगभग रोज़ सुबह मै और माँ आंगन मे बैठ कर चाय पीते  थे। मै माँ काकी और निवी  साथ बैठकर बातचीत करते लेकिन निवी अक्सर खामोश ही रहती। एक दीवार से  घेरे थी उसको जिसे भेदना  मुश्किल था। धीरे धीरे मेरी छुट्टियां ख़तम हो गई थी। दो दिन बाद मुझे जाना था। 
  
 मै शाम को नीवीऔर काकी से मिलने गया तो देखा  निवि के चेहरेआंसू की लकीरे थीं  और वो बेहद परेशां थी पूछने पर बोली माँ घोष बाबू के घर गई हैं। 
मे हंस कर बोला  “तो तुम क्यों दुखी हो” ,उसने कातर नजरों से मुझे देखा और 
बोली “अनूप गॉव मे सबको पता चल  गया है।हमे यहां से जान पड़ेगा वरना मुझे यहां भी बदनाम कर देंगे। चंद  पैसो के लिए मेरी जिंदगी बर्बाद कर देंगे”। 
 मैंने तुरंत घोष बाबू से फोन पर बात की उन्होंने कहा परेशां होने की कोई जरुरत नहीं है वो सब संभाल लेंगे। मैंने निवी को शांत होने को  कहा और बोला  कल मै सुबह जा रहा हूँ।तुम अपना और काकी का ख्याल रखना। अपने कुछ दोस्तों के फ़ोन नम्बर दिए जो ज़रूरत होने पर  उसकी मदद कर सकते थे। 

मै वापस मुड़ा तो निवी ने पुकारा  “ अनुप तुम  परेशान मत हो ! मै तुम्हे फिर मिलूंगी कहाँ और कैसे नहीं जानती। लेकिन  हम मिलेंगे जरूर”। 

आज पहली बार निवी ने हलके से मुस्करा कर कहा देखो मै इस आँगन मे बस गई हूँ।हमेशा यहीं रहूंगी। 
मैंने चारों ओर देखा  गुलाब मे नई अधखिली कली दिखाई दी। मैंने निवी को देखा उसकी आँखों मे सूनापन नहीं था।  एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। 
मै वापस लौट आया।अगले दिन वापस लेह चला  गया।
वहां के मौसम मे फ़ोन मिलता नहीं था कभी माँ से बात होती तो संकोच वश निवी के बारे मे पूछ नहीं पाता।  महीनों  बीत गए एक दिन माँ ने बताया की निवि और उसकी माँ घोष बाबू के साथ कटक चले गए। इस घटना के बाद मेरे मन मे कुछ चटक सा गया था। 
  आगे दो तीन सालों में जब  मै घर आता तो अक्सर आँगन मे बैठता उन पौधों के बीच लगता निवी सचमुच वहीं है।घोष बाबू  के बारे मे पता किया मगर कुछ पता नहीं चला। 
आज लगभग पांच साबाद दीदी के ज़िद करने पर पूजा में कलकत्ता जा रहा हूँ। आजकल  दीमापुर में  पोस्टिंग है। मेरी ट्रैन एक स्टेशन पर रुकी तो मै  नीचे उतरा तभी देखा एक मरीज को व्हीलचेयर पर एक औरत लेकर आ रही है साथ मे नर्स भी है।
सात आठ सालों के बाद भी मै  निवी को तुरंत पहचान गया था।  उसकी ओर बढ़ा लेकिन गाडी की सीटी बज गई थीऔर शायद निवी ने मुझे नहीं देखा और  वो अपने डिब्बे मे चढ़ गयी थी मै  अपनी सीट पर आया ये सोचते की निवी  से मिलने जाऊँ की नहीं। ये सोचते जाने कब नींद लग गई।
तड़के मेरी आँख खुली तो गाड़ी स्टेशन पर खड़ी थी मै ज्यों बाहर जाने लगा डिब्बे का अटेंडेंट आया और बोला   ,सर! रात मे एक मैडम आपके लिए चिट्ठी छोड़  गई हैं। मैंने पूछा  वो कहाँ हैं ? अरे वो तो रात मे उतर गईं थी। आपको मिलने गई तो आप सो रहे थे तो ये दे गई। मैंने तुरंत चिट्ठी खोल कर पढ़ना शुरू किया।  
अनूप 

रात अच्छा हुआ तुम सो रहे थे वरना जाने कितने सवाल करते। मैंने कहा था फिर मिलेंगे इसलिए चिट्ठी छोड़ जा रही हूँ घोष बाबू के साथ जाते हुए गाडी दुर्घटना ग्रस्त हो गई जिसमे माँ गुजर गईं थीं  और घोष बाबू कई दिन तक बिस्तर पर बीमार रहे। मैंने उनकी बहुत सेवा की लेकिन दो साल  पहले उनका निधन हो गया  है। मैंने उनके बेटे से शादी कर ली है। ईश्वर की लीला देखो वो मुझे संतान का कोई सुख नहीं दे सकते हैं। पौधों को दुलारने वाली निवी अपनी संतान को कभी प्यार नहीं कर पायेगी। इसी बीच एक दुर्घटना में मेरे पति के दोनों पैर बेकार हो गए उनके इलाज के लिए ले जा रही हूँ। शायद अभी कुछ और इम्तहान बाकी हैं।

                                                                                                                                           निवी 
कुछ देर मै यूँ ही खड़ा रहा। कुछ  देर बाद मै कलकत्ता पंहुचा और सीधे घर गया जहाँ अब कोई नहीं रहता था। मै पीछे  आँगन में गया चारों और सूखे पत्ते बिखरे थे।  वहां हरसिंगार और गुड़हल के पेड़ तो फूलों से लदे थे लेकिन गुलाब का पेड़ सूना था। शायद उसके लिए बहार नहीं आई थी। या फिर पतझड़  वहीं ठहर गया था। निवी इस आँगन मे गुलाब के ठूंठे  पेड़ सी बस गई थी जिसपर बहार नहीं आएगी।   
 
Pic Credit :Canva

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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