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अब लौट आओ

रात गहरी थी, सड़क बिल्कुल सुनसान थी, कुछ कुत्ते थोड़ी – थोड़ी देर पर भौंक कर रात को और भयानक बना रहे थे। सड़क पर रीबॉक के ब्रांड न्यू शूज में वह जॉगिंग कर रहा था। इतनी रात गए वह जॉगिंग क्यों कर रहा था, यह वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। लेकिन चाह कर भी वह अपने कदमों को रोक नहीं पा रहा था, ना ही वापस मुड पा रहा था।

एक अजीब से डर से घिरा वह आगे बढ़ता ही जा रहा था। देखते ही देखते आगे सड़क पर खड़े चार कुत्ते उसे देख जोर से भौंकने लगे और तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा, उसने पलट कर देखा तो एक लड़की खड़ी मुस्कुरा रही थी मानो उसे उसके डर से निकाल कहीं दूर, किसी सुरक्षित जगह पर ले जाने आई हो। उसके आते ही सब शांत हो गया जैसे इसके पहले कुछ हुए ही ना था और उसकी आंख खुल गई।
” उफ्फ! ये सपना था, कितना सच लग रहा था। कौन थी वह लड़की, उसकी शक्ल किसी से मिलती है।” उसने सोचा और कमरे की लाईट जला दी। छब्बीस वर्षीय रोहन, गौर वर्ण, लंबा, गठीला बदन और आकर्षक व्यक्तिव। ऊपर से देखो तो उसकी जिंदगी में कोई कमी ही नहीं थी, अच्छी नौकरी, अच्छा घर, सब कुछ, कुछ परफेक्ट सा है लेकिन रोहन कि ज़िंदगी का एक हिस्सा जैसे कहीं थम सा गया हो। उसका बचपन जैसे उसी हिस्से में क़ैद हो।
हां! वह उन्नीस जनवरी की सुबह थी, जब नौ वर्षीय रोहन हर रोज की तरह तैयार होकर स्कूल के लिए निकला था। हर रोज की तरह मां ने उसके माथे पर अपने होंठ रख उसे बाय किया और मुस्कुराती हुई वापस मुड गई। रोहन का बचपन शायद उसी दिन में क़ैद होकर रह गया था। उस दिन के बाद उसके माथे पर मां ने कभी नहीं रखे अपने होंठ। उस दिन शायद मां मुड गई थी कभी ना लौट आने के लिए, लेकिन मां के कहे वह आखिरी शब्द जो उसने सुने थे ” मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां कैसे पता नहीं, लेकिन मैं तुझे फिर मिलूंगी।”
उसने उस दिन के बाद मां को कभी नहीं देखा फिर मां ने ये बातें उससे कब कहीं थी, शायद सपने में। ठहरा हुए बचपन रोहन अपने सपने में ही जी लिया करता। उस दिन के बाद ना जाने कितने दिनों तक रोहन मां को ढूंढता रहा, कभी किसी की औरत की आवाज़ मां जैसी लगती तो दौड़ कर उसके सामने पहुंच जाता और चेहरा देख वापस मुड जाता, कभी सोचता मां कहीं छुप गई है, और अचानक ही किसी दिन वापस आ जाएगी और वैसे ही मुस्कुराएगी जैसे उसने आखिरी बार मां को मुस्कुराते देखा था।
रोहन अब बिस्तर से उठकर अपनी अलमारी की तरफ बढ़ा, उसे खोला और उसमे से एक बॉक्स निकाल कर उसे बड़ी देर तक घूरता रहा फिर उसे खोल कर उसमे रखी एक – एक तस्वीर बिस्तर पर फैला दी, वे तस्वीरें सिर्फ तस्वीरें कहां थीं, अनमोल लम्हें थीं जिन्हें वह एक बार फिर जी रहा था। तभी वह बुरी तरह चौंक गया, उसे ध्यान आया, हां! वह सपने वाली लड़की मां ही तो थी।

आखिर इस सपने का मतलब क्या है? आज इतने दिनों बाद सपने में मां का आना… वह बच्चों की तरह खुश हो रहा था।

उसने घड़ी देखी सुबह के पांच बज रहे थे, उसने रिया को फोन लगाया। अपनी खुशी वह जल्द से जल्द उससे बांटना चाहता था। रिया ने फोन नहीं उठाया तो उसे बड़ी निराशा हुई, फिर सोचा इतनी सुबह शायद सो रही होगी, कितने दिनों बाद तो उसे भी अपनी मां के साथ वक्त बिताने का मौका मिला है। बस थोड़े दिन और और फिर दोनों शादी के बंधन में बंधने वाले हैं। काश आज मां भी होती तो कितनी खुश होती। शायद मां जैसा चाहती रिया वेसी ही बहू होती मां के लिए या शायद नहीं होती। उफ्फ! कितना सोचता है वह। बस एक महीने बाद आज ही के दिन बारात लेकर रिया के घर जाना है उसे।
अभी अपने विचारों में उलझा ऑफिस जाने की तैयारी कर ही रहा था कि रिया का फोन आ गया, ” रोहन! अभी मिल सकते हो मुझसे?”
” क्या बात है रिया, इतनी परेशान क्यूं लग रही हो।” रिया को परेशान देख रोहन भी परेशान हो गया था।
” तुम्हारे ऑफिस के पास वाले रेस्तरां में आ रही हूं, मिले, फिर बताती हूं।” कहकर रिया ने फोन कर दिया।
आखिर क्या कहना चाहती होगी रिया सोचता वह कार की चाभी लेकर नीचे उतर गया। रेस्तरां पहुंचा तो रिया पहले से ही उसका इंतजार कर रही थी।
” क्या बात है? इतनी परेशान क्यों हो? ” उसने रिया का हाथ पकड़ कर पूछा।
” रोहन अगर मैं शादी से पहले एक बच्चे को गोद ले लूं तो क्या तुम मुझसे शादी से इंकार कर दोगे?” रिया ने धीरे से पूछा।
 “नहीं! बिल्कुल भी नहीं।” रोहन ने दृढ़ता से कहा।
” ठीक है, तो चलो मेरे साथ।” कहकर वह रोहन का हाथ थाम उसे अपने साथ लेकर अपने घर चली गई।
” रोहन ये मेरी कजिन नीला दीदी की बेटी सिया है, जिसे मैं गोद लेना चाहती हूं। नीला दीदी अब हमारे बीच नहीं रहीं और उनके परिवार वाले इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं।”
“तुम्हे पता है रोहन जब मैंने इसे पहली बार देखा तो मुझे ऐसा लगा ही नहीं कि यह मेरी बेटी नहीं है जबकि मैं इससे पहले बार कल ही मिली हूं।” कहते हुए उसने चार वर्षीय जिस बच्ची को उसके सामने खड़ा किया, उसकी आंखे हूबहू रोहन की मां की आंखें थीं।
रोहन आश्चर्य मिश्रित खुशी से बस उसे देखे ही जा रहा था तभी चार वर्षीय सिया ने रोहन का हाथ पकड़ कर उसे नीचे बैठने का इशारा किया, रोहन के नीचे बैठते ही उसने उसके सर पर हाथ रखा और माथे पर अपने होंठ रख दिए। रोहन के कानों में मां के शब्द गूंज उठे ” मैं तुझे फिर मिलूंगी, कहां कैसे पता नहीं।” और वह मुस्कुरा दिया।

 

 

Pic Credit :Canva

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