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मैं तुम्हें फिर मिलूँगी

 

“यार अमित, तू पागल हो गया है क्या? या तुझे कुछ समझ नहीं आ रहा? कैसी बे सिर पैर की बहकी-बहकी बातें कर रहा है। सारी, आई कांट हेल्प यू।” गौरव ने कैफे काफी डे की टेबल पर बिखरे हुए लड़कियों के फोटोग्राफ्स को एक थप्पी में इकट्ठा करते हुए थोड़ी ऊँची आवाज में कहा।

“ तू मेरा दोस्त है। तू नहीं समझेगा तो मम्मी पापा को समझाने में मेरी क्या खाक मदद करेगा। यू डिस अपाइंटेड मि अ लाट।” नीची नजर किए, हाथ से काफी के खाली कप को बे-वजह घुमाते हुए, बहुत ही उदास स्वर में अमित ने जवाब दिया। 

“मुझे लग रहा है तुझे किसी साइकोलाजिस्ट की सख्त जरूरत है। मैं लेता हूँ अपाइंटमेंट। वही प्रापर काउंसलिंग करेगा तेरी।”

“ फ्रेंड से बड़ा कोई काउंसलर नही होता। इनफेक्ट गौरव, तूने मेरी बात ध्यान से सुनी ही नहीं।”

“अच्छा, मान लिया नहीं सुनी। चल, जब तक तू अपनी पूरी रामायण फिर से सुना नही लेता, मैं चुप बैठा रहूँगा। बता क्या हुआ था उस दिन। अब ठीक?”

अमित के चेहरे पर आशा की धूप वैसी ही खिल उठी जैसे सूर्य ग्रहण छंटने के बाद दीखती है। उसने फिर वही किस्सा, जो उसके साथ घटा था, पूरे बीस मिनिट लगाते हुए सिलसिलेवार सुना दिया।

गौरव ने बैरे को पिज्जा और कोल्ड काफी का एक और आर्डर दिया। देना जरूरी था। वह उनकी टेबल की ओर बार-बार इस तरह देख रहा था कि ‘ये दोनों उठ क्यों नही रहे।’ उसने वेटिंग क्यू में लगे एक परिवार को, जिसमें पति पत्नी और छोटा बच्चा था, इशारे से इस खाली होने वाली टेबल पर बैठने को इंगित भी कर दिया था।  

“और कुछ कहना बाकी है?” दोस्त के हाथ पर प्यार से हथेली  रखते हुए गौरव ने पूछा।

“नहीं। अब बता तेरा क्या कहना पड़ रहा है?” अमित ने कुछ इस तरह से उत्तर के साथ प्रति प्रश्न रखा, मानो कह रहा हो वही कहना जो मैं सुनना चाहता हूँ।

पर सच्चा दोस्त मुँह देखी चापलूसी भरी बात थोड़े ही करता है। सो गौरव ने कहना शुरू किया –

“देख जो मैं समझा कहता हूँ। अब तक की कहानी का लब्बो-लुआब यह है कि तुम दिल्ली से इंदौर आने के लिए निजामुद्दीन में बैठे हो। तुम्हारी बर्थ है थर्टी सेवन। तभी एक लड़की आती है। वह गुलाबी सलवार कुर्ती में स्मार्टली ड्रेस्ड अप है। उसके बाल रेशमी, काले और लम्बे हैं। उसकी बड़ी-बड़ी और कजरारी आँखों में बला की चमक है। उसकी उपस्थिति से कम्पार्टमेंट की हवा में बहुत महीन, प्यारी और भीनी-भीनी सी सुगंध फैल रही है। तुम उसे पूरी तरह निहार भी नहीं पाए हो और वह कहती है –

‘आप अभी भले बैठे रहें। पर थर्टी सेवन बर्थ नम्बर मेरा है।’ मतलब वह कहना चाह रही थी कि रात को वह अपनी बर्थ पर ही सोएगी। कोई एक्स्चेंज वगैरह नहीं करेगी। तुम हतप्रभ से उसे देखते रहे। और कोई होता तो शुरू हो जाते। ‘ऐसे कैसे भाई साहब यह बर्थ मेरी है। आप जाकर करें टी. टी. से बात।’ तुमने कुछ नहीं कहा। और उस समय तुम पक्का यही सोच रहे होओगे ‘चलो इतनी देर वह मेरी ही बर्थ पर बैठेगी।’ है ना? और फिर उसने उसकी बात के प्रमाण स्वरूप उसका टिकिट तुम्हारे आगे कर दिया। वाकई उसकी बर्थ का नम्बर भी थर्टी सेवन ही था। पर तुम्हें उसे कहना पड़ा –

‘मेडम आपका टिकिट निजामुद्दीन एक्सप्रेस का है ही नहीं। यह तो राजधानी का है। और वह ट्रेन प्लेटफॉर्म नम्बर चार से दस मिनिट में डिपार्ट होने वाली है।’

‘ओह ऐसा क्या। मैं आई निजामुद्दीन से थी। शिट! वही याद रह गया। उसने मोहक अदा से सिर थामा। और आगे जल्दी जल्दी  कहा –

‘ थेंक्स फार टेलिंग मि द ट्रुथ। ओ. के.। मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। कहाँ और कैसे मैं नहीं जानती।’ और वह तेजी से सामान उठा कम्पार्टमेंट से निकल गई। एक अधेढ़ दढियल सहयात्री ने टिप्पणी की ‘ये हैं आज कल की पढ़ी लिखी लड़कियाँ। मेकअप करने के लिए टाइम रहता है इनके पास। टिकिट चेक करने के लिए नहीं।’ तब  तुम्हें इतना गुस्सा आया कि बस चलता तो उनकी दाढ़ी नोच लेते। है ना ?”

“हाँ, ऐसा ही हुआ था। ये समझो कि वह बस आई।और मेरा दिल ले कर चली गई। या कहो मेरा दिल ले जाने के लिए ही आई थी। सिर्फ पाँच मिनिट के लिए उस कम्पार्टमेंट में। मैं चाहता हूँ तुम मुझे उसे तलाशने में मदद करो। और तब तक मम्मी पापा को मुझे और दूसरी लड़कियाँ बताने से रोको। एक बार वह मिल भर जाए। सब सेट हो जाएगा। और फिर देखो उसने यह कहा भी था ‘मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। कहाँ और कैसे मैं नहीं जानती’।” अपने में खोये से अमित ने कहा।

“बरखुरदार, ओ मेरे शेखचिल्ली! तुम हो किस दुनिया में? ‘सी यू।’ ‘हम फिर मिलेंगे।’ ऐसा हर दूसरा यात्री पहले से कहता है। यह सामान्य शिष्टाचार भर है। इसका यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि वह तुम पर आसक्त होकर ऐसा कह कर गई। समझे?”

“इसका मतलब तुम अब भी यही कह रहे हो कि तुम उसे ढूंढने में मेरी मदद नहीं करोगे।” 

“अच्छा बाबा, करूंगा। पर एक शर्त पर।”

“कैसी शर्त?”

“शर्त यह कि तुम्हें मेरे पूछे प्रश्नों का जवाब देना होगा।”

“पूछो। दूंगा।”

“पर तुम्हारा जवाब सिर्फ ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में होना चाहिए। यदि एक भी प्रश्न का जवाब ‘हाँ’ आया तो ही मैं तुम्हारी मदद करूंगा। अन्यथा तुम्हें मेरा कहा मानना होगा। ठीक?”

“ठीक है।” 

“याद रहे उत्तर सिर्फ हाँ या नहीं में चाहिए। कोई स्पष्टीकरण  या सफाई मत देने लगना। सुनो, पहला प्रश्न है तुमने उसका नाम पूछा?” 

“नहीं।”

“उसके माता या पिता का नाम पता किया?”

“नहीं।”

“उसके भाई बहन या दोस्त का कोई जिक्र हुआ?”

“नहीं।”

“तुम्हें उसका पता मालूम है?”

“नहीं।”

“उसके जाब के बारे में कोई जानकारी?”  

“नहीं।”

“पढ़ाई के बारे में?”

“नही।”

“उसका फोन नम्बर लिया?”

“नहीं।”

“अपना नम्बर या पता उसे दिया?”

“नहीं।”

“ई मेल लेन देन?”

“नहीं।”

“ अंतिम प्रश्न है तुमने उसका कोई फोटो खींचा? बताकर या चुपके से?”  

“नहीं।”

गौरव ने सारे प्रश्न उत्तर मोबाइल में रिकार्ड कर लिए और दोस्त को सुनाए। सभी में अमित का जवाब ‘नहीं’ रहा। एक में भी ‘हाँ’ नही मिला। गौरव ने उसे बिलकुल नही समझाया कि भले आज पूरी दुनिया नेट से कनेक्टेड है। लेकिन इतने सारे ‘नहीं’ के बाद किसी को तलाश कर पाने का एक भी सूत्र आज हमारे पास नहीं है। कि तकनीक कितनी भी विकसित हो गई हो पर सिर्फ एक वाक्य के शब्द, जो किसी का दिल झंकृत कर गए हों, को पकड़कर उस व्यक्ति तक नही पहुँचा जा सकता है।

अमित समझ गया कि वह शर्त हार गया। शर्त के मुताबिक़ अब उसके पास गौरव की बात मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। उसके दिमाग ने दोस्त की तर्कशीलता का लोहा मान लिया। दिल का क्या है? वह सुबके तो सुबके। वैसे भी बतौर अमित अब दिल उसके पास रहा ही कहाँ। वह तो वह लड़की ले गई।

गौरव ने उसे महिने दो महिने  का समय दिया। और कहा-

 “तू इतने दिन कुछ भी मत सोच। न उस ट्रेन वाली लड़की और उसके कहे के बारे में। न मम्मी पापा द्वारा बताई जा रही लड़कियों के बार में। हाँ, मैं उन्हें यह जरुर समझा दूंगा कि वे तुझे तभी लड़कियों के फोटो दिखाये जब तू चाहे। ओ. के.।”

यूँ कैफे काफी डे रेस्त्रां में तीन घंटे साथ बिताने और तीसरे राउंड की काफी खत्म करने के बाद दोनों दोस्तों ने एक दूसरे से विदा ली।

 

दो के बजाए जब तीन महीने बीतने को आए। अमित के माता पिता के फोन गौरव के पास जल्दी-जल्दी आने लगे। वे यह जानने को बैचेन थे कि अमित का मन नयी लड़कियाँ देखने के लिए बन पाया या नहीं? गौरव ने कुशल मध्यस्थ की तरह दोनों से इस ढंग से बातचीत की कि अमित लड़कियों के उपलब्ध प्रस्तावों में से तीन को देखने जाने के लिए तैयार हो गया। पर उसने यह भी कहा कि-

“लड़की देखने पहले मैं और गौरव ही जाएंगे। अगर मुझे जमी और उसकी तरफ से भी मेरे लिए हाँ हुई तो ही मम्मी पापा आप लोग उसके पेरेंट से मिलिएगा।”

अमित के पापा को यह बात बहुत नागवार गुजरी। कहने लगे-

 “हद हो गई। पहले परिवार के बड़े मिलें कि सीधे लड़का लड़की? आखिर अनुभव भी कोई चीज होती है। संस्कार भी देखना होते हैं। मुझे साथ जाना ही होगा।” 

बड़ी मुश्किल से उन्हें मम्मी ने मनाया।

“सुनो जी, अमित लड़कियाँ देखने के लिए तैयार हो गया यह क्या कम है? नहीं तो ट्रेन वाली लड़की की याद में कुँवारा बैठा रहता। क्या वह आपको अच्छा लगता? शादी उसे करना है। वह देख ले पहले क्या फर्क पड़ता है? इसमें आप खामखां कोई अड़चन न डालें। प्लीज।”

“मम्मी सही कह रही हैं पापा जी। मैंने कैसे टेक्टफुली अमित को राजी किया है यह मैं ही जानता हूँ। कभी वह फिर बिदक गया तो? अपन काम को बस आगे बढ़ाने की सोचें।” गौरव ने भी पापा को समझाया। वे बड़ी मुश्किल से मन मार कर राजी हुए।

दो लड़कियाँ देख चुकने और वहां रिश्ता नही जम पाने के बाद अमित का उत्पन्न करवाया गया उत्साह बुझ-सा गया। उसने गौरव से कहा-

” ऐसा कर इस तीसरी लड़की को तू ही देख आ। मैं हुआ तो फिर बाद में मैं देख लूंगा।”

“नही यार। तेरी खातिर मैंने पापाजी को जाने से रोका। तुझे चलना ही होगा।”

दोनों जब लड़की के घर पहुंचे उसके पिताजी बाहर ही मिल गए। ‘आइए आइए’ के बाद सीधे गौरव की ओर मुखातिब हो कहने लगे-

 “आप अमित जी के दोस्त हैं न? चलो मैं आपको कालोनी की सैर करवा के लाता हूँ। यहाँ बहुत बढ़िया गणेश मंदिर है। अब ये दोनों एक दूसरे को देख समझ लें। मैंने वाइफ को भी उसकी सिस्टर के यहाँ भेज दिया। आजकल जमाना यही करने का है।”

 अमित ने सोचा ये मुझसे भी बड़े वाले निकले। ख़ैर दोनों ने लड़की के पिता की बात मान ली। और कर भी क्या सकते थे। अब ड्राइंग रूम में केवल अमित ही बैठा बचा। लड़की अंदर से आने वाली है।

 जैसे ही वह आई अमित को लगा…. पूरी दुनिया तेजी से लट्टू की तरह घूम रही है।…. हर चीज घूम रही है।… क्या मुझे चक्कर आ रहा है?….. या कि मैं सपना देख रहा हूँ। उसने अपने आप को चिकोटी काटी। ….ओ माई गाड  यह मैं किसे देख रहा हूँ?…. वही गुलाबी परिधान में स्मार्टली ड्रेस्ड अप होना। …..वही रेशमी, काले और लम्बे बाल  होना। ….वही बड़ी-बड़ी और कजरारी चमकती आँखे।…. हवा में घुलती वही बहुत महीन, प्यारी और भीनी-भीनी सी सुगंध।..

दोनों एकटक एक दूसरे को देखते रह गए। अपलक निहारते रहे। कोई बातचीत नहीं। बस नैनों से प्यार की भाषा में आलाप लेते रहे। एक दूसरे की नज़रों के जादू से बिंधते रहे। दोनों को लगा कुछ तो है ऐसा अदृश्य शक्ति से तरंगित तार के बंधन जैसा, जिसका गुरुत्व हमें करीब ला रहा है, नहीं ला चुका है।

भौतिक रूप से हम आज आमने सामने हैं। पर आत्मिक रूप से शायद उसी दिन से एक पाश में बंध चुके हैं जब निजामुद्दीन ट्रेन में टकराए थे। एक दूजे के लिए बने होने का अहसास दोनों को  बराबरी से महसूस हुआ। दोनों जैसे मूर्तिवत हो गए। 

काफी देर बाद अमित ने बेहद मुलायम स्वर में कहा-

“तुम वही कहो ना जो उस दिन मैं तुम्हें फिर मिलूँगी कह कर ट्रेन से उतर गई थीं।”

लड़की आपाद मस्तक शर्म से लाल हो गई। और बोली ,“हां याद है मुझे कहा था मैंने, ‘मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। कहाँ और कैसे मैं नहीं जानती।’ पर अपने ही कहे की अतल गहराई को मैं आज समझी हूं।”

तब तक गौरव लड़की के पिता के साथ कालोनी और मंदिर घूम कर वापस आया। उसने दोनों की बात सुनी तो मन  ही मन बोल उठा। ‘कहते हैं मेरिजेस आर मेड  इन हेवन पर अब कहना होगा मेरिजेस आर मेड इन ट्रेन!’

                    

 

 

Pic Credit :Canva

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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