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मंजरी सदन

 

22/6 म…. म…मंजरी …. मंजरी सदन…!! रवि स्तब्ध था, दिल मानने से इंकार कर रहा था कि ये वही घर है जहाँ उसकी बेटी तृप्ति का मित्र आलोक रहता है।
“आह..!! मेरे दिमाग में एक पल के लिए भी यह क्यों नहीं आया कि मंजरी सदन मतलब…. मतलब.…. सौम्या मंजरी!… ओह!! मुझसे कैसे विस्मृत हो गया यह नाम!” रवि वर्तमान और अतीत के कई तार एक साथ जोड़ने लगा। अब तक उसके दिल में पुराने एहसासों का एक पिटारा जो आज के गहमा-गहमी के बीच दबा था, इस दहलीज पर आते ही यादों के बुलबुले के साथ वह एकदम ऊपर आने लगा। रवि वहीं दरवाजे पर ठिठका था, कि आवाज़ आई… “बिल्कुल सही, 22/6 मंजरी सदन ही है यह। आप एकदम सही पते पर आए हैं।”
रवि की स्तब्धता भंग करते हुए सौम्या ने कहा…. “अंदर आइए। आलोक कब से आप सबकी राह देख रहा है।”
रवि पुरानी यादों की काई पर फिसलता हुआ उस दरवाजे से बाहर चले जाना चाहता था, लेकिन बेटी का मोह उसे आगे धकेल रहा था। वह कर भी क्या सकता था, परिवार के सामने अपनी किसी कमजोरी को जाहिर करना उसकी आदत भी तो नहीं है। अपनी पत्नी, बेटी तृप्ति और बेटे दीपक के साथ वह अनमने मन से घर में प्रवेश करता है।
आज दोनों परिवारों के बीच तृप्ति और आलोक के प्रेम को वैवाहिक रूप देने की बातचीत होनी थी। शीघ्र ही खुशनुमा माहौल में हँसी-ठहाके और लज़ीज़ पकवानों का दौर चल पड़ा। सौम्या तो पहली नजर में ही तृप्ति को बहु स्वीकार चुकी थी। बस परिवार से मिल कर औपचारिकता पूरी करनी थी। इस दहलीज़ तक आने के पहले रवि भी इस रिश्ते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन सौम्या के चेहरे को देखते ही उसे काठ मार गया। वह ना ज्यादा कुछ कह रहा था और न कुछ खा-पी रहा था। ए.सी. की ठंढ़क तो उन्हें राहत दे सकती है ना जो बाहरी तापमान से जल रहे हों, जिसके मन में ज्वालामुखी का लावा पसर रहा हो, उसकी तपिश भला कौन बुझा सकता है?
रवि रह-रह कर माथे से पसीने की बूँदें पोछता हुआ सौम्या से नज़रे चुराने में लगा था। वह चोर नज़र से उसकी और देखता और फिर इधर-उधर देख कर खुद को संतुलित करने की कोशिश करता। चाह कर भी रवि इस स्थिति का सामना करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रहा था। बहुत मंथन के बाद आख़िर उसने कहा… “माफ़ कीजिएगा सौम्या जी, अचानक मेरी तबियत थोड़ी नासाज़ होने लगी है। मुझे लगता है अभी हमें आज घर जाना चाहिए। फिर किसी और दिन मिलते हैं हम सब।”, कह कर रवि लगभग भागता हुआ घर से निकल गया। बच्चे, पत्नी और आलोक सब हैरान थे। लेकिन सौम्या अपनी सौम्य मुस्कान से उन्हें विदा कर रही थी। उसे पता था कि सब क्यों हो रहा है, क्या हो रहा है। यादों की एक पड़त उधर गई थी, धागे खिंच रहे थे और रवि उस दर्द से भाग रहा था, दाँव पर उसकी बेटी की ज़िन्दगी थी।
पूरी रात उसका चित्त सौम्या के इर्द-गिर्द ही घूमे जा रहा था। भूल तो चुका था उसे। अपने परिवार और व्यापार में इतना रम गया था, कि बीते दिनों को याद करने का समय ही नहीं रहा। लेकिन बीते समय को जब आपकी याद आती है ना, तब वह इतनी तेज़ दस्तक देता है कि दिल दिमाग सब झन्ना जाए। रवि के माथे में भी यही झन्नाहट गूँज रही थी। कहाँ पता था कि अठाईस साल पुराना अतीत उसी दुशालेे में लिपटा चला आएगा, जिसमें उसे उलझा हुआ छोड़ आया था। ये उलझन कहीं बेटी के जीवन की फाँस न बन जाए…! नहीं… नहीं….सौम्या हमारे अतीत का असर बच्चों के जीवन पर नहीं होने देगी। वह ऐसा कुछ…. तो… लेकिन…..यदि….!!…. रवि गहरे उथल-पुथल के बीच फँसा हुआ था।
सौम्या…!! रवि के पहली नजर का प्यार। सब कितना अच्छा जा रहा था, शादी की बात भी होने लगी। दोनों परिवार कितने खुश थे। लेकिन सौम्या के नारीवादी झंडे ने सब बिगाड़ दिया। हाँ, सब उसके नारीवादी विचारधारा के कारण ही हुआ। रवि के माता-पिता ने ऐसा क्या चाहा था जो समाज के रीति-रिवाज से अलग हो? बस यही ना कि शादी में शगुन के नाम पर कुछ लाख रुपए रवि को दे दें। उसका बिजनेस बढ़ जाएगा। इसमें सौम्या की ही तो भलाई थी। लेकिन सौम्या ने क्या किया..? उस शगुन को दहेज़ का नाम देकर साफ़ मना कर गई!
उसे अपनी माँ के लिए उन्हीं के नाम का एक घर बनाना था…. “मंजरी सदन”, और इस सपने को पूरा करने के लिए वह अपनी पहली कमाई में से ही पैसे जोड़ रही है, लेकिन जिस लड़के से शादी करनी है, उसके बिजनेस में लगाने के लिए कुछ पैसे देना उससे दहेज़ लगने लगा! हुंह….!! कितने संकुचित दिमाग की है ना वह! मंजरी सदन का वह करेगी क्या? शादी के बाद तो उसे पति के घर ही रहना है, अपने नाम के साथ उसका सर नेम भी लगाना होगा। जहाँ तक उसकी माँ का सवाल है, वह किराए वाले उस घर में भी खुश हैं ना! उनके आगे-पीछे और है ही कौन? कुछ समय बाद जरूरत हुई तो उन्हें हम अपने साथ भी रख सकते हैं।
लेकिन सौम्या तो अड़ गई….. “दहेज़ देना तो दूर, शादी के बाद भी मेरे नाम के साथ माँ का नाम ही जुड़ा रहेगा…. मंजरी।” और तो और सबसे बड़ा मजाक यह करने लगी कि “मैं शादी के बाद तुम्हारे घर आ रही हूँ, तुम मेरी माँ का नाम ही जोड़ लो अपने नाम के साथ। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते?” हालांकि सौम्या कभी भी प्यार और संबंध में एकतरफा बदलाव कि पक्षधर नहीं थी। रवि का मन भांपने के लिए ही उसने उसका सरनेम बदलने की बात छेड़ी, और रवि से अपने दिल का हाल ही उड़ेल कर रख दिया।
रवि सौम्या से प्यार करता है, इसका अर्थ यह नहीं कि अपना आत्म सम्मान ताक पर रख दे। “तुम हमारी शादी को आंदोलन मत बनाओ सौम्या। इतनी असंवेदनशीलता अच्छी नहीं! पैसे मैं नहीं माँग रहा, लेकिन मेरे माता-पिता के भी कुछ अरमान हैं। फिर शादी के बाद क्या तेरा क्या मेरा? सब हमारा ही तो है। एक तो हमारे प्रेम विवाह को माँ-पापा स्वीकार रहे हैं, उस पर से तुम उनकी एक छोटी सी ख्वाहिश पूरी करने की जगह मुझे ही मेरा नाम बदलवाने में लगी हो! ऐसा कभी देखा सुना है क्या? शादी के बाद लड़कियाँ ही पति के घर आती हैं, और नाम भी वही बदलती हैं। मैं और तुम भी इन्हीं नियमों के दायरे में आते हैं। हम समाज से अलग हैं क्या?”
सोचते-सोचते यकायक रवि के आँखों के सामने “मंजरी सदन” का नेम प्लेट आ गया। “तो उसने वही किया जो वह चाहती थी। अपनी माँ के नाम को हमेशा के लिए अपने साथ जोड़े रखा। पति का नाम राजेन्द्र कश्यप और पत्नी सौम्या मंजरी…! ह्मम्म….!! उसे उसका साथ मिला जिसकी उसे चाहत थी। चलो वो खुश तो है! मंजरी हमेशा औरतों के हित की बातें करती है, तो क्या वो हमारे अतीत को नज़रअंदाज़ कर मेरी बेटी को अपना पाएगी?” सवालों का कौतूहल रवि की नींद चुरा रहा था।
सौम्या अपने आज में बहुत खुश थी। रवि से अलग होने के बाद कुछ वक्त तो लगा था उसे खुद को सँभालने में, यह समझाने में कि वक्त रहते इस रिश्ते का जो सच वह जान गई, वह उस सुख से कहीं अधिक हितकर है जिसके जाल में खुद को खोती जा रही थी। जो रूढ़ियों से टकराते हैं ना, उनका मन स्वतः इतना सबल हो जाता है कि कोई ठोकर उसे तोड़ न पाए। जल्द ही उसे नेवी ऑफिसर राजेन्द्र कश्यप के रूप में एक ऐसा जीवन साथी मिल गया जो उसके तरह ही रूढ़ियों के ख़िलाफ़ बग़ावत करता था।
जिसे सुबह की नयी रौशनी से प्यार था। हालाँकि आज इतने वर्षों बाद रवि को देख सौम्या भी थोड़ी असहज तो हुई थी, लेकिन जल्द ही उसने आज को सच मानते हुए मन में उमड़े कल के बादल को दरकिनार कर दिया। घर से भागते…. नहीं….. नहीं… जाते हुए रवि का मन वह पूरी तरह से भाँप चुकी थी। वह जानती थी कि असमंजस और दुविधाओं का पहाड़ रवि के दिल का बोझ बढ़ा रहा है।
अगले दिन सौम्या ने खुद फोन कर रवि को कैफेटेरिया बुलाया, वही कैफेटेरिया जहाँ 28 साल पहले दोनों का मिलना आम था। सौम्या कार्नर वाली उसी टेबल पर रवि की रहा देख रही थी, जिसके एक किनारे उन्होंने एक दिल कुरेदा था जिसमें कैद हुए थे “आर और एस” रवि-सौम्या!

“मैंने कहा था ना मैं तुम्हे फिर मिलूँगी, कहाँ और कैसे मैं नहीं जानती; देखो मैं मिल रही हूँ तुमसे, यहीं यादों के इसी कैफेटेरिया में, पूरे 28 साल बाद।”…. सौम्या ने रवि को देखकर कहा।

“हाँ देखते-देखते कब 28 साल हो गए, पाता ही नहीं चला। लेकिन तुम्हें देख कर लगा अभी कल ही की बात है। कुछ नहीं बदला, तुम अब की वैसी ही हो… बेहद खूबसूरत! आज भी तुमने अपनी माँ का नाम अपने साथ रखा है सौम्या मंजरी!” कहते हुए रवि पुनः बीते दिनों में डूबने की जद्दोजहद कर रहा था।
“हाँ रवि, मैं अब भी वही हूँ… बिल्कुल वही… मूफट, स्वार्थी और असंवेदनशील! और हाँ, मैंने कहा था ना कि अपना सरनेम मैं कभी नहीं बदलूँगी, देखो माँ मेरे नाम में है… अब भी! लेकिन तुम बदल गए हो, 28 बरस पहले तुम कीमती वर थे, और आज मजबूर पिता लग रहे हो।” सौम्या का व्यंग सीधे रवि के सीने में सीधे धँस रहा था। उसका दिमाग भले खुद को पाक-साफ़ साबित कर रहा हो, लेकिन दिल जानता था कि सौम्या कल भी सही थी और आज भी उसके कटाक्ष वाजिब हैं। शायद इसलिए वह उससे नज़र भी नहीं मिला पा रहा था।
“सौम्या, तुम तो जानती हो मुझे ज्यादा घुमा फिरा कर बात करने की आदत नहीं है। देखो तुम्हीं ने कहा था ना कि बेटी अभिमान होती है, उसे मजबूरी मत बनाओ! अपने शब्द याद हैं ना तुम्हें? बच्चे एक दूसरे को बेहद चाहते हैं। हमारे अतीत की परछाईं को उनके रिश्ते का ग्रहण न बना देना।” रवि के स्वर में अनुनय का भाव साफ़ दिख रहा था। पुरुषत्व का अहम अनहोनी के भय से पिघल रहा था और उसके भीतर के पिता को बेटी की खुशी के लिए याचक बनाने से भी गुरेज़ नहीं था।

“चलो पिता बनकर ही सही, जानकर अच्छा लगा कि तुम प्यार का दर्द समझने लगे हो।” कहते हुए सौम्या की आवाज़ कुछ भर्रा गई।

“मैं तब भी इस दर्द को समझता था, तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे ज़िद की कीमत मैंने कैसे खुद को तड़पा-तड़पा कर चुकाया है।” रवि का पौरुष पुनः उसकी संवेदना को दिशाहीन करने के लिए तत्पर था। वह आगे कुछ कहे इसके पहले सौम्या बोल पड़ी… “तो तुम अब भी हमारा रिश्ता ख़त्म होने का कारण मेरी ज़िद को मानते हो…. सीरियसली!!” सौम्या के शब्द बरसों से दबे रोष से भर उठे। “रवि हम प्यार करते थे, साथ जीना चाहते थे, लेकिन तुम्हारे माता-पिता ने तो हमारे प्यार को भी व्यापार बना दिया। कितना….कितना माँगा था उन्होंने? याद है ना तुम्हें! और तुमने विरोध करने की जगह मुझसे नाता ख़त्म करना ही बेहतर समझा।”
“सौम्या वो सब उन्होंने मेरे बिजनेस के लिए इन्वेस्टमेंट के तौर पर माँगा था, बस हमारी खुशी चाहते थे। मैंने रिश्ता नहीं तोड़ा था, तुमने ही साफ़-साफ़ दहेज़ का आरोप लगा कर सब ख़त्म कर दिया था। लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस सबका असर हमारे बच्चों के रिश्ते पर पड़े। तुम जो भी माँग करोगी वह सब मैं पूरी करने का सामर्थ्य रखता हूँ। मैं किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूँगा… किसी चीज की नहीं!” रवि अपने पक्ष में तर्क दिए जा रहा था।
“तुमसे ऐसे ही जिरह की उम्मीद थी। मुझे दुःख है की तुम अब भी प्यार, रिश्ते और व्यापार के बीच का फ़र्क़ नहीं जान पाए। दहेज़ कभी किसी बेटी की खुशी को खरीद नहीं सकता, हाँ हजारों बेटियों की जिंदगी का काल जरूर बना हुआ है। तुम्हें एक बेटी के पिता के रूप में देखकर मैंने सोच लिया था कि तुम शायद अब तो बेटी का हित और रिश्ते का सच जान चुके होगे। लेकिन तुम आज भी वही हो… मात्र पक्के व्यापारी! सुन लो मेरा बेटा बिकाऊ तो बिल्कुल नहीं है। इसलिए आलोक और तृप्ति का रिश्ता व्यापार कतई नहीं बनेगा। मैं तब भी दहेज़ के विरोध में थी, अब भी उसके विरोध में ही खड़ी हूँ।” …. सौम्या के तटस्थ स्वर रवि के हृदय में सिहरन बढ़ा रहे थे।
“तो क्या तुम…आलोक और तृप्ति….. सौम्या मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूँ….प्लीज़ इस रिश्ते को अस्वीकार मत करो।” कहते हुए रवि ने हाथ जोड़ लिए और बहुत संभालते हुए भी आँसू के दो बूँद जुड़े हुए हाथों पर गिर पड़े।
“कितनी अजीब प्रथा है ना, बेटी का पिता हर बार याचक क्यों बन जाता है? मन का यह विकार जाने कब मिटेगा!” रवि का नज़रिया और उसकी स्थिति सौम्या को विचलित कर रही थी। वह तो सौम्या के स्वभाव से पूर्णतः परिचित है, वह जानता है कि सौम्या ने विवाह में दो पक्षों के बीच के असीमित आडंबर युक्त खाई को कभी नहीं स्वीकारा। फिर भी वह नत हुए जा रहा है। खुशी तो दोनों बच्चों की दाँव पर है, लेकिन झुकाव के लिए कन्या पक्ष ही क्यों संघर्षरत होता है?
सौम्या जो प्रत्येक विषमता में खुद को शांत रखने में माहिर थी, आज उसका मन भी अशांत हो उठा था। एक पुत्र की माँ के रूप में उसने कब चाहा था कि कोई कन्या पक्ष उसके सामने यूँ हाथ जोड़े मिन्नते करे। सौम्या ने दो पल के लिए सर झुका कर अपनी आँखें मूँद ली, संभवतः वह अपने मन के द्वंद को समेटना चाहती थी।
दो पल की ख़ामोशी को तोड़ते हुए सौम्या ने शांत स्वर में कहा….”रवि तुम्हारा पैसा, तुम्हारी संपत्ति मुझे कुछ नहीं चाहिए। और ना ही कभी मेरे मन में दोनों बच्चों के निश्छल प्रेम में अवरोध बनने का ख़याल ही आ सकता है। तो तुम निश्चिंत रहो। दे सकते हो तो इतना कर देना कि जब अपने बेटे की शादी करो तब लेन-देन के बहाने दहेज़ की हैवानी परंपरा को और न बढ़ाना। और हाँ तृप्ति को तो मैं दिल से अपना चुकी हूँ, उसके अपने वजूद उसकी अपनी पहचान और उसके अपने सर नेम के साथ” कहते हुए सौम्या ने अपना पर्स उठाया और उठ कर चली गई। रवि और उसकी ठंडी पड़ी कॉफ़ी को वहीं उसके विचार पर चिंतन के लिए अकेला छोड़।

 

Pic Credit :Canva

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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