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तुम जो आए जिंदगी में

अलसाई आंखों को मलते हुए पूर्वी ने बिस्तर से उठकर आईने में एक बार खुद को देखा फिर बेतरबी से बाल एक जूड़े में बांधते हुए गुसलखाने को चली गई। आज उससे बहुत दुख हो रहा था कि इतनी देरी से क्यों सो कर उठी।

शिवांग घर आया हुआ था। यही तो वह दिन थे जिनका पूर्वी जाने महीनों से इंतजार करती थी। अपनी उबाऊ जिंदगी में शिवांग के हॉस्टल से घर आए हुए पल पूर्वी को त्यौहार की तरह लगते थे। समय पर उठना, तरह-तरह के पकवान बनाना और फिर शिवांग के साथ बैठकर कोई मूवी देखना, यह सब पूर्वी को बहुत अच्छा लगता था।

पूर्वी नहा कर निकली तो खुद को जैसे तैसे सवार कर किचन की ओर बढ़ी। पूर्वी हाथ में नाश्ता लेकर स्टडी में पहुंची। शिवांग ने पूर्वी को देखते ही लैपटॉप बंद कर पूछा
” मां सब ठीक तो है?”
बस यही तो था जो पूर्वी को जैसे जिंदा रखे हुए था ‘फिक्र’… फिक्र भरे शब्द जो शिवांग उसके लिए करता.. जो करता था कभी आनंद और अब आनंद के मुंह से सुनने के लिए वह तरसते रहती थी।
” हां ठीक ही तो है.. माफ करना बेटा! पता ही नहीं चला.. अलार्म सुनाई नहीं दिया..”
यह अलार्म सिर्फ शिवांग रहता था बस इतने ही दिन लगाती थी ताकि समय पर सुबह उठकर उसके संग पूरा दिन अच्छे से गुजार सके, वह यादें बनती जो फिर उसे शिवांग के ना होने पर जिंदा रखती थी।
” माँ लुक एट योरसेल्फ? क्या हाल बना रखा है आपने? आप ऐसे तो नहीं थे.. प्लीज डू समथिंग.. एक काम करो आप जिम या योगा क्लासेस जॉइन कर लो”

एक फीकी सी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए पूर्वी ने हाथ शिवांग के सर पर हाथ फेरा।
” मां की इतनी फिक्र मत किया कर.. अपने दोस्तों से मिल ले.. मैं सोचती हूं ”
” और हां मां नाश्ते की टेंशन मत लिया करो आप आराम से नींद पूरी करके उठो, मैंने दूध कॉन्प्लेक्स खा लिया था”
शिवांग की फिक्र उसे कभी-कभी डराने लगती थी। जब कोई आपकी बहुत ज्यादा फिक्र करता है, बहुत ज्यादा प्यार करता है और फिर एक दिन अचानक वह आपको अनदेखा कर दे तो तकलीफ दोगुनी होती है। कमरे में आकर उसने बिस्तर ठीक किया और बाकी के काम निपटाने लगी। कपड़े तह करते हुए हाथ में आनंद की शर्ट आई तो अचानक अतीत में चली गई

” यार आनंद तुम कितने शर्ट रोज चेंज करते हो.. एक ही दिन में दो-दो.. धोते – सुखाते- प्रेस करते मेरा हाल बुरा हो जाता है”
” तो क्या करूं मेरी जानेमन! नौकरी का सवाल है फ्रेश फ्रेश दिखना पड़ता है और अगर मैं गंदा दिखूंगा तो तुम्हारे ही तो नाक कटेगी”
“हां हां बस बातें बनवा लो तुमसे .. छोड़ क्यों नहीं देते यह नौकरी चाकरी? कुछ अपना कर लो.. अपना राज होगा फिर.. चाहे जैसे जाना ”
हंसते हुए आनंद फिर पूर्वी के गले में बाहों का हार डाल देता
” तुम यूं ही प्रोत्साहित करती रही ना तो एक न एक दिन देखना मैं भी बड़ी ऊंचाइयों को छू लूंगा पर फिर ना कहना कि तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही नहीं है “

” नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं होगा.. हमारा साथ चुंबक की तरह है, वैसे भी जब अपना ऑफिस होगा तो मैं तो तुमसे चिपकी रहूंगी ना “

” वह भी देखा जाएगा फ़िलहाल ये शर्ट प्रेस कर दो ना “

पूर्वी और आनंद की लव मैरिज थी। वह प्यार परवान चढ़ा तो बस रोज नई ऊंचाइयों को छूता ही गया। उनके लिए उनकी दुनिया उन दोनों के अलावा और कुछ भी नहीं थी। आनंद ने भी तो शायरा पूर्वी से शादी की थी। कॉलेज से ही उसकी कविताएं और शायरी पर मर मिटने वाला आनंद दिनभर पूर्वी की शायरियों में डूबा रहना चाहता था पर शायद पूर्वी ने अपनी आकांक्षाओं को आनंद से ज्यादा ही बड़ा लिया था।

पूर्वी के प्रोत्साहन से आनंद दिन पर दिन तरक्की करता गया। नौकरी छोड़ संघर्ष किया। अपना काम शुरू किया। पूर्वी ने भी एकाध किताब छपने के बाद धीरे धीरे अपने जुनून कविताएं और शेरो शायरी से किनारा कर लिया था।

वह पूर्वी, पूर्वी ना रही वह आनंद, आनंद ना रहा । छोटा घर बड़ा घर बन गया। दोनों नदी के दो किनारों जैसे हो गए।

आनंद अब एक बहुत बड़े बिजनेस का मालिक था जिस सिलसिले में महीने के बीस दिन तो वह घर के बाहर मीटिंग के लिए देश-विदेश में घूमता रहता था। दुनिया देखने की चाह रखने वाली पूर्वी नीरसता से ऐसी भर चुकी थी कि मौका मिलने पर भी अब वह आनंद के साथ दुनियाभर नहीं घूमना चाहती।
शायद सपने बिल्कुल वैसे नहीं होते जैसे हमने देखते हैं।

सपने केमिकल की तरह होते हैं। जब हकीकत में बदलते हैं तो आसपास के माहौल के साथ मिलकर एक केमिकल रिएक्शन कर नए जैसे हालात बन जाते हैं। कभी कभार तो अफसोस होता है सुखद सपनों का भी।

खैर पूर्वी ने खुद को परिस्थियों में ढाल लिया था। जब आनंद घर पर होता था तो भी संवाद से ज्यादा मौन पसरा रहता था। आनंद तो मुड़ कर कह भी देता था
” यह सब तुम्हें ही चाहिए था पूर्वी!”
पूर्वी का मन होता कभी-कभी जैसे कि इन सब से दूर कहीं भाग जाए। वह तो भला हो की पक्की सहेली अनन्या एक मानसिक चिकित्सक और सलाहकार थी जिस वजह से उसने पूर्वी को पूरी तरह टूटने से संभाल लिया था।

आज फिर पूर्वी शिवांग कही बातों पर सोच रही थी। यही सलाह तो उससे अनन्या ने भी दी थी कि कोई योगा या जिम या डांस क्लास ज्वाइन कर लो।

पूर्वी दुविधा में थी। भीड़ उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी। नए दोस्त और नए रिश्ते बनाने की उसमें बिलकुल भी हिम्मत नहीं थी। यहां तक कि अपनी सोसाइटी में भी वह किसी से मिलती-जुलती नहीं थी। पूर्वी ने शीशे में खुद को ऊपर से नीचे तक देखा। क्या हाल बना लिया था अपना.. सच उम्र से दस साल अधिक लग रही थी। पूर्वी ने देखा शरीर तो बेडौल हो ही रहा था आँखों से भी रौनक चली गई थी। ऐसे ही नहीं कहते आँखे मन का आईना सा बन जाता है। फोन निकालकर नजदीकी जिम का लोकेशन निकाला और फिर ड्राइवर को कार निकालने के लिए कह दिया।

दी बुक मार्क कैफे और उसके ऊपर बना हैप्पी लाइफ जिम, एक पल को तो पूर्वी का मन हुआ कैफे ही चली जाए और कोई किताब लेकर बस घंटों वहीं पड़ी रहे.. हाँ अभी भी वक्त है सोच ले .. क्या मैं रोज आ पाऊंगी जिम.. नहीं नहीं शिवांग क्या सोचेगा.. और अनन्या ने भी उसे कसम दे रखी है कि अगली मुलाकात तभी होगी जब खुद के लिए सोचना शुरु कर देगी। काउंटर पर जाकर एडमिशन लिया
“मैम! आप कल से आ सकती है”
“क्यों आज से क्यों नहीं ”
पूर्वी पूरी तैयारी करके आई थी। वह जानती थी एक कदम पीछे की ओर, और वह फिर हार जाएगी।
“क्यों नहीं मैम! बिल्कुल आप आज से ही ज्वाइन कर सकती हैं.. मुझे लगा आप सिर्फ इंक्वायरी या एडमिशन के लिए आए होंगे.. अगर आप रेडी हो कर आए हैं तो मोस्ट वेलकम.. मैं आपको हमारे इंस्ट्रक्टर से मिला देती हूं”
उसने एक लड़के की तरफ इशारा किया।
” सौरभ सर! ये पूर्वी मैम है.. इन्होंने अभी एडमिशन लिया हुआ है, तो कुछ दिन आप इन्हें कंपलीटली गाइड कर दीजिए”
“वह आए हमारे गरीब खाने में, कभी हम उनको कभी अपने जिम को देखा करते हैं.. अरे बिल्कुल क्यों नहीं आपका स्वागत है पूर्वी जी.. आप फटाफट चेंज करके आ जाइए, मैं आपको यही ट्रेडमिल के पास मिलूंगा”
अजीब सा अंदाज था इस सौरभ का, पूर्वी थोड़ा सा घबराने लगी।
किसी भी अंदाज में शायराना मिजाज उसे चुभने लगता था। जैसे किसी ने आईना मुंह पर दे मारा हो। सौरभ ने बड़े ही प्यार और आत्मीयता से सारे मशीन के बारे में बताया और पूर्वी को आगे किस तरह से सारे व्यायाम करने हैं उसके तौर तरीके समझा दिए।

पूर्वी ने गौर किया व इतना भी बुरा नहीं था, थोड़ा हंसमुख और खुशमिजाज जरूर था। पूर्वी जब वापस जाने लगी तो सौरभ बाहर तक आया तो
” मैम कल मिलेंगे सेम टाइम!”
यह तो पीछे ही पड़ गया।
” इसमें बताने वाली जैसी क्या बात है? मैंने एडमिशन लिया है तो आऊंगी ही ना..”
पूर्वी तपाक से बोली
“नहीं वो क्या होता है ना मैम, पहले दिन घर जाने के बाद आपको दर्द होगा तो फिर आप उस दर्द से भागने लगेंगी तो मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि यह छोटे-मोटे दर्द का सामना करोगे और वापस लौट कर आओगे तो ही कामयाब हो पाओगे..”
दर्द! यह क्या जानता है दर्द के बारे में.. यह छोटे मोटे शरीर में होने वाले दर्द शायद उसे महसूस भी नहीं होते हैं।

घर जाकर पूर्वी ने महसूस किया कि अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रही है हशायद शरीर में होने वाले दर्द में मन में होने वाले दर्द को कुछ हद तक ढक दिया था। अगली सुबह आसानी से उठ गई और शिवांग को नाश्ता और खाना देकर समय से जिम भी पहुंच गई। चेंज करके ट्रेडमिल पर पहुंची पूर्वी पर उसकी नजरें कहीं ना कहीं सौरभ को खोज रही थी जो वह दिखाई नहीं दे रहा था। पूर्वी ने जैसे ही दौड़ना शुरू किया अचानक से सौरभ आ गया।
” माय गॉड तुमने तो डरा ही दिया था, यह कैसी हरकत है”
मैं तुमसे फिर मिलूंगी कहाँ और कैसे मैं नहीं जानती
मंजिलें वही एक ही होगी रास्तों का भेद मैं नहीं मानती….
अरे आप तो द पूर्वी हो.. पता है आपकी शायरी, आप की कविताएं, मैं दीवाना हूं.. मैंने कल ही सोचा.. कहीं तो देखा है, कहां देखा है.. पर अब आपने ऐसा हाल बना रखा है तो भला फ्रेंड कैसे पहचानेंगे आपको?”
मजाकिया अंदाज में अपनी बातों का सौरभ ने अंत किया।
पूर्वी जैसे ऊपर से नीचे तक तिलमिला उठी। फिर से वही शायरी, कविताएं ।ट्रेडमिल छोड़ दूसरी मशीन के पास आ गई। सौरभ फिर पीछे पीछे आ गया।
” अरे मैम हम आपका ऑटोग्राफ नहीं मांग रहे आप तो बिल्कुल इग्नोर किए जा रही हैं ”
सौरभ ने पूर्वी को देखा। उसकी घबराहट उसकी आंखों में साफ दिख रही थी।
” ठीक है.. मैं उस बारे में बात नहीं करूंगा”
पूर्वी को पता भी नहीं था कि जिम जॉइन करना उसके लिए शरीर से ज्यादा उसके मन को निखारने लगा। अब वह पहले से खुश रहती थी। शिवांग भी मां में आए इस बदलाव को देखकर इस बार वो खुशी खुशी कह गया
“आई लव यू मामा कीप इट गोइंग।
सौरभ बहुत सारी बातें करता था मतलब बहुत सारी.. कभी-कभी वर्कआउट के बाद वो कैफे में भी मिलते। बुक्स के बारे में बात होती.. कभी-कभी सौरभ हँस कर कहता
” अरे पूर्वी मैम! आप वापस शायरा बन जाना तो यहां आना भूल मत जाना”
” नहीं भूल सकती”
पूर्वी में डेढ़ महीनों में ही काफी सुधार आ चुका था। जैसे काया कल्प हो गया हो। खुशमिजाज पूर्वी, अब फिर से गाने सुन रही थी, शायरी लिख रही थी। आनंद इस बार घर लौटा उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। वह खुश था कि उसकी पूर्वी उसे वापस मिल गई थी।
” अच्छा लग रहा है तुम्हें यूं खुश देख कर”
“तो तुम क्या कहना चाहते हो? तुमने कभी कोशिश की जानने की… ”
“अरे यार पूर्वी.. तुम्हें देख कर खुशी हो रही है.. क्या हुआ कैसे हुआ, मैं नहीं जानना चाहता.. बस आज जमाने बाद तुम्हें वापस लिखते देखा तो जैसे मेरे ऊपर से भी एक बड़ा सा बोझ उतर गया, कहीं ना कहीं तुम्हारी उस हालत के लिए मैं खुद को जिम्मेदार समझ रहा था.. हां मानता हूं मुझे पूछना चाहिए था पर मैं डरता था कि कहीं तुम्हारे सवालों का जवाब मेरे पास नहीं हुआ तो ”
” अच्छा लग रहा है यह जानकर कि तुम खुश हो हां और मैं भी खुश हूं.. बहुत खुश हूं सच.. एक काम करो तुम आराम करो मेरे जिम का टाइम हो गया ”
” अरे यार इतने दिनों बाद आया हूं दो दिन की छुट्टी तो ले लो ”
” सॉरी आनंद! बड़ी मुश्किलों से मैंने खुद को इन सब चीजों से आगे बढ़ाया है.. प्लीज मुझे फिर से मत बांधो। ”
आनंद बस देखते रहा पूर्वी को जाते हुए देखता रहा।
उधर पूर्वी वापस जिम पहुंची तो अलग ही ख्यालों में खोई हुई थी।
” क्या हुआ पूर्वी? आज तुम्हारा मन कहां है? तुमने आधे वजन के डंबल उठाए हैं.. प्रोग्राम के रिवर्स गियर में डालने वाली हो”
हंसकर सौरभ ने पूछा।
” नहीं सौरभ बस ऐसे ही.. सोचती हूं जिंदगी हमेशा अनिश्चितता से भरी क्यों होती है?”
“क्योंकि इसी में जीने का मजा है.. सब कुछ पहले से पता हो तो जिन्दगी बोरिंग हो जाती है.. सामने जो आते जाए उस पल को उसी पल जीते चलो.. ये खुशियां ना बंद मुट्ठी में रेत की तरह होती है।”

घर जाकर देखा तो आनंद घर पर था। पूरा घर सजा हुआ, गुब्बारे, तोहफे, मोमबत्तियां, फूल.. और खाने की खुशबु.. आनंद ने पूर्वी को गोद में उठा लिया। पूर्वी मना भी नहीं कर पाई या शायद करना ही नहीं चाहती थी। कानो में सौरभ की बाते गूंज रही थी “इस पल को जी लो”। आज फिर वही पूर्वी और आनन्द के दरमियाँ कोई दूरियां नहीं थी। पूर्वी नींद के आगोश में थी या सालो बाद मिला सुकून, जैसे खुद को सुनाई हुई सजा आज माफ़ कर दी हो। उसकी बांहों का घेरा दुनिया भर की सुरक्षा का चक्र सा प्रतीत हुआ। आँखे खोल कर उसकी तरफ देखा ‘आनन्द’ और वो उछल पड़ी.. ये तो सौरभ है.. नहींsss ये नहीं हो सकता है.. और नींद खुल गई। पसीने से तरबतर पूर्वी ने देखा सामने आनंद जूस लिए खड़ा है
‘हैलो! ब्यूटीफुल!”

पूर्वी एक फीकी सी हँसी देते हुए अपने काम में लग गई। ये क्या हो रहा था उसके साथ
सौरभ!!
नहीं नहीं.. वो छोटा है और सिर्फ एक अच्छा दोस्त है..
पूर्वी ने अनन्या से अपौईंटमेंट ली और आनन-फानन में क्लिनिक चली गई।
” मैं सब खराब दूंगी अनु.. बता आखिर इस सपने का क्या मतलब है?”
“रिलैक्स हो जा.. ऐसा कुछ भी नहीं.. बस तू इस समय दो विचारो के बीच फंसी हुई है..तू एक बार सौरभ से बात कर वो क्या फील करता है इस बारे में.. उम्र मायने नहीं रखती अगर दोनों के बीच सच्ची फीलिंग्स हो ”
” नहीं अनु! मेरे दिल में सौरभ के लिए बस दोस्त वाली फील ही है पर मैं उसे खोना भी नहीं चाहती..”
पूर्वी वापस घर चली गई
उधर पूर्वी को जीम में ना पाकर सौरभ थोड़ा घबरा गया। पूर्वी को फोन लगाया तो फोन बंद था। कशमकश में उसने अनन्या को फोन लगाया।
अनन्या जानती थी पूर्वी शायद सौरभ से कह ना पाए तो उसने अपनी तरफ से इशारे में कह दिया।
आनंद सब कुछ सुनकर सन्न सा रह गया। यानी इतिहास खुद को दोहरा रहा था। वो ऐसा नहीं होने देगा।
अगले दिन पूर्वी ने जब रिसेप्शन पर लड़की से सौरभ के बारे में पूछा तो उसने कहा
” सर ने दूसरे ब्रांच में ट्रांसफर ले लिया है..आपके लिए ये चिट्ठी ”
पूर्वी ने बेचैनी में चिट्ठी खोली.. इस दौर में चिट्ठी.. मैसेज कर देता

” हमराह ना सही, हमराज़ ना सही
हम दोस्त है बस उसे रहने दे वही”
पता है पूर्वी तुम हमेशा पूछती थी ना मेरे परिवार के बारे में मेरे बचपन के बारे में और मैं हंस कर टाल देता था। जानती हो क्यों? क्योंकि मैं उन यादों को याद नहीं करना चाहता। बस मैं चाहता हूं ऐसी ही कड़वी यादें तुम्हारे जीवन में ना रहे। मेरे बाबा ने मेरी शायरा मां से शादी की थी। गजब का लिखती थी वह और बाबा उतने ही नीरस.. फिर एक दिन मां को उनके ही जैसा कोई हमशायर, हमराही मिल गया और मां छोड़ गई। जानती हो पूर्वी! तब से बड़े होने तक रोज मैं सुनता रहा तेरी शायरा मां किसी के साथ भाग गई.. मोहल्ले के ताने और लोगों की बातें कानों में गर्म शीशे की तरह पिघलती रहीह जब मैं छोटा था तो शायद मां की मजबूरी नहीं समझता पर जैसे बड़ा होते गया मुझे समझ में आता क्या कि जिंदगी अपने उसूलों पर जीने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है। आनंद तुम्हें बहुत प्यार करते हैं पूर्वी। मैं चाहता हूं तुम उन्हें कुछ समय दो। तुम खुद को कुछ समय दो। यूं दोराहे पर रहोगी तो शायद संभल नहीं पाओगी.. भटक जाओगी.. मैं तुम्हारा दोस्त था, हूं और हमेशा रहूंगा.. तुम से बिना मिले जा रहा हूं उसके लिए माफ करना “
सौरभ

पूर्वी की आंखों से आंसू बह चले। हां तुम तो सच्चे दोस्त हो सौरभ! हम सदैव दोस्त रहेंगे। तुम जैसे दोस्त हो तो जिंदगी में संभलना कितना आसान हो जाता है.. शुक्रिया मेरी जिंदगी में आने के लिए”

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