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ममता की आस

 

चंदा है तू , मेरा सूरज है तू
बंगले के बगल के मोड़पर पान की दुकान पर रेडियों पर गाना बज रहा था।यूँ तो श्यामा क पसंदीदा गाना था शादी के बाद पति के साथ पेहली फिल्म थीं। लेकिन आज ये गाना अच्छा नहीं लग रहा था ।
रोज़ के मुकाबले श्यामा आज सुबह जल्दी आ गई थी।बँगले की घंटी बजाई तो पुनम जी ने दरवाज़ा खोला, तो देखा श्यामा खड़ी है।नीद खराब होने के कारण खीज कर बोलीं “क्या श्यामा अभी तो साढ़े छ बजे हैं। इतनी सुबह आ गई, सोने भी नही देती है।
वो वापस आ गईं और श्यामा चुपचाप हाथ पैर धो कर रसोइ में चली गई ।पूनम जी वापस जा बिस्तर पर लेट गई।वो जानती थीं अभी श्यामा मसाला चाय लेकर आयेगी । तभी दोबारा घंटी बजी तो श्यामा ने दरवाज़ा खोला तो उसे देख गुप्ता जी उसे देख
चौंकें , फिर अपनी आदत के अनुसार बालकनी के झूले पर बैठ गये। “श्यामा चाय  बालकनी मे ले आओ। श्यामा को ऐसा बोल
पूनम जी भी वहीं आकर बैठ गईं ।तभी श्यामा चाय लेकर आई “ क्या हुआ श्यामा सब ठीक है , तुम इतनी जल्दी क्यों आ गई।”
श्यामा बिना कुछ बोले चाय रखकर , अनमनी निगाह से उन्हे देख वापस चली गई।
श्यामा पिछले पंद्रह सालों से गुप्ता परिवार की चाकरी कर रही थी । अपने सात साल के बेटे को लेकर शहर आई थी। अब तो उसका बेटा बड़ा हो गया था, सायकल फेक्ट्री में काम करता था। श्यामा ने छोटा सा घर बना लिया था। अपने बेटे बबुआ की दो साल पह्ले शादी कर दी थी। उसकी बहु राधा बहुत प्यारी सी लडकी थी। श्यामा बेह्द खुश रहती थी। राधा सिलाई का काम घर रह्कर करती थी अच्छी गुजर बसर चल रही थी।आज न जाने क्या हुआ था श्यामा बहुत चुप थी।
गुप्ता परिवार अपने पुश्तैनी मकान मे रह्ता था एक बेटा केशव अपनी पत्नी गौरी के साथ दिल्ली रह्ता था। गुप्ता जी बड़े सरकारी अधिकारी थे, रिटायर होकर घर पर रह्ते थे। सुबह सैर पर जाते, वापस लौट स्नान पूजा पाठ नाश्ता कर सामने पार्क में बने सोसायटी के क्लब  में चले जाते थे। वहां उनके जैसे और ह्मउम्र लोग आते , शतरंज की बाजी होती,हँसी मजाक होता। समय बढ़िया कट रहा था। शाम को आसपास के कई बुजुर्ग वहीं बने मंदिर मे इकठ्ठा होते, संध्या आरती होती, इधर उधर कि बातें होतीं, फिर सब अपने घर लौट जाते । कुल मिला कर जिंदगी बढ़िया चल रही थी।
सब कुछ ठीक था मगर गुप्ता परिवार में एक कमी थी उनकी इकलौती बहु नि:संतान थी, इसकी कसक गुप्त दम्पती को हर पल कचोटती। कॉलोनी के बच्चों के दादू उनको मिठाई खिलाते, गाड़ी मे घुमाते थे। सब दिल बह्लाने के तरीके थे।
यूँ भी अगर इंसान को मनचाही वस्तु न मिले तो ठीक लेकिन अगर मिल कर छीन जाए तो ज्यादा तक्लीफ होती है। बस यही दुर्घटना इस परिवार मे हुई थी । यह सुख मिलते मिलते रह गया था ।गौरी और केशव तो मानो एक दुजे के लिये बने थे। गौरी तो जैसे लक्ष्मी बन कर आई थी  ,एक बिटिया कि कमी पूरी हो गई। पुरे घर में रौनक छाई रहती थी। अक्सर गौरी अकेले ही  दिल्ली से आ जाती थी।केशव जब आता तभी वापस जाती। शादी के दो साल बाद उसने माँ बनने की ख़बर दी तो पूरा घर खुशी से झूम उठा था। सब उसे पलकों पे बिठाए रह्ते थे।सातवें महिने में एक दिन अचानक प्रसव पीड़ा हुई तो गौरी को आनन फानन अस्पताल ले गये लेकिन होनी तो हो कर रह्ती है।बालक मृत पैदा हुआ। सब अभी इस दुख से उबरते की डॉक्टर से आकर  कहा की गौरी अब कभी माँ नहीं बन सकती । अब तो जैसे गुप्त परिवार कि खुशियों को ग्रहण लग गया थ। जैसे तैसे करके गौरी को सबने सम्भाला,वो बिल्कुल खामोश हो गई थी।धीरे धीरे सब सामन्य जीवन जीने लगे थे।पूनम जी से गौरी की हालत नहीं देखी जाती थी।ऐसा लगता जैसे वो खुद को अधूरा सा मह्सूस कर रही हो, उसकी ममता प्यासी ही रह गई। किसी बच्चे को देख उसकी ओर खिची चली जाती।कुछ दिनों बाद केशव और गौरी दिल्ली चले गये ।वहां गौरी ने प्ले स्कूल मे नौकरी कर ली थी। तीज त्योहार पर वो घर आते लेकिन पह्ले जैसा नही रहा।एक बार केशव ने बच्चा गोद लेने की बात की तो गुप्ता जी ने साफ इंकार कर दिया।
वह परिवार बस खुश होने का दिखावा करता था। सब सामान्य दिखता लेकिन गौरी को भीतर वो प्यास खाये जा रही थी।
पूनम जी की सुबह आज अलग थी रोज़ ढेरों बात करने वाली श्यामा आज बिल्कुल चुप थी। ऐसे ही एक हफ्ता बीत गया गुप्ता जी किसी काम से दिल्ली गये थे तो श्यामा रात में उसी घर मे रुकी थी।आज पूनम जी ने सोच लिया था, की आज वो श्यामा की परेशानी जान कर रहेगी।यूँ तो श्यामा द्स साल से काम कर रही थी वो उसके बारे मे सब कुछ जानती थीं फिर भी कोई बात थी जिससे वो परेशान थी।
देर रात वो श्यामा से बोलीं “अब बता क्या बात है, पैसे की दिक्क्त  है, या तेरी बहु से कोई परेशानी है,क्या हो गया है तुझे?’’
कुछ देर चुप रह कर वो बोली “क्या बताये हमारी ज़िन्दगी प्याज के छिलकों कि तरह परतों में छिपी है। आप कहां तक सुनेंगी।
लेकिन पूनम जी ने ठान लिया था कि आज वो सच्चाई जान कर रहेंगी। बहुत ज़ोर देने पर श्यामा ने बोलना शुरु किया,
 हमारी शादी गांव के गबरू जवान से हुई थी।बस वो मां बेटे ही थे , छोटा सा घर एक खेत कुल मिला कर खाने पहनने को बहुत था। हम पहली बार अपने माई बप्पा से मिलने गये थे।वहां गये तो पता चला हमार बचपन की सहेली को आपसी दुश्मनी में उठा ले गये थे, एक हफ्ते बाद मरी हालत में फेक गये थे।उसका इलाज हो रहा लेकिन वो बिल्कुल बोरा गई थी। बस चुपचाप असमान को ताका करती थी।हमारा बहुत जी दुखता था, लेकिन औरत जात हमारी कौन सुनता। फिर हम अपनी ससुराल लौट आये। धीरे धीरे आठ नो महीने बीत गये ,एक दिन आधी रात को कोई दरवाजा पीट रहा था, खोल कर देखा तो हमार सखी नौ महीने का पेट लिये खड़ी थी।
हम तो सन्न रह गये थे।उसको अंदर लाये,रात उसे तो सुला दिया मगर रात भर सोचते रहे,क्या किया जाय लेकिन सुबह उसे प्रसव पीड़ा शुरु हो गयी,हमारा आदमी दाई को ले कर आया, बड़ी मुश्किल से उसका बेटा हुआ लेकिन वो मर गई।अब सवाल उस बच्चे का था। किसी तरह सखी का किरिया करम करवाये फिर उस बच्चे को ले अपने मायके गये सोचा था उसके नाना के घर पल जायेगा लेकिन उनके घर ताला था ,बदनामी से घबड़ा कर वो कहीं और चले गये थे। हमारे माई बप्पा से हमारे मरद को पता चला की वो बच्चा बलात्कार का नतीजा है बस फिर क्या एक झगड़ा  शुरु हो गई बच्चा आश्रम या कहीं फेंक दो। अब आप बताओ मानुस का बच्चा भला कैसे सड़क पर फेंक दें। अपने  आदमी को समझा कर अपने घर आ गये, इतना कह कर श्यामा ने लम्बी सांस ली जैसे दोबारा वही सब जी कर आई हो।

पूनम जी आश्चर्य से उसका चेहरा देख रही थीं, एक साधारण सी औरत और इतनी हिम्मत, उन्होने फिर पूछा श्यामा फिर क्या हुआ?

हम गाली सुनते किसी तरह दो साल निकाले,एक रोज़ हमारे आदमी को जैसे भूत सवार हो गया बोला या तो हम या फिर ई बच्चा? बस फिर क्या हम बबुआ को गोदी लिये अउर घर छोड़ दिये। कहाँ कहाँ भटके ,किसी तरह शहर पहुंचे। आप लोगों का काम मिला और जिंद्गी सही हो गई।
पूनम जी बोलीं तो अब क्या समस्या है जो तू इतना परेशान है। माना बबुआ तेरी सहेली का बेटा है लेकिन तेरी जान बसती है। अच्छा भला नौकरी कर रहा है, तेरी बहु राधा इतनी अच्छी है फिर क्या हुआ?
क्या बताये राधा अपने घर गई थी वापस घर आते हुये बस की पिछली सीट पर एक दुधमुँही बच्ची मिल गई और राधा उसे घर ले आई है। सारी सवारियां उतर गई ,और तो और वो बस का चालक भी चला गया, वो नन्ही सी जान हिलक हिलक कर रो रही थी राधा का मन ना माना वो उसे घर ले आई , बस तभी से घर में झगड़ा हो रहा है। वैसे मैं थाने में रपट कर दी हूँ आप लेकिन आप भी जानत हो जो बिटिया को फेक गया वो खोजने थोड़ी न आयेगा।बबुआ कह्ता है कौनो आश्रम मे रख आओ अउर राधा कह्ती है उ बच्ची को पालेगी। अपने खुद तीन महिने का पेट से है ,कल बताई हमको। बबुआ गुस्साये बैठा है कह्ता है जाने किसका गंदा खून है , हम काहे पालें दुसरे का बच्चा? बस येही बात से मन में आग लग जाती है। कुछ समझ नहीं पा रहे हैं।
पूनम जी जानती थी मामला गम्भीर है , कुछ सोचना पड़ेगा ।धीरे से बोलीं तू क्या चाह्ती है?
श्यामा बोली उस बच्ची को देखो तो भूख प्यास खतम हो जाये, कौनो अच्छे घर का बच्चा  है। बबुआ के मर्जी के बिना रखना ठीक नहीं ओर राधा भी जिद पर अड़ी है। बोलती है अम्मा हम खुद कमाकर पाल लेंगे।
इन सब बातों में जाने कब सुबह हो गई थी, पूनम जी ने श्यामा को चाय बनाने को कहा , तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
पूनम जी ने दरवाज़ा खोला तो गुप्ता जी सामने खड़े थे, एक सुखद आश्चर्य था उनके साथ केशव और गौरी भी आये थे। सबको देख वे बेहद खुश हुईं । श्यामा सबके लिये चाय ले आई। अभी सब चाय पी रहे थे कि श्यामा बोली अभी मैं घर जा रही हूँ दो घंटे आराम कर दोबारा आऊंगी।
श्यामा जाने लगी तो पूनम जी बोलीं “ श्यामा  आते हुए राधा और बबुआ को साथ ले कर आना हम बात करेंगे उससे ।
श्यामा दो पल रुकी एक नज़र गौरी को देखा फिर गुप्ता जी को देखा फिर पूनम जी को देख बोली ये मरद जात कुछ नही समझती है। इनका गर्व बहुत बड़ा होता है, और औरत में कुछ भी हो न जाने कहाँ से ममता फूटती है , बच्चे के लिये दुनिया से लड़ जाती है।
वहाँ बैठे लोगों को कुछ समझ नहीं आया। श्यामा वापस घर चली गई। घर के बाकी लोग अपनी दिनचर्या में लग गये।
लगभग दस बजे श्यामा राधा और बबुआ वहाँ आये। इस बीच पूनम जी ने गुप्ताजी को सारी बात बताई । वो इस सब से दूर रहने की सलाह दे रहे थे मगर पूनम जी के कहने पर बाहर आये।
ज्यों ही पूनम जी ने बात शुरु की बबुआ चिढ़कर बोला “ अरे अम्मा , जाने किसका पाप है। हम काहे अपने सर लें ।
इतना सुनते ही श्यामा एकदम से चीख़ कर बोली “ एकदम चुप! बच्चा पाप नहीं होता,उसे सड़क पर छोड़ने वाला पापी होता है। अरे ! इतनी गंदी सोच है तेरी । पापी तू है|  जो जीते जागते बच्चे को सड़क पर फेकने को कह्ता है। अरे , अगर मैंने भी यही सोचा होता तो अपनी गृहस्थी में खुश रह्ती, तुझे पालने का फैसला  कर जिंदगी भर ठोकर न खाई होती।
सबको जैसे सांप सूंघ गया था।
श्यामा ने फिर सारी कहानी सबको सुनाई । बबुआ हाथ जोड़े उसके पैरों मे गिर गया। रो रोकर माफ़ी मांग रहा था।
इस बीच जाने कब गौरी राधा ने बच्ची को अपनी गोद में ले लिया था। सबसे दूर जाकर उस बच्ची के सथ खेल रही थी , खिलखिलाते हुए उसे पुच्कार रही थी।सब ने उसके तरफ देखा और वो बच्ची तो जैसे साक्षात मोहिनी रूप थी,घुंघराले बाल, गुलाबी रंग ,काली काली बडी़ बडी़ आंखें , गुलाब की पंखुरी जैसे नाज़ुक ओंठ , यानी जो उसे देखे मन बंध जाये।
तब तक बबुआ बोला अम्मा तुम अपना काम करो और मैं राधा और बिटिया को लेकर घर जा रहे हैं। फिर राधा को देख कर बोला जा बिटिया को ले आ, बाज़ार होते घर जायेंगे, बिटिया कि जरुरत का सामान खरीद कर लायेंगे।
इतना सुनते ही  गौरी का चेहरा बुझ गया, पूनम जी ने देखा गौरी बडी़ हसरत से उनकी ओर देख रही थी। उसकी आँखों में एक दर्द लहरा गया। उसने बच्ची को राधा की गोद में दे दिया।वो एकटक बच्ची को ऐसे देख रही थी मानो उसकी मणि छिन गई हो।
जैसे ही राधा जाने के लिये पलटी , उसके सामने पूनम जी आकर खड़ी हो गई और बोलीं “ श्यामा मैं अपना आंचल फेला कर तुझसे इस बच्ची को मांगती हूँ मुझपर ये उपकार कर दे इसे मेरी गौरी की झोली में डाल दे, सारी उम्र तेरा अह्सान मनूंगी ।तेरे हाथ जोड़ती हूँ।
इतना सुनते ही गुप्ता जी गुस्से से बोले ये क्या कह रही हो , दुनिया क्या कहेगी ,रास्ते का बच्चा ह्मारे घर में ये नहीं हो सकता ।पूनम जी उनको देख कर बोलीं तुने सही कहा था श्यामा ये मर्द जात औरत की ममता की प्यास को नहीं मह्सूस कर सकते  है, मैं जो कर रही हूँ अपनी बेटी के लिये कर रही हूँ,दुनिया चाहे जो बोले इस घर मे ये मेरा फैसला  है।
यह सुनकर श्यामा हाथ जोड़कर खड़ी हो गई, उसकी आंखो से आंसू बह  रहे थे ।केशव भी अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया और बोला पापा मान जाइये , मेरी गौरी को उसकी खुशियाँ दे दिजिये।ये सब सुनकर गौरी भागते हुए आई और बच्ची को गोद मे ले बेहताशा चूम रही थी।उसने मुस्कुराते हुए बच्ची को देखा आज उसकी ज़िंद्गी उसकी गोद में थी।

 

 

 

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कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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