Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Poetries मेरा अपना खुद का घर

मेरा अपना खुद का घर

मैं….मैं हूँ,

यह मेरा वजूद है!किसने दिया तुमको यह हक, कि तुम खुद को मेरा भगवान समझ बैठे।

रिश्ते में बंधी थी जीवनसंगिनी थी, बराबर का योगदान था दोनों का,परिवार चलाने का।
तुम कमा कर लाते,तो मैं भी घर चलाती।

वह घर जो मेरा कभी हुआ ही नहीं, या यूँ कहूँ कि जिसको तुमने मेरा कभी माना ही नहीं।
जबकि वह घर तुमसे ज्यादा मेरा अपना था।

मैंने दिया था अपना पूरा वक्त  उस चारदीवारी को घर बनाने में।

मुझे नहीं चाहिए था भगवान।
काश !तुम एक अच्छे इंसान ही बन जाते।

बात-बात पर तुम्हारा यह उलाहना देना

इतनी परेशानी है तो चली जाओ अपने घर,

 झकझोर जाता मुझे भीतर तक।

कहने को दो-दो घर, लेकिन कौन सा घर था मेरा अपना?

वह जहाँ जन्म लिया, पली-बढ़ी, सपने देखे?

याद है मुझे…विदा करते वक्त बाबू जी ने कहा था..
बेटा अब ससुराल ही तेरा घर है, अब तुम इस घर की मेहमान हो

उस दिन जो विदा हुई, पीछे छूट गया मेरा वह अपना घर।

ससुराल …जहाँ सपने लेकर आई हजार, फिर भी ना कह पाई इसे अपना संसार।

क्यों नहीं बेटियों के होते अपने घर?

काश बाबू जी इतनी जल्दी मुझे विदा न करते…भाई की तरह आगे बढ़ने का मुझे भी अवसर देते ।

काश मैं भी अपने पैरों पर खड़ी हो पाती… काश मैं भी अपना खुद का ही घर बना पाती।

वो घर जिसको मैं अपना कह सकती, जिसने स्वाभिमान के साथ जी सकती।

आज मैं एक बेटी की माँ हूँ..जैसे-तैसे मैंने अपने जीवन के साथ समझौता कर लिया,

लेकिन मैं अपनी बेटी को  समझौता नहीं करने दूँगी ।

मैं उसे पढ़ाऊँगी, लिखाऊँगी…उसे इस काबिल बनाऊँगी

कि जी सके वह इस पुरुष प्रधान समाज में सर उठा के अपनी शर्तों पर अपनी जिंदगी

अपना खुद का एक घर बना सके ।

”दिल तड़पता है इसे सुकून चाहिए ,
दो गज जमीन से पहले अपना एक घर चाहिए”

Pic Credit: Canva

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अम्मा का इंतकाल

बालपन में घटित एक दुःखद घटनकाल की सुखद अनुभूतियाँ, ये मेरे बालपन का संस्मरण है,जब मासूमियत दिल पे हावी होती है और ज़ुबाँ पे...

अनुराधा

रात का अंधेरा और गहरा होता जा रहा था साथ ही मेरे भीतर की जदोजहद भी गहरी होती जा रही थी | बीते कुछ...

आज़ादी की क़ीमत

  रानी के पड़ोसी दूसरे शहर शिफ्ट हो रहे थे, जाते हुए उन्होंने अपना तोता रानी को दे दिया। पहले रानी को यह ज़िम्मेदारी कुछ...

मेरा अपना भी अस्तित्व हैं

“सुबह पांच बजे के करीब नींद खुली, फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आई, अद्भुत नज़ारा था..सामने वाले पार्क से आता कलरव आस...

Recent Comments

Manimala Chatterjee on गुलाब
Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब